वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मणो नवलक्षणानि ] •विषयपरिच्छेदः ३३१
अन्यथा व्यर्थ-विशेषण¹त्वापत्तेः । अत एव जन्म-स्थिति-ध्वंसाना- मन्यतमस्यैव लक्षणे प्रवेशः । एवं च² प्रकृते लक्षणानि नव सम्पद्यन्ते । ब्रह्मणो जगज्जन्मादिकारणत्वे च—'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' ( तै० ३–१ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् ।
अर्थ—ज्ञान, इच्छा और कृति--इनमें से कोई एक भी जिसके गर्भ में ( भीतर ) घटक हो, ऐसे तीन लक्षण ( यहाँ ) विवक्षित हैं। नहीं तो उन्हें व्यर्थ विशेषणत्व प्राप्त होगा ( उनका विशेषण रूप से रहना व्यर्थ होगा )। इसीलिये 'जन्म स्थिति और भङ्ग ( नाश )—इनमें से भी एक-एक का ही लक्षण में प्रवेश समझना चाहिये । इस प्रकार प्रकृत में ( ब्रह्म के ) नौ लक्षण होते हैं । ब्रह्म में जगत् के जन्मादिकों की कारणता के विषय में 'जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न हुए भूत जिसके कारण जीवित रहते हैं, और लय के समय जिसमें प्रवेश करते हैं ( वह ब्रह्म हैं )' इत्यादि श्रुतिप्रमाण है ( तै० ३-१ ) ।
विवरण—ऊपर बताये हुए ज्ञान, इच्छा, कृति में से प्रत्येक को लक्षण में निविष्ट कर 'जगदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानत्व' 'जगच्चिकीर्षावत्व' और 'जगदुत्पादनानुकूलकृतिमत्त्व' इस प्रकार के तीन स्वतन्त्र लक्षण ही यहाँ विवक्षित हैं। अन्यथा ( समस्त विशेषण मिलकर ब्रह्म का यह एक ही लक्षण है—ऐसा मानने पर ) लक्षणगत दो विशेषण व्यर्थ होंगे। क्योंकि उनसे किसी की भी व्यावृत्ति नहीं होती। एक विशेषण से ही ब्रह्मेतर पदार्थों का निषेध सिद्ध हो जाने से उतना ही निर्दुष्ट लक्षण हो जाता है। इस प्रकार आरम्भ में बताये हुए जन्मादिकारणत्व रूप लक्षण में भी जन्म, स्थिति और नाश में से एकैक का समावेश कर तीन लक्षण समझ लेने चाहिये। इस रीति से १—जगज्जन्मोपादानगोचरापरोक्षज्ञान, २—तज्जन्मगोचरचिकीर्षा, ३—जगज्जन्मानुकूलकृति, ४—स्थित्युपादानविषयकज्ञान, ५—स्थितीच्छा, ६—स्थितिप्रयत्न, ७—प्रलयोपादान, ८—प्रलयेच्छा, और ९—प्रलयप्रयत्न ये ब्रह्म के नौ लक्षण सिद्ध होते हैं । ब्रह्म में जगत् के जन्मादि की कारणता के विषय में 'यतो वा' इत्यादि श्रुति-प्रमाण हैं। 'आदि' पद से 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' इत्यादि छान्दोग्य श्रुति का ग्रहण करना चाहिये।
'जन्म, स्थिति और नाश इन तीनों से उपादानकारणत्व की ही सिद्धि होती है । इस कारण उसमें निमित्तत्व तो नहीं बन पाता' इस अरुचि से लघुलक्षण बताते हैं ।
१. 'णताप०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'च लक्ष०'—इति पाठान्तरम् ।