भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

जगतो जन्मक्रमनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३३५

वायोस्तु शब्दस्पर्शौ। तेजस्तु शब्द-स्पर्श-रूपाणि। अपां तु शब्द-स्पर्श-रूप-रसाः। पृथिव्यास्तु शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः।

अर्थ— अब जगत् की उत्पत्ति का क्रम निरूपण किया जाता है। घटादिप्रपञ्च की उत्पत्ति के समय परमेश्वर उत्पाद्य प्रपञ्च की विचित्रता में कारण बनानेवाले प्राणिकर्मों की सहायता से एवं अपरिमित, अनिर्वाच्य विशेषशक्तिरूप माया से युक्त होकर प्रथमतः नाम-रूपात्मक समस्त प्रपञ्च का बुद्धि से आकलन करता है और 'यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह (ब्रह्म) 'मैं बहुत होऊँ इस प्रकार ईक्षण करता हुआ' (छां० ६-२) 'मैं बहुत होऊँ और प्रजा उत्पन्न करूँ-ऐसी कामना उसने की' (तै० २-६) इत्यादि श्रुति इस विषय में प्रमाण है। तदनन्तर आकाशादि अपञ्चीकृत पाँच भूत उत्पन्न होते हैं। इन्हीं को (पञ्च) तन्मात्राएँ भी कहते हैं। उन भूतों में से आकाश का गुण शब्द है। किन्तु वायु के शब्द और स्पर्श दो गुण हैं। तेज के शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण हैं। जल के शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण हैं। पृथ्वी के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँच गुण हैं।

विवरण— सृष्टि करते समय प्रथमतः परमेश्वर समस्तप्रपञ्च के स्वरूप का 'यह ऐसा है' इस प्रकार से आकलन कर लेता है, उसके अनन्तर 'मैं यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह सत्यसंकल्प होने से उसके संकल्प के अनुसार क्रमशः आकाशादि पाँच सूक्ष्मभूत उत्पन्न होते हैं और वे क्रम से शब्दादि एक-एक गुणों से अधिक रहते हैं। इन अपञ्चीकृत आकाशादिभूतों को ही 'शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र' ऐसी पौराणिक संज्ञाएँ हैं। ईश्वर के संकल्पपूर्वक सृष्टि उत्पन्न करने के विषय में दो श्रुतियों का ऊपर उल्लेख कर ही चुके हैं। 'आदि' शब्द से 'आत्मा वा··· स ऐक्षत' आदि श्रुतियों का ग्रहण करना चाहिये। वैसे ही सृष्टि के आकाशादि क्रम से उत्पन्न होने के विषय में 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः संभूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी' (तै० ३-१) इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति प्रसिद्ध ही है।

शंका— ईश्वर ही ब्रह्मादि स्थावरान्त जगत् का निर्माण करता है—यह माननेसे इस विषम उत्पत्ति के कारण ईश्वर का विषमता, निर्दयता आदि दोष प्राप्त होंगे—इस शंका का निरसन करने के लिये ईश्वर में, 'सृज्यमान०' विशेषण जोड़ा गया है। ईश्वर पर्जन्य के समान सर्वसाधारणतया ही उत्पादक है। उन-उन प्राणियों के विशेषगुण उनके पूर्व कर्मानुसार ही उत्पन्न होते हैं। अतः विषमता में कारण कर्म होते हैं। ईश्वर तो उनकी सहायता से उनके अनुसार केवल विभाग कर देता है, इस कारण उसमें उक्त दोष नहीं आ पाते।

यदि कोई कहे कि तुम्हारे मत में परमेश्वर कूटस्थ-निर्विकार है तब उसमें संकल्पादि कैसे हो सकेंगे?

