वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजगतो जन्मक्रमनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३३५
वायोस्तु शब्दस्पर्शौ। तेजस्तु शब्द-स्पर्श-रूपाणि। अपां तु शब्द-स्पर्श-रूप-रसाः। पृथिव्यास्तु शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः।
अर्थ— अब जगत् की उत्पत्ति का क्रम निरूपण किया जाता है। घटादिप्रपञ्च की उत्पत्ति के समय परमेश्वर उत्पाद्य प्रपञ्च की विचित्रता में कारण बनानेवाले प्राणिकर्मों की सहायता से एवं अपरिमित, अनिर्वाच्य विशेषशक्तिरूप माया से युक्त होकर प्रथमतः नाम-रूपात्मक समस्त प्रपञ्च का बुद्धि से आकलन करता है और 'यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह (ब्रह्म) 'मैं बहुत होऊँ इस प्रकार ईक्षण करता हुआ' (छां० ६-२) 'मैं बहुत होऊँ और प्रजा उत्पन्न करूँ-ऐसी कामना उसने की' (तै० २-६) इत्यादि श्रुति इस विषय में प्रमाण है। तदनन्तर आकाशादि अपञ्चीकृत पाँच भूत उत्पन्न होते हैं। इन्हीं को (पञ्च) तन्मात्राएँ भी कहते हैं। उन भूतों में से आकाश का गुण शब्द है। किन्तु वायु के शब्द और स्पर्श दो गुण हैं। तेज के शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण हैं। जल के शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण हैं। पृथ्वी के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँच गुण हैं।
विवरण— सृष्टि करते समय प्रथमतः परमेश्वर समस्तप्रपञ्च के स्वरूप का 'यह ऐसा है' इस प्रकार से आकलन कर लेता है, उसके अनन्तर 'मैं यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह सत्यसंकल्प होने से उसके संकल्प के अनुसार क्रमशः आकाशादि पाँच सूक्ष्मभूत उत्पन्न होते हैं और वे क्रम से शब्दादि एक-एक गुणों से अधिक रहते हैं। इन अपञ्चीकृत आकाशादिभूतों को ही 'शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र' ऐसी पौराणिक संज्ञाएँ हैं। ईश्वर के संकल्पपूर्वक सृष्टि उत्पन्न करने के विषय में दो श्रुतियों का ऊपर उल्लेख कर ही चुके हैं। 'आदि' शब्द से 'आत्मा वा··· स ऐक्षत' आदि श्रुतियों का ग्रहण करना चाहिये। वैसे ही सृष्टि के आकाशादि क्रम से उत्पन्न होने के विषय में 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः संभूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी' (तै० ३-१) इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति प्रसिद्ध ही है।
शंका— ईश्वर ही ब्रह्मादि स्थावरान्त जगत् का निर्माण करता है—यह माननेसे इस विषम उत्पत्ति के कारण ईश्वर का विषमता, निर्दयता आदि दोष प्राप्त होंगे—इस शंका का निरसन करने के लिये ईश्वर में, 'सृज्यमान०' विशेषण जोड़ा गया है। ईश्वर पर्जन्य के समान सर्वसाधारणतया ही उत्पादक है। उन-उन प्राणियों के विशेषगुण उनके पूर्व कर्मानुसार ही उत्पन्न होते हैं। अतः विषमता में कारण कर्म होते हैं। ईश्वर तो उनकी सहायता से उनके अनुसार केवल विभाग कर देता है, इस कारण उसमें उक्त दोष नहीं आ पाते।
यदि कोई कहे कि तुम्हारे मत में परमेश्वर कूटस्थ-निर्विकार है तब उसमें संकल्पादि कैसे हो सकेंगे?