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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३२४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अप्रामाण्यस्य परतस्त्वम्

**अर्थ—**अप्रामाण्य, ज्ञानसामान्यसामग्री का कार्य नहीं है (स्वयं उत्पन्न नहीं होता)। क्योंकि ऐसा मानने पर प्रमा में भी अप्रामाण्य प्राप्त होगा। अतः वह दोष-प्रयोज्य है (दोष का कार्य है)। वैसे ही अप्रामाण्य, यावत्स्वाश्रय-ग्राहक-साक्षिज्ञान से भी ग्राह्य (स्वतोग्राह्य) नहीं है। क्योंकि अप्रामाण्यालक्षण के (तदभाववत्त्वादि) घटकों की (अवयवों की) वृत्तिज्ञान से उपस्थिति नहीं होती। इस कारण साक्षिज्ञान के द्वारा उसका ग्रहण होना संभव नहीं। अप्रामाण्य तो विसंवादि (विफल प्रवृत्ति) आदि हेतुओं से होने वाली अनुमिति आदि ज्ञानों का विषय है। तस्मात् अप्रामाण्य परतः ही उत्पन्न होता है और परतः ही ज्ञात होता है।

**विवरण—**ज्ञान प्रामाण्य के समान उसका अप्रामाण्य (अयथार्थत्व) स्वतः उत्पन्न नहीं होता। ज्ञान सामान्य सामग्री से ही उस ज्ञान में अप्रामाण्य उत्पन्न होता है—कहने पर प्रमा में भी अप्रमात्व प्राप्त होगा। क्योंकि ज्ञानसामान्य की इन्द्रियादि सामग्री, भ्रम और प्रमा दोनों में समान है। साधन में यदि भेद न हो तो साध्य में भी भेद उत्पन्न नहीं होगा।

**प्रश्न—**तो अप्रामाण्य की उत्पत्ति कैसे होती है ?

**उत्तर—**ज्ञानसामान्यसामग्री-व्यतिरिक्त दोष ही अप्रामाण्य में जनक होते हैं। चक्षुरादि इन्द्रियों में मन्द प्रकाश आदि दोष हों तो ज्ञान के अप्रामाण्य उत्पन्न होता है—यह अनुभव है। एतावता अप्रामाण्य परतः ही उत्पन्न होता है।

इसी प्रकार अप्रामाण्य स्वतोग्राह्य भी नहीं है। 'तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानत्वम्–वस्तुतः रजतत्वाभाववान् पदार्थ में रजतत्व-प्रकारक-ज्ञान होना ही अप्रामाण्य का लक्षण है। ऐसे अप्रामाण्य का ज्ञान, यावत् स्वाश्रयग्राहक सामग्री से साक्षिज्ञान से नहीं होता। क्योंकि अप्रामाण्य लक्षण के 'तदभाववत्व' रूप अवयव का वृत्ति के द्वारा ज्ञान न होने से उसे साक्षिभास्यत्व नहीं है। भ्रम स्थल में शुक्तिका आदि में रजताकार वृत्ति होती है। रजतत्वाभावाकार वृत्ति नहीं होती। और जिसकी उपस्थिति वृत्ति से नहीं होती उसका साक्षी से ज्ञान होना संभव नहीं। 'तदभावत्वादि' के 'आदि' पद से 'बाधितार्थ-विषयज्ञानत्व' रूप अप्रामाण्य लक्षण के बाधितत्व का ग्रहण करना चाहिये। अतः अप्रामाण्य का ज्ञान स्वतः नहीं होता।

**प्रश्न—**तब अप्रामाण्य का ज्ञान किस कारण से होता है ?

उत्तर—'विसंवादि०' इत्यादि वाक्य से दिया गया है। विसंवादि (विफल प्रवृत्ति) आदि से होनेवाली अनुमिति आदि में पूर्व ज्ञान का अप्रामाण्य विषय रहता है। इस कारण अप्रामाण्य, अनुमानादि ग्राह्य है। वह १अनुमान इस प्रकार है—'मुझे प्रथमतः


१. 'मम प्राथमिकं रजतज्ञानम्, अप्रमा, विसंवादिप्रवृत्तिजनकत्वात्, रज्जुसर्पज्ञानवत् ।'