वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३४ | वेदान्तपरिभाषा | [ जगतो जन्मक्रमनिरूपणम्
नाम, रूप के सम्बन्ध से होता है। इसीलिए कहा है कि, 'है—सत्ता, भासता है—ज्ञान, प्रिय—आनन्द, तथा रूप और नाम—ये पाँच अंश, प्रत्येक पदार्थ में प्रतीत होते हैं। उनमें से प्रथम तीन—सत्, चित्, आनन्द ये 'ब्रह्मरूप' हैं, और शेष दो अंश—नाम, रूप, 'जगद्रूप' हैं।
**विवरण—**वादी कहता है कि आनन्दात्मक ब्रह्म में घटादि पदार्थों के अध्यस्त होने से उनकी 'घट मुझे इष्ट है' इत्याकारक इष्टत्वेन प्रतीति होना आप बताते हैं। तो इसी के अनुसार ब्रह्म में दुःख पदार्थ के भी अध्यस्त होने से वह भी 'दुःख मुझे इष्ट है' इस रूप से प्रतीत होना चाहिए। परन्तु ऐसा अनुभव तो किसी को नहीं है। इस कारण क्या ब्रह्म में दुःख का अध्यास न माना जाय ?
सिद्धान्ती उत्तर देता है—'यदि आरोप प्रत्यक्ष सिद्ध हो तो उसके निमित्त की चिकित्सा करनी चाहिये। आरोप का निमित्त होने मात्र से ही आरोप की कल्पना नहीं की जाती' यह नियम है। अतः हम यह कल्पना करते हैं कि यस्मात् 'दुःख इष्ट है' ऐसी दुःख में इष्टत्व की प्रतीति नहीं होती, तस्मात् दुःख में केवल 'सत्' और चित्' इन दो अंशों का अध्यास होता है, आनन्दांश का नहीं। इस कारण उक्त दोष नहीं है। 'अनुभूत्यनुसारेण कल्प्यते हि नियामकम्' यह विद्यारण्य ने भी कहा है।
**शंका—**ब्रह्म तो नाम रूप से रहित होने के कारण उस पर आरोपित घटादिकों के विषय में 'अयं घटः शुक्लः' ऐसा नाम-रूपात्मक व्यवहार कैसे होता है ? ग्रन्थकार समाधान करते हैं कि जगत् में नाम-रूपात्मक व्यवहार अविद्या ( माया ) के परिणामात्मक नाम-रूप के सम्बन्ध से होता है। इसी कारण प्रत्येक पदार्थ में 'अस्ति, भाति' इत्यादि रूप से प्रतीयमान पाँच अंशों में से पहिले तीन अंश ब्रह्मरूप हैं और शेष दो जगद्रूप ( माया परिणामरूप ) हैं—यह अभियुक्तों का कथन है।
इस रीति से तत् पदार्थ के स्वरूप एवं तटस्थ लक्षणों का निरूपण करने से अब उससे जगत् की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, उसे प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं—
अथ जगतो जन्मक्रमो निरूप्यते—तत्र सर्गाद्यकाले परमेश्वरः सृज्यमान-प्रपञ्च-वैचित्र्य-हेतु-प्राणिकर्म-सहकृतोऽपरिमितानिरूपित-शक्ति-विशेषविशिष्ट-मायासहितः सन्नामरूपात्मक-निखिल-प्रपञ्चं प्रथमं बुद्ध्यावाकलय्येदं करिष्यामीति सङ्कल्पयति, 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' ( छा० ६-२-३ ) इति 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २-६ ) इत्यादिश्रुतेः। तत आकाशादीनि पञ्चभूतानि अपञ्चीकृतानि तन्मात्रपद¹प्रतिपाद्यानि उत्पद्यन्ते। तत्राकाशस्य शब्दो गुणः।
१. 'द वाच्यान्युत्प'-इति पाठान्तरम् ।