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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 482 में से

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दुःखस्येष्टत्वापत्ति-तत्परिहारौ ] विषयपरिच्छेदः ३३३

श्रुतियाँ भी ब्रह्म के इस उपादानकारणत्व को मानकर ही प्रवृत्त हुई हैं। अन्यथा चेतनब्रह्म और जडजगत् दोनों में ऐक्य का संभव नहीं। किन्तु भ्रमाधिष्ठानत्व मानने से जिस प्रकार सर्प तो केवल भासित होता है, वस्तुतः रज्जु ही है। उसी प्रकार भासमान जगत्, परमार्थतः ब्रह्म ही है—यह उनमें अभेद उपपन्न हो जाता है। 'आदि' शब्द से 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि वचन विवक्षित हैं। इस प्रकार 'घट सत् है' इत्यादि लौकिक व्यवहार भी (लोगों का अभेद व्यवहार भी) सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म में जगत् का अध्यास मानकर ही होता है। क्योंकि यहाँ पर भासमान घटसत्ता, वास्तव में ब्रह्मसत्ता ही है। इसी प्रकार 'घट भासित होता है' यहाँ जो भास होता है, वह चैतन्य का ही होता है, और 'घट इष्ट है' वाक्य से जो इष्टत्व प्रतीत होता है वह भी ब्रह्म के आनन्दरूप में अध्यास मानकर ही होता है।

इस पर शंका और उसका समाधान—

नन्वानन्दात्मक-चिदध्यासाद् घटादेरिष्टत्व-व्यवहारे दुःखस्यापि तत्राध्यासात्त^१त्रापि इष्टत्वव्यवहारापत्तिरिति चेत्। न। आरोपे सति निमित्तानुसरणं, न तु निमित्तमस्तीत्यारोप इत्यभ्युपगमेन दुःखादौ सच्चिदंशाध्यासेऽप्यानन्दांशाध्यासाभावात्। जगति नामरूपांश-द्वय-व्यवहारस्तु अविद्यापरिणामात्मक-नामरूप-सम्बन्धात्।

तदुक्तम्— अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्।
आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो^२ द्वयम्॥ इति।

अर्थ—शंका—आनन्दात्मक चैतन्य में अध्यास के कारण घटादिकों का—'घट इष्ट है' ऐसा इष्टत्व-व्यवहार होता है। ऐसा कहने से दुःख का भी उस आनन्दात्मक ब्रह्म में ही अध्यास होने के कारण उस विषय में भी (दुःख इष्ट है) इत्याकारक इष्टत्व व्यवहार होने लगेगा।' ऐसी शंका करें—तो वह ठीक नहीं। क्योंकि 'आरोप हो तो उसके निमित्त की (कारण की) कल्पना करनी चाहिये। निमित्त है इसलिये आरोप की कल्पना नहीं करनी चाहिये' यह अभ्युपगम (नियम) होने से, दुःख में सत् और चित् दो अंशों का अध्यास होने पर भी आनन्दांश का अध्यास नहीं होता, संसार में 'नाम' और 'रूप' इन दो अंशों का जो व्यवहार होता है, वह अविद्या-परिणामात्मक


१. 'तस्यापि'-इति पाठान्तरम्।
२. 'पमतो' इति पाठान्तरम्।