वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञप्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३२१
यावत्स्वाश्रयग्राहक-सामग्रीग्राह्यत्वम्। स्वाश्रयो वृत्तिज्ञानं तद्ग्राहकं साक्षिज्ञानं तेनापि वृत्तिज्ञाने गृह्यमाणे तद्गतं¹ प्रामाण्यं² गृह्यते।
अर्थ—और प्रामाण्य स्वतः एव जाना जाता है। स्वतोग्राह्यत्व का अर्थ है 'दोष का अभाव रहते हुए यावत् (समस्त) स्वाश्रय का (प्रमा का) ग्रहण करनेवाली सामग्री के द्वारा ग्रहण किया जाना (जानना)।' स्वाश्रय का अर्थ है—वृत्तिज्ञान, उसका ग्राहक साक्षिज्ञान होता है। उसके द्वारा वृत्तिज्ञान के ग्रहण करते समय, वृत्तिज्ञाननिष्ठ प्रामाण्य भी जाना जाता है।
विवरण—जिस प्रकार प्रामाण्य की उत्पत्ति स्वतः (ज्ञानग्राहक सामग्री से ही) होती है, उसी प्रकार उसका ज्ञान भी स्वतः एव होता है और यही स्वतोग्राह्यत्व है। हमें विवक्षित स्वतोग्राह्यत्व की व्याख्या इस प्रकार है—यावत् स्वाश्रयग्राहक सामग्री के द्वारा जानना। इसका आशय यह है—प्रामाण्य या प्रमात्व प्रमा का धर्म है। जैसे पुस्तक का पुस्तकत्व धर्म पुस्तक में ही रहता है, वैसे ही प्रमात्व (प्रामाण्य) भी प्रमा-निष्ठ (ज्ञाननिष्ठ) होता है। यह ज्ञान ब्रह्मज्ञान है, किन्तु वृत्तिज्ञान है। इस कारण स्व = प्रामाण्य, उसका आश्रय = आधार वृत्तिज्ञान ही होता है। इसलिए स्वाश्रय शब्द से प्रामाण्य का आश्रय जो घटादि आकार से परिणत हुई वृत्ति से अवच्छिन्न चैतन्यरूप वृत्तिज्ञान, उसका ग्रहण करना चाहिये। उन समस्त वृत्तिज्ञानों का ग्राहक (ज्ञापक) साक्षिज्ञान ही है। इस कारण साक्षिज्ञान ही स्वाश्रयग्राहक = वृत्तिज्ञानज्ञापक सामग्री है। इसी साक्षिज्ञान को नैयायिक अनुव्यवसाय कहते हैं, और यही प्रमातृचैतन्य है। इस प्रमातृचैतन्य के द्वारा वृत्तिज्ञानरूप प्रमा का जब ज्ञान होता है तभी तन्निष्ठ प्रमात्व का भी ज्ञान होता है। क्योंकि धर्मज्ञानपूर्वक ही धर्मी का (पदार्थ का) ज्ञान होता है। इसलिए प्रामाण्य का स्वाश्रयग्राहक सामग्री से ही (स्वत एव) ज्ञान होता है, यह मानना चाहिये, और यही स्वतोग्राह्यत्व है।
इसके अतिरिक्त प्रत्यक्षपरिच्छेद में प्रतिपादित वेदान्ताभिमत ज्ञान प्रत्यक्ष प्रक्रिया के अनुसार देखने से भी यही सिद्ध होता है। तथाहि—ज्ञानस्थल में वृत्त्युपहितचैतन्य और प्रमातृचैतन्य की एकता आवश्यक है। इस कारण प्रमातृचैतन्य में वृत्त्युपहितचैतन्य का
यत्त न्यायरत्नमालायाम्—"आत्मवाची स्वशब्दोऽयं स्वतो भाति प्रमाणता" इति 'स्व' शब्दस्य आत्मपरत्वं वर्णितम्, तदिदं भाट्टमते त्रिपुटीभानाभावात् ज्ञाततालिङ्ग-कानुमित्यैव प्रामाण्यग्रहणाच्च न भाट्टनिरूपणपरम्, किन्तु पूर्वपक्ष्याशयसंकलनपरम् इति मन्तव्यम्। एवं च—अनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वमबाधितार्थविषयकज्ञानत्वं वा प्रामाण्यम्। इदं च प्रमात्वं धारावाहिकद्वितीयज्ञानादिषु सर्वत्राविशिष्टम्। तादृशप्रमा-जनकं प्रत्यक्षादि प्रमाणम्।
१. 'तत्रा०'–इति पाठान्तरम्।
२. 'ण्यमपि'–इति पाठान्तरम्।
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