वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मणो जगत्कर्तृत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३२९
अत्र जगत्पदेन कार्यजातं विवक्षितम्, कारणत्वं च कर्तृत्व¹मतोऽविद्यादौ नातिव्याप्तिः ।
अर्थ— जो लक्षण लक्ष्य के यावत् काल पर्यन्त ( जब तक लक्ष्य रहे तब तक ) स्थिर न रहकर लक्ष्य का व्यावर्तक ( अन्य पदार्थ से भेदक ) हो उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं । जैसे—गन्धवत्त्व पृथ्वी का तटस्थ-लक्षण है । क्योंकि महाप्रलय के समय परमाणुओं में और उत्पत्तिकाल के घटादिकों में गन्ध नहीं होता । प्रकृत प्रसंग में जगज्जन्मादि-कारणत्व, ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है । यहाँ 'जगत्' शब्द से यावत् कार्य विवक्षित हैं और 'कारणत्व' पद से कर्तृत्व अभिप्रेत है । इस कारण इस लक्षण की अविद्यादि में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
विवरण— जबतक लक्ष्य स्थिर रहे तब तक उसमें न रहकर ( कुछ समय तक ही लक्ष्य में रहकर ) अन्य पदार्थों से लक्ष्य को भिन्न करनेवाले लक्षण को तटस्थ लक्षण कहते हैं । उदाहरण—पृथ्वी का तटस्थ-लक्षण 'गन्ध' है, क्योंकि वह महाप्रलय के समय पृथ्वीपरमाणुओं में नहीं रहता और न प्रथम ( उत्पत्तिक्षण में घटादिकार्यरूप ) पृथ्वी में ही—ऐसा नैयायिक मानते हैं । 'उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्ठति' उत्पन्न हुआ द्रव्य क्षण-भर निर्गुण रहता है, यह उनका सिद्धान्त है । तथापि गन्धगुण के कारण पृथ्वी, जलादि अन्य द्रव्यों से भिन्न है—ऐसा ज्ञान होता है । इसलिये गन्ध में तटस्थ लक्षण का समन्वय हो जाता है । ऐसे ही प्रकृत ब्रह्म में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय-हेतुत्व भी सृष्ट्युत्पत्त्यादि काल में ही रहता है । प्रलय के पश्चात् जगत् के ही न होने से उसका कारणत्व भी उसमें नहीं रहता । तथापि जगत् का कारणत्व, ब्रह्मव्यतिरिक्त अन्य पदार्थों में सम्भव न होने से, वह ब्रह्म को अन्यों से व्यावृत्त ( भिन्न ) करता है । इसलिए 'जगज्जन्मादिकारणत्व' ब्रह्म का तटस्थ-लक्षण है ।
शंका— जगत् के जन्मादिकों की कारणता, माया में भी होने से यह लक्षण वहाँ भी अतिव्याप्त है । इस शंका को दूर करने के लिये 'कारणत्व' शब्द से कर्तृत्वरूप निमित्त कारण, हमें विवक्षित है । जड-अविद्या ( माया ) में जगत् की उपादान-कारणता ही है कर्तृत्व नहीं है । इस कारण उसमें इस ब्रह्म-लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती । 'आदि' शब्द से अदृष्टादि का स्वीकार करना चाहिए ।
प्रश्न— कर्तृत्व से क्या तात्पर्य है ? और ब्रह्म में कर्तृत्व मानने पर उक्त अति-का निरास कैसे होता है ? ग्रन्थकार उत्तर देते हैं—
कर्तृत्वं च तत्तदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानचिकीर्षा-कृतिमत्त्वम् । ईश्वरस्य तावदुपादानगोचरापरोक्षज्ञान-सद्भावे च 'यः सर्वज्ञः सर्व-
१. 'त्वं तेना'—इति पाठान्तरम् ।