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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

३३० | वेदान्तपरिभाषा | [ ब्रह्मणो नवलक्षणानि

विद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते ( मुं० १-१-९ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् । तादृशचिकीर्षा-सद्भावे१ 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २-६ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् । तादृशकृतौ च तन्मनोऽकुरुत' इत्यादि२वाक्यम् ।

अर्थ—उन-उन उपादान कारणों का अपरोक्षज्ञान, चिकीर्षा ( करने की इच्छा ) और कृति ( प्रयत्न ) का होना ही कर्तृत्व है । ईश्वर में उपादान-विषयक अपरोक्षज्ञान के होने में 'जो अक्षरसंज्ञक ईश्वर सामान्यतः और विशेषतः भी सर्वज्ञ है और जिसका तप ज्ञानमय ही है, उससे यह हिरण्यगर्भाख्य ब्रह्म, नाम, रूप और व्रीहियवादिरूप अन्न उत्पन्न होता है' ( मुं० १-१-९ ) श्रुति ही प्रमाण है । उसे वैसी ( जगद्विषयक ) चिकीर्षा के होने में 'मैं बहुत होऊँ एवं प्रजा उत्पन्न करूँ ऐसी इच्छा उसने ( आत्मा ने ) की' ( तै० २-६ ) इत्यादि श्रुतिप्रमाण हैं । और उसकी कृति के विषय में 'उस ब्रह्म ने मन को उत्पन्न किया' इत्यादि श्रुतिवाक्य ( बृ० १-२-१ ) आधार हैं ।

विवरण—जिसे कार्य के उपादान कारण का अपरोक्ष ( प्रत्यक्षात्मक ) ज्ञान हो और उस कार्य के करने की इच्छा तदनुकूल प्रयत्न भी जिसका हो उसे उस कार्य का कर्ता कहते हैं । जैसे—कुम्हार में घट की मृत्तिकारूप उपादान कारण का प्रत्यक्षज्ञान, घट उत्पन्न करने की इच्छा और दो कपालों का संयोग कराने वाला प्रयत्न भी रहता है, इसलिये वह घट का कर्ता है । उसी प्रकार प्रकृत ईश्वर में भी जगत् के उपादान कारण ( माया ) का ज्ञान आदि होने से वह जगत् का कर्ता है । माया जड होने से उसमें ज्ञान आदि का सम्भव नहीं । इस कारण माया जगत् की कर्त्री नहीं है । अतः ब्रह्म के जगत्कर्तृत्वरूप तटस्थलक्षण की उसमें अतिव्याप्ति नहीं होती ।

शंका—ब्रह्म में इस प्रकार के कर्तृत्व के होने में क्या प्रमाण है ?

उत्तर—इसीलिए तो ग्रन्थकार ने क्रमशः उपादानविषयक ज्ञान, चिकीर्षा और कृति को बताया है । इस विषय में तीन श्रुतिवाक्यों को भी उद्धृत किया है । 'आदि' शब्द से 'स प्राणमसृजत' ( प्र० ६-४ ) आदि श्रुतियों को भी समझ लेना चाहिये । ज्ञान, इच्छा और कृति ये तीनों मिलकर ब्रह्म का एक लक्षण नहीं हैं, अपितु वे तीन लक्षण हैं, ऐसा ग्रन्थकार कहते हैं ।

३ज्ञानेच्छाकृतीनां मध्येऽन्यतमगर्भलक्षणत्रितय४मिदं विवक्षितम्,


१. 'वे च-इति पाठान्तरम् ।
२. 'दिश्रुतिवा'—इति पाठान्तरम् ।
३. ज्ञानेच्छाद्यन्यतमगर्भ०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'यं विव०'—इति पाठान्तरम् ।