३३६ वेदान्तपरिभाषा [ शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वनिराकरणम्

'अपरिमित' इत्यादि विशेषण से उक्त शंका का निरसन किया है । निरुपाधिक ब्रह्म में जगत् का स्रष्टृत्व ( उत्पादकत्व ) यद्यपि संभव नहीं हो सकता, तथापि अनादि, अनिर्वचनीय, अपरिमित शक्तिरूप अपनी माया की उपाधि से जब ब्रह्म, युक्त हो जाता है तब उस सोपाधिक ब्रह्म ( ईश्वर ) में जगत्कर्तृत्व उत्पन्न होता है । अतः उक्त शंका युक्त नहीं है ।

अब नैयायिकों के 'शब्द आकाश का ही गुण है' मत का निरसन करते हैं ।

न¹ च ²शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वम्, वाय्वादावपि तदुपलम्भात् । न चासौ भ्रमः, बाधकाभावात् ।

अर्थ— शब्द को केवल आकाश का ही गुण नहीं कहा जा सकता । क्योंकि वायु आदि में भी उसकी प्रतीति होती है । इसे भ्रम भी नहीं कह सकते क्योंकि उस प्रतीति में कोई बाधक नहीं है ।

विवरण— शब्द केवल आकाश का ही गुण है वायु आदि भूतों में 'शब्द' गुण नहीं होता—यह नैयायिक मानते हैं । परन्तु ग्रन्थकार कहते हैं कि यह उचित नहीं है । क्योंकि आकाश में प्रतिध्वनिरूप शब्द की जैसी प्रतीति होती है, वैसी वायु, तेज, जल और पृथिवी में भी क्रम से 'बिस्स्' 'भुग् भुग्' 'बुल बुल' और 'कड कड' आदि शब्द सुनाई पड़ते हैं । अतः इस प्रतीति के अनुसार पांचों भूतों में शब्द को मानना चाहिये ।

इस पर नैयायिक कहता है कि वायु आदि द्रव्यों में शब्द की प्रतीति भ्रम से होती है । जैसे—अग्नि की उष्णता जल में भासित होने से 'उष्णं जलम्' व्यवहार होता है,


१. 'न तु श०'—इति पाठान्तरम् । २. न च शब्दस्येति । शब्दः आकाशमात्रस्य गुणः इति नैयायिकाः कथयन्ति । किन्तु वाय्वादीनामपि शब्दो गुण इति वेदान्तिनः । नैयायिका हि न हि आकाशाद् वायोरुत्पत्ति मन्यन्ते, इति न आकाशगुणस्य शब्दस्य वाय्वादिक्रमेण तेज आदिषु तेषामंगीकारो युक्तः । वेदान्तिनां तु आकाशाद् वायुरिति श्रुतिप्रमाणपरतन्त्राणां न नैयायिकानां मतादरणमुचितम् । तदुक्तं पञ्चदश्याम्—

"शब्दस्पर्शो रूपरसो गन्धो भूतगुणा इमे । एकद्वित्रिचतुःपञ्चगुणा व्योमादिषु क्रमात् ॥ प्रतिध्वनिवियच्छब्दः वायौ बीसीति शब्दनम् । अनुष्णाशीतसंस्पर्शो वह्नौ भुगु भुगु ध्वनिः ॥ उष्णस्पर्शः प्रभारूपं जले बुलुबुलुध्वनिः । शीतस्पर्शः शुक्लरूपं रसो माधुर्यमीरितम् ॥ भूमौ कडकडाशब्दः काठिन्यं स्पर्श इष्यते । नीलादिकं चित्ररूपं मधुराम्लादिको रसः ॥"

अन्तःकरणोत्पत्तिः ] विषयपरिच्छेदः ३३७

उसी तरह आकाशनिष्ठ शब्द ही वायु आदि में भासित होता है, और उसी की 'यह वायु का शब्द है' ऐसी भ्रान्ति होती है।

सिद्धान्ती कहता है कि यह ठीक नहीं, क्योंकि बाधज्ञान होने पर ही पूर्वज्ञान भ्रम रूप सिद्ध होता है। परन्तु स्थूल वायु में प्रतीयमान शब्द-प्रतीति का कभी बाध नहीं होता। इस कारण उसे भ्रम मानना उचित नहीं। किन्तु पृथ्वी का एकमात्र गन्ध ही गुण मानना चाहिये, क्योंकि जल आदि में जो गन्ध की प्रतीति होती है, वह अन्वय-व्यतिरेक से पृथ्वी के सम्बन्ध से ही होती है—यह अनुभवसिद्ध है।

