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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 482 में से

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पृष्ठ 381

अप्रामाण्यस्य परतस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३२३

**समाधान—**हमने स्वाश्रयग्राहक (वृत्तिज्ञानग्राहक) साक्षिचैतन्य को दोषाभाव में विशेषण किया है। जहाँ पर हमें संशय होता है, वहाँ अनभ्यास, अपाटव आदि दोष हुआ करते हैं। इस कारण दोषाभावरूप विशेषण से घटित स्वतोग्राह्यत्व का लक्षण उस स्थल में नहीं लागू हो सकता। अतः 'दोषाभाव से युक्त स्वाश्रयग्राहक सामग्री के द्वारा ग्राह्य होना'—यह स्वतोग्राह्यत्व का निष्कृष्ट लक्षण है।

अथवा 'दोषाभाव' विशेषण का भी लक्षण में समावेश करने की आवश्यकता नहीं है। 'स्वाश्रयग्राहकसामग्रीग्राह्यत्वयोग्यत्व' ऐसा योग्यत्व घटित लक्षण करने पर संशय उत्पन्न हो सकेगा। तथाहि—ज्ञानग्राहकसामग्री के द्वारा (साक्षिज्ञान से) प्रामाण्य का ज्ञान हो या न हो किन्तु तादृश प्रामाण्य के बोध होने की योग्यता यदि हो तो वहाँ हम—स्वतोग्राह्यत्व मानते हैं। संशयस्थल में भी ऐसी स्वतोग्राह्यता रहती है। किन्तु अनभ्यासादि दोषों के कारण प्रामाण्य का निश्चय न होने से ज्ञान के विषय में (ज्ञान में) हमें संशय होता है।

**उदाहरणार्थ—**बीज में अंकुरोत्पत्ति की योग्यता रहती है, किन्तु पर्जन्य आदि के अभाव में अंकुर उत्पन्न नहीं होता। वैसे ही संशयस्थल में प्रामाण्यग्रह होने की योग्यता तो रहती है किन्तु दोष उसमें प्रतिबन्धक होने से प्रामाण्य का निश्चय न होकर संशय उत्पन्न होता है। अतः 'दोषाभाव' विशेषण न देने पर भी योग्यत्व घटित स्वतोग्राह्यत्व का लक्षण युक्त है। और प्रामाण्य स्वतोग्राह्य ही है—यह सिद्ध हुआ।

इस प्रकार प्रामाण्य का स्वतस्त्व सिद्ध कर अप्रामाण्य की उत्पत्ति और ज्ञान परतः होते हैं—इसे बताते हैं।

'अप्रामाण्यं तु न ज्ञानसामान्य-सामग्रीप्रयोज्यम्, प्रमायामप्य- प्रामाण्यापत्तेः। किन्तु दोष-प्रयोज्यम्। नाप्यप्रामाण्यं यावत्स्वाश्रय- ग्राहक-ग्राह्यम्। अप्रामाण्य-घटक-तदभाववत्त्वादेर्वृत्तिज्ञानाऽनुपनीतत्वेन साक्षिणा ग्रहीतुमशक्यत्वात्। किन्तु विसंवादिप्रवृत्त्यादिलिङ्गकानु- मित्यादि-विषय इति परत एवाप्रामाण्यमुत्पद्यते ज्ञायते चेति।

श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्तपरिभाषायामनुपलब्धि- परिच्छेदः समाप्तः॥ ६॥


१. 'अप्रामाण्यं तु' इत्यादीनां सत्कार्यवादिनों सांख्यानां सिद्धान्तं निराकुर्वन् अप्रामाण्यस्य परतस्त्वं ब्रवीति। यदि प्रामाण्यमप्रामाण्यञ्च ज्ञानसामान्यासामग्रीप्रयोज्यं स्यात्, तर्हि तयोः स्वतस्त्वं वक्तुं शक्येत, यतः एकज्ञानजात्यनुबन्धिनो प्रामाण्याप्रामाण्ये (प्रामाण्याऽप्रमात्वे) भविष्यतः। किन्तु विरोधात् तदसम्भवम्। यतो भेदनिबन्धनो हि विरुद्धधर्म-समावेशः। यथा एकस्याग्नेः शीतत्वमुष्णत्वञ्च नैवसम्भवति, तथैव एकस्य ज्ञानस्य प्रमाणत्वमप्रमाणत्वञ्च न सम्भवति। अतः अप्रामाण्यस्य ज्ञानसामान्यसामग्रीप्रयोज्यत्वं नैव कल्पनीयम्। एवं च ज्ञानसामान्यसामग्रीभिन्नजन्यत्वेन तस्य परतस्त्वमेव विभावनीयम्।