वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३२ | वेदान्तपरिभाषा | [ ब्रह्मणो लघुलक्षणम्
यद्वा—निखिलजगदुपादानत्वं ब्रह्मणो लक्षणम्। उपादानत्वं च जगदध्यासाधिष्ठानत्वम् जगदाकारेण¹ विपरिणममान-मायाऽधिष्ठानत्वं वा। एतादृशमेवोपादानत्वमभिप्रेत्य 'इदं सर्वं यदयमात्मा' 'सच्च त्यच्चाभवत्' ( तै० २–६ ) 'बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २–६ ) इत्यादि-श्रुतिषु ब्रह्मप्रपञ्चयोस्तादात्म्य-व्यपदेशः। घटः सन् घटो भाति, घट इष्ट इत्यादि-लौकिकव्यपदेशोऽपि सच्चिदानन्दरूप-ब्रह्मैक्याध्यासात्।
अर्थ—अथवा 'समस्त जगत् का उपादानत्व' ही ब्रह्म का लक्षण है उपादानत्व का अर्थ है कि अध्यास ( भ्रम ) का अधिष्ठानत्व, अथवा जगत् के आकार में ( जगदाकारेण ) परिणत हुई माया का अधिष्ठानत्व। ब्रह्म में रहनेवाली इसी उपादानकारणता के अभिप्राय से 'जो यह सब है वह आत्मा ही है' ( नृसिंहोत्तरतापनीय ), 'वही मूर्त और अमूर्त हुआ' ( तै० २–६ ) 'मैं बहुत होऊँ' ( तै० २–६ ) इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म और प्रपञ्च के तादात्म्य का ( ऐक्य का ) उपदेश किया गया है। 'घट-भासित होता है' और 'घट इष्ट है' इत्यादि लौकिक व्यवहार भी सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म के ऐक्याध्यास से ही होता है।
विवरण—समस्त जगत् का उपादानकारणत्व ( उपादान कारण होना ) ही ब्रह्म का लक्षण है, समझ लीजिये। किन्तु चेतन ब्रह्म में जडप्रपञ्च का उपादानकारणत्व कैसे सम्भव हो सकता है ? और यह उपादानकारणत्व माया में भी होने से उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति होगी। ऐसी शंका करना ठीक नहीं, क्योंकि उपादान शब्द से हमें जगद्रूप अध्यास ( भ्रम ) का अधिष्ठान ( आधार ) ही विवक्षित है। मिथ्या रजत के भ्रम का अधिष्ठान जैसे शुक्ति होती है वैसे ही ब्रह्म में भासमान मायाकल्पित प्रपञ्च का अधिष्ठान ( विवर्तोपादान ) ब्रह्म ही है, माया नहीं। इस कारण उक्त दोष नहीं है।
इस पर भी 'जिसका परिणाम होता है वही उपादान होता है' ऐसा यदि आपका आग्रह ही हो तो दूसरा कल्प ( पक्ष ) बताते हैं--जगदाकारेण ( जगद्रूप से ) परिणाम को प्राप्त होनेवाली ( परिणत होनेवाली ) माया का अधिष्ठानत्व ब्रह्म में होना—यही उसका उपादानत्व है। माया में परिणामि-उपादानत्व होने पर भी स्वाधिष्ठान-ब्रह्म के बिना वह कुछ नहीं कर सकती। इस कारण ब्रह्म में ही ऐसा उपादानत्व सम्भव हो सकता है। अतः यह ब्रह्मलक्षण निर्दुष्ट है।
माया के जगदाकारपरिणामित्व के होने में 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। वैसे ही ब्रह्म और प्रपञ्च का ऐक्य प्रतिपादन करनेवाली उपर्युक्त
१. 'ण परिण०'–इति पाठान्तरम्।