अब उपक्रमपूर्वक इन्द्रियादि-सृष्टि को बताते हैं—

इमानि भूतानि त्रिगुणमाया-कार्याणि त्रिगुणानि। गुणास्सत्त्व-रजस्तमांसि। एतैश्च सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतैर्व्यस्तैः$^१$ पृथक् पृथक् क्रमेण श्रोत्र-त्वक्चक्षू-रसन-घ्राणाख्यानि पञ्च$^२$ ज्ञानेन्द्रियाणि जायन्ते। $^३$एतेभ्यः पुनराकाशादिगतसात्त्विकांशेभ्यो मिलितेभ्यो मनोबुद्धयहङ्कार-चित्तानि जायन्ते। श्रोत्रादीनां पञ्चानां क्रमेण दिग्वातार्कवरुणाश्विनोऽ-धिष्ठातृदेवताः। मन आदीनां$^४$ चतुर्णां क्रमेण चन्द्रचतुर्मुखशङ्करा-च्युता अधिष्ठातृ-देवताः।

**अर्थ—**ये (अपञ्चीकृत) भूत, त्रिगुणात्मक माया के कार्य होने से त्रिगुणात्मक रहते हैं। उनमें सत्त्वगुण से युक्त हुए पाँच भूतों से व्यक्तिशः यथाक्रम श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। परन्तु आकाशादिकों के एकत्र हुए सात्त्विक अंश से मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त उत्पन्न होते हैं। श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों की क्रमशः दिशा, वायु, सूर्य, वरुण और अश्विनीकुमार—ये अधिष्ठातृ-देवता हैं। मन आदि चारों के क्रम से चन्द्र, ब्रह्मदेव, शंकर और विष्णु—ये अधिष्ठातृ-देवता हैं।

**विवरण—**ये भूत, सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका माया से उत्पन्न होने के कारण त्रिगुणात्मक ही होते हैं। उनमें से प्रत्येक के सत्त्वांश से क्रमशः श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे—आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न होता है इत्यादि। वैसे ही इन पाँच भूतों के एकत्रित हुए सात्त्विकांश से मन इत्यादि अन्तःकरण-चतुष्टय उत्पन्न होता है। उनकी अधिष्ठातृदेवता अर्थात् श्रवणादि इन्द्रियों में श्रवण


१. 'स्तैर्यथाक्रमं श्रो०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'पञ्चेन्द्रियाणि'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'एतैरेव च सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतैर्मिलितैर्मनो०'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'नां क्र०'-इति पाठान्तरम् ।
२२ वे० प०

३३८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पञ्चप्राणोत्पत्तिः

आदि की शक्ति देकर उन पर अनुग्रह करने वाली दिशादि और चन्द्रादि देवताओं का मूल में ही निर्देश किया है ।

पंच कर्मेन्द्रियाँ और प्राणों की उत्पत्ति बताते हैं—

एतैरेव रजोगुणोपेतैः पञ्चभूतै^१र्व्यस्तैर्यथाक्रमं वाक्पाणिपादपायूपस्थान्यानि कर्मेन्द्रियाणि जायन्ते । तेषां च क्रमेण वह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युप्रजापतयोऽधिष्ठातृ-देवताः । रजोगुणोपेतैः पञ्चभूतैरेव^२ मिलितैः पञ्च वायवः प्राणापान-व्यानोदान-समानाख्या जायन्ते । तत्र प्राग्गमनवान् वायुः प्राणो नासादिस्थानवर्ती । अर्वाग्गमनवानपानः पाय्वादिस्थानवर्ती । विष्वग्गतिमान् व्यानः अखिलशरीरवर्ती । ऊर्ध्वगमनवानुत्क्रमणवायुरुदानः कण्ठस्थानवर्ती । अशितपीतान्नादिसमीकरणकरः समानः नाभिस्थानवर्ती ।

अर्थ— रजोगुण से युक्त हुए उन्हीं पांच भूतों से व्यक्तिशः यथाक्रम वाणी, हस्त, पाद, गुदद्वार और मूत्रेन्द्रिय—ये कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, और उनकी क्रमशः अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, विष्णु, मृत्यु और प्रजापति—ये अधिष्ठातृदेवताएँ हैं । रजोगुण से युक्त हुए इन पांच भूतों से ही मिलकर प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान-संज्ञक पाँच वायु उत्पन्न होते हैं । उनमें सर्वदा ऊर्ध्वगतिमान् वायु को 'प्राण' कहते हैं । और वह नासिकादिस्थान में रहता है । वैसे ही अधस्ताद् गमन करने वाले वायु को 'अपान' कहते हैं, और वह गुदादिस्थान में रहता है । शरीर में सर्वतः गमन करने वाले वायु को 'व्यान' कहते हैं और वह समस्त शरीर में वास करता है । जो वायु ऊर्ध्वगामी होकर उत्क्रमण में (खाये हुए अन्न को उलट कर गिराने में और परलोक गमन में) कारण होता है, उसे उदान कहते हैं । वह कण्ठ में रहता है । खाये हुए अन्न का या पीये हुए रस का समीकरण (समविभाग पाचन करने वाला) करने वाले को 'समान' कहते हैं, वह (मुख्यतः) नाभिस्थानवृत्ति होता है ।

विवरण— आकाश के रजोगुणात्मक अंश से वागिन्द्रिय उत्पन्न होती है । इसी क्रम से वायु आदि चार भूतों के प्रत्येक के पृथक्-पृथक् रजोंश से हस्तादि चार कर्मेन्द्रियाँ होती हैं और उनकी अग्न्यादि, अधिष्ठातृ (अनुग्राहक) देवता होती हैं । इसी प्रकार पांच भूतों के एकत्रित रजोंश से प्राणादिसंज्ञक पाँच वायु होते हैं । उनके लक्षण ऊपर बता चुके हैं । इस विषय में—


१. 'तैर्यथा'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'भूतैर्मि०'—इति पाठान्तरम् ।

भूतानाम्पञ्चीकरणम् ] विषयपरिच्छेदः ३३९

'हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले। उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः ॥' यह श्लोक प्रसिद्ध है। प्राण का स्थान बताते समय 'नासादि' यहाँ 'आदि' शब्द का प्रयोग इसीलिये किया है। तथापि प्राणादिकों के नासिकादिस्थान 'वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्' (ऐत०) श्रुति से व्यक्त होते हैं।

अब स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति और पञ्चीकरण प्रकार दिखलाते हैं।

'तैरेव तमोगुणोपेतैरपञ्चीकृतभूतैः पञ्चीकृतानि² जायन्ते। 'तासां³ त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि' (छा० ६-३-३.) इति श्रुतेः पञ्चीकरणोपलक्षणार्थत्वात्।

पञ्चीकरणप्रकारश्चेत्थम्—आकाशमादौ द्विधा विभज्य तयोरेकं भागं पुनश्चतुर्द्धा विभज्य तेषां⁴ चतुर्णामंशानां वाय्वादिषु चतुर्षु भूतेषु⁵ संयोजनम्। एवं वायुं द्विधा विभज्य तयोरेकं भागं पुनः चतुर्द्धा विभज्य तेषां चतुर्णामंशानामाकाशादिषु⁶ संयोजनम्। एवं तेज आदीनामपि। तदेवमेकैकभूतस्यार्द्धं स्वांशात्मकमर्द्धान्तरं चतु-⁷र्विधभूतमयमिति पृथिव्यादिषु स्वांशाधिक्यात्पृथिव्यादिव्यवहारः। तदुक्तम्—

'वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः' (ब्र० सू० २-४-२३) इति।

**अर्थ—**तमोगुण से युक्त हुए उन्हीं अपञ्चीकृतभूतों से पञ्चीकृत भूत होते हैं। क्योंकि 'उन तीन देवताओं में से एक-एक देवता को मैं त्रिवृत् त्रिवृत् करती हूँ' (छां० ६-३-३) इत्यादि त्रिवृत्करण श्रुति ही पञ्चीकरण का उपलक्षण है पञ्चीकरण का यह प्रकार है—प्रथमतः आकाश के दो भाग करें, उनमें से एक भाग के पुनः चार भाग करें। तब इन चार अंशों को (भागों को) क्रम से वायु आदि चार भूतों में मिला दें। इसी प्रकार वायु के प्रथमतः दो भाग कर उनमें से एक भाग के पुनः चार भाग करें, और उन्हें आकाशादि चार भूतों में मिला दें। इसी प्रकार तेज आदि भूतों का पञ्चीकरण समझ लेना चाहिये। इस रीति से एक-एक भूत का अर्ध भाग स्वांशात्मक


१. 'तैश्च तमो०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'तानि भूतानि'—इति पाठान्तरम्।
३. 'सां च त्रि'-इति पाठान्तरम्।
४. 'षां तु'-इति पाठान्तरम्।
५. 'षु योज०'-इति पाठान्तरम्।
६. 'षु योज०-इति पाठान्तरम्।
७. 'तुर्भुत'-इति पाठान्तरम्।

३४० | वेदान्तपरिभाषा | [ लिङ्गशरीरोत्पत्तिः

( उस भूत का अंशरूप ) होता है, और दूसरा अर्ध भाग चार भूतों का अष्टमांश रूप होता है । तथापि पृथिव्यादि चार भूतों में स्वयं के अंश का ही आधिक्य होने से उनमें 'यह पृथिवी' इत्यादि व्यवहार ( शब्द प्रयोग ) होता है । इसी कारण कहा गया है कि 'पृथिवी आदियों में उन्हीं के अंश का वैशेष्य ( आधिक्य ) होने से 'पृथिवी' आदि व्यवहार होता है ।

विवरण—अपञ्चीकृत भूतों के तमोगुणात्मक अंशों से पञ्चीकृत भूत ( स्थूलभूत ) होते हैं। छान्दोग्योपनिषद् में यद्यपि त्रिवृत्करण ही बताया है तथापि वह पञ्चीकरण का भी उपलक्षक ( संग्राहक ) है । वहाँ तेज, आप् और अन्न ( पृथिवी ) इन तीन भूतों की ही उत्पत्ति कही गई है। इस कारण त्रिवृत्करण ( तीनों का ही मेलन ) बताया है। उस पर से पाँच भूतों का ज्ञान होने के कारण उनके पञ्चीकरण करने में कोई विरोध नहीं है। मूल के उद्धृत ब्रह्मसूत्र में 'तद्वादः' पद की द्विरुक्ति अध्याय की समाप्ति दिखलाने के लिए है।

लिङ्ग-शरीर की उत्पत्ति दिखाते हैं—

'पूर्वोक्तै^२रपञ्चीकृतैर्लिङ्गशरीरं परलोकयात्रानिर्वाहकं मोक्षपर्यन्तं स्थायि मनोबुद्धिभ्यामुपेतं ज्ञानेन्द्रिय-पञ्चक-कर्मेन्द्रियपञ्चक-प्राणादि-पञ्चक-संयुक्तं जायते ।

तदुक्तम्—
पञ्च-प्राण-मनोबुद्धि-दशेन्द्रिय-समन्वितम् ।
अपञ्चीकृत-भूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं ^३भोगसाधनम् ॥१॥ इति ।

तच्च द्विविधं—परमपरं च^४ । तत्र परं हिरण्यगर्भ-लिङ्गशरीरम्,


१. अवयवातिरिक्तोऽपि अवयवी न अवयवारब्धः, किन्तु अवयवसामग्र्यैवारभ्यः । नहि नैयायिकसम्मतमुपादानकारणत्वं समवायित्वनिबन्धनं वेदान्तिनां सम्मतम् । वेदान्तिनो हि अवयविनि अवयवा विद्यन्ते तादात्म्येन, न अवयवेषु अवयवी, वृक्षे शाखा इत्येव अनुभवस्य विद्यमानत्वात् इति मन्यन्ते । तथा च-अपञ्चीकृतभूतकार्यारब्धत्वमेव सूक्ष्म-शरीरस्येति वादो न युक्तः ।
२. तैश्चापञ्चीकृतैर्भूतैलिङ्ग०-इति पाठान्तरम् ।
३. भोगसाधनम् स्थूलशरीरं भोगावच्छेदकम्, सूक्ष्मशरीरं तु अनुभवविशेषात्मक-भोगसाधनम् इति वैषम्यम् । नहि स्थूलशरीरं विना सूक्ष्मशरीरमात्रेण भोगः संभवति ! तदुक्तं चित्रदीपे—"स्थूलदेहं विना लिङ्गदेहो न क्वापि दृश्यते ।"
४. 'चेति'-इति पाठान्तरम् ।

अपरमस्मदादिलिङ्गशरीरम् । तत्र हिरण्यगर्भलिङ्ग शरीरं महत्तत्त्वम्, अस्मदादि-लिङ्गशरीरमहङ्कार¹ इत्याख्यायते ।

**अर्थ—**पूर्वोक्त अपञ्चीकृत ( सूक्ष्म ) भूतों के योग से ही परलोकगमनादि समस्त कार्यों का निर्वाहक ( कर्तृ ), मोक्ष तक स्थायी, लिङ्गशरीर उत्पन्न होता है । वह, ( लिङ्गशरीर ) मन, बुद्धि, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय और पञ्चप्राणों से युक्त रहता है । ( उक्तार्थ में मैत्रेयोपनिषद् का प्रमाण देते हैं ) इसी कारण यह वचन है—पाँच-प्राण, मन, बुद्धि और दस इन्द्रियों से युक्त एवं अपञ्चीकृत भूतों से बना हुआ सूक्ष्म-शरीर, भोग का साधन है । वह लिङ्गशरीर पर-अपर भेद से द्विविध है । उनमें हिरण्य-गर्भ का लिङ्गशरीर 'पर' ( व्यापक ) होता है और हम लोगों का लिङ्गशरीर 'अपर' ( अव्यापक ) होता है । हिरण्यगर्भ के लिङ्ग-शरीर की 'महत्तत्त्व' संज्ञा है और हमारे लिङ्ग-शरीर को 'अहंकार' कहा जाता है ।

**विवरण—**शुद्ध आत्मा व्यापक एवं निष्क्रिय होने से उसका परलोक में गमन और वहाँ से पुनः आगमन होना सम्भव नहीं और स्थूल देह तो यहीं भस्म हो जाता है । इस कारण परलोकगमन आदि की उपपत्ति लगाने के लिए मोक्ष तक स्थिर रहने वाले सप्तदश-अवयवात्मक लिङ्ग-शरीर का अवश्य स्वीकार करना चाहिए । यहाँ जो पर एवं अपर संज्ञाएं बताई गई हैं उन्हें समष्टि एवं व्यष्टि भी कहते हैं ।

एवं तमोगुणयुक्तेभ्यः पञ्चीकृतभूतेभ्यो भूम्यन्तरिक्ष-स्वर्मह-र्जनस्तपः-सत्या²त्मकस्योर्ध्वलोकसप्तकस्य ³अतलवितलसुतलतलातल-रसातलमहातलपातालाख्याधोलोकसप्तकस्य ब्रह्माण्डस्य जरायुजाण्डज-स्वेदजोद्भिज्जाख्य⁴चतुर्विध-स्थूलशरीराणां⁵मुत्पत्तिः । तत्र जरायुजानि जरायुभ्यो जातानि मनुष्य-पश्वादिशरीराणि । अण्डजानि अण्डेभ्यो जातानि पक्षि-पन्नगादिशरीराणि । स्वेदजानि⁶ स्वेदाज्जातानि यूका⁷मशकादीनि । उद्भिज्जानि ⁸भूमिमुद्भिद्य जातानि वृक्षादीनि । वृक्षा-दीनामपि पापफल-भोगायतनत्वेन शरीरत्वम् ।


१. 'तत्त्वमित्या०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्याख्यस्या०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'अतल-पाताल-वितल-सुतल-तलातल-रसातल-महातलाख्यस्याधो'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'रूपाणां'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'णां चोत्प०'-इति पाठान्तरम् ।
६. 'नि तु'-इति पाठान्तरम् ।
७. 'क-मश'-इति पाठान्तरम् ।
८. 'तु'-इति पाठान्तरम् ।

३४२ | वेदान्तपरिभाषा | [ भौतिकसृष्टिः

अर्थ—इस प्रकार तमोगुणयुक्त पञ्चीकृत भूतों से भूमि, आकाश, स्वर्ग, महर्, जन, तपस् और सत्य—इन सात ऊर्ध्व लोकों की और अतल, वितल, भुतल, तलातल, रसातल, महातल, पाताल—इन सात अधोलोकों की ( ब्रह्माण्ड की ) एवं जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चतुर्विध स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है। उनमे जरायु से उत्पन्न हुए मनुष्य एवं पशु आदि के शरीर 'जरायुज' कहलाते हैं। अण्ड से उत्पन्न होनेवाले पक्षी-सर्प आदि के शरीर 'अण्डज' कहलाते हैं। घर्म ( पसीना ) से उत्पन्न होनेवाले जू, मक्खी आदि कीटकों के शरीर 'स्वेदज' कहलाते हैं। भूमि को भेदकर ऊपर आनेवाले वृक्षादि के शरीर को 'उद्भिज्ज' कहते हैं। वृक्षादि भी पापफल के भोग के स्थान होने से उन्हें भी शरीरत्व है।

विवरण—पञ्चीकृत भूतों से चतुर्दश भुवन (ब्रह्माण्ड), एवं चतुर्विध प्राणिशरीरों की उत्पत्ति होती है। वृक्षादिकों के भी शरीर होते हैं—यह कैसे ज्ञात हुआ ? क्योंकि अन्य प्राणियों की तरह उनकी प्रवृत्ति या कहीं आना-जाना भी नहीं दीखता। इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि वृक्ष आदिकों के भी शरीर होते हैं। क्योंकि 'आत्मनो भोगायतनं शरीरम्'—आत्मा के भोग के स्थान को 'शरीर' कहते हैं—यह शरीर का लक्षण है। वृक्षादिक भी पूर्वकृत पापकर्म के उपभोग लेने के स्थान हैं। 'शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः'—मनुष्य, शरीरजन्य कर्मदोषों से स्थावरयोनि को पाते हैं—इत्यादि स्मृति इस विषय में प्रमाण हैं। वैसे ही उनमें किये घाव भी भर जाते हैं। इत्यादि अनुभव से उनकी विशिष्ट योनि होना सिद्ध होता है।

आधुनिक प्राणिशरीर एवं घट-पटादि कार्य मनुष्यजन्य होते दीखते हैं। तब 'ईश्वर, समस्त जगत् का कर्ता है' यह कथन कैसे सम्भव हो सकता है ?

उत्तर देते हैं—

'तत्र परमेश्वरस्य पञ्चतन्मात्रायुत्पत्तौ सप्तदशावयवोपेतलिङ्गशरीरोत्पत्तौ हिरण्यगर्भ-स्थूलशरीरोत्पत्तौ च साक्षात्कर्तृत्वम्। इतर निखिलप्रपञ्चोत्पत्तौ हिरण्यगर्भादि द्वारा,—'हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० ६-३-२ ) इति श्रुतेः। हिरण्यगर्भो नाम मूर्तित्रयादन्यः प्रथमो जीवः।

स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।
आदिकर्त्ता स भूतानां ब्रह्माऽग्रे समवर्तत ॥ १ ॥


१. 'अत्र'-इति पाठान्तरम्।

प्रलयविभागः ] विषयपरिच्छेदः ३४३

'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य' ( यजु० १३-४, ऋ० सं० १०-१२०-१ ) इत्यादिश्रुतेः । एवं 'भूत-भौतिकसृष्टिर्निरूपिता ।

अर्थ--इन समस्त कार्यों में से पञ्चतन्मात्राओं की उत्पत्ति में एवं अवयवात्मक लिंग शरीर की उत्पत्ति में परमेश्वर को साक्षात् कर्तृत्व है इससे भिन्न समस्त प्रपञ्च की उत्पत्ति हिरण्यगर्भ के द्वारा होता है । '( वह सदाख्य देवता ) अब मैं इन तीन देवताओं में इस जीव से ( आत्मरूप से ) अनुप्रवेश कर नाम और रूप को व्यक्त करता हूँ—इस प्रकार ईक्षण करती हुई' यह श्रुति इस विषय में प्रमाण है ( छां० ६-३-२ ) । ब्रह्मा, विष्णु, महेश--इन तीन मूर्तियों से भिन्न हिरण्यगर्भसंज्ञक प्रथम जीव है । इस विषय में 'वही पहला शरीरी और वही पुरुष कहा जाता है । वह प्राणिमात्र का आदिकर्ता ब्रह्मा प्रथम उत्पन्न हुआ' हिरण्यगर्भ भूतों से पूर्व उत्पन्न हुआ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है । इस रीति से भूत-भौतिक सृष्टि का निरूपण किया गया ।

विवरण—पांच सूक्ष्म भूत, लिंग शरीर और हिरण्यगर्भाख्य आदिजीव की उत्पत्ति का परमेश्वर साक्षात् कर्ता है । उसके पश्चात् होनेवाली समस्त सृष्टि को हिरण्यगर्भ के द्वारा वह उत्पन्न करता है । यह उक्त श्रुति से ज्ञात होने के कारण उक्त दोष नहीं हो पाता । क्योंकि आधुनिक कर्म भी ईश्वरानुग्रह के बिना नहीं होते, यह वेदान्त सिद्धान्त है । समस्त लिंग ( सूक्ष्म ) शरीरों के अभिमानी प्रथम जीव को 'हिरण्यगर्भ' कहते हैं । इस विषय में श्रुतियों के अनेक आधार दिये गये हैं । आदि शब्द से 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्' ( श्वे० ६-१८ ) इत्यादि श्रुतियों को समझना चाहिए ।

इस प्रकार भूत एवं भूतकार्यों की उत्पत्ति बताकर ग्रन्थकार कहते हैं—

इदानीं प्रलयो निरूप्यते । प्रलयो नाम त्रैलोक्य-नाशः, स च ^२चतुर्विधः-नित्यः प्राकृतो नैमित्तिक आत्यन्तिकश्चेति । तत्र नित्यः प्रलयः-सुषुप्तिः, तस्याः सकलकार्य-प्रलयरूपत्वात् । धर्माधर्मपूर्वसंस्काराणां च तदा कारणात्मनाऽवस्थानम् । तेन ^३सुषुप्तोत्थितस्य न सुखदुःखाद्य^४नुभवानुपपत्तिः । न वा स्मरणानुपपत्तिः । न च


१. एतावता प्रपञ्चेन "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इति श्रुतिर्व्याख्याता । इतः परं 'यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' इति श्रुतिर्व्याख्यास्यते ।
२. नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विजाः ।
नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥"
३. 'सुप्तोत्थित'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'नुप'-इति पाठान्तरम् ।

३४४वेदान्तपरिभाषा[ नित्यप्रलयनिरूपणम्

सुषुप्तावन्तःकरणस्य विनाशे¹ तदधीनप्राणादिक्रियाऽनुपपत्तिः। वस्तुतः श्वासाद्यभावेऽपि तदुपलब्धेः पुरुषान्तरविभ्रममात्रत्वात् ²सुप्तशरीरोपलब्धिवत् ।

अर्थ—अब प्रलय का निरूपण किया जाता है। प्रलय का अर्थ है—त्रैलोक्य का नाश। वह नित्य, प्राकृत, नैमित्तिक और आत्यन्तिक भेद से चतुर्विध है। उनमें सुषुप्ति (निद्रा) नित्य प्रलय है क्योंकि वह समस्तकार्यप्रलयरूप होती है। और उस समय धर्म, अधर्म एवं पूर्वसंस्कार कारण रूप से रहते हैं। इस कारण निद्रा से उठे व्यक्ति के सुख-दुःखादिकों के अनुभव की अनुपपत्ति या स्मरण का असंभव नहीं हो पाता।

शंका—‘निद्रा में अन्तःकरण का नाश होता है’ यह माना जाय तो उसके (अन्तःकरण के) अधीन रहनेवाले प्राणादिकों के क्रिया की अनुपपत