वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअप्रामाण्यस्य परतस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३२५
हुआ रजत ज्ञान, अप्रमारूप होना चाहिये, क्योंकि वह विसंवादि प्रवृत्ति का जनक हुआ है, रज्जु में हुए पहले सर्प-ज्ञान के समान।' इस विषय में वेदान्ती और नैयायिकों का ऐकमत्य है।
"प्रवृत्त्यादि" यहाँ 'आदि' पद से स्वप्न में भासित हुए गजादिज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध करनेवाले 'निद्रादिदोष' आदि हेतुओं का ग्रहण करना चाहिये। 'यह रजत नहीं है' इस प्रकार याप्त के कहे जाने पर भी रजतादि ज्ञान में मिथ्यात्व ज्ञात हो जाता है, इसलिए 'अनुमित्यादि' यहाँ आदि-शब्द से ऐसे शाब्द ज्ञान का स्वीकार करना चाहिये। इस कारण अप्रामाण्य, अनुमानादि परकारणजन्य होने से परतोग्राह्य ही है। स्वतोग्राह्य नहीं है। वह परतः ही उत्पन्न होता है और परतः ही ज्ञात होता है।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरणप्रकाशे
अनुपलब्धि-परिच्छेदः समाप्तः ।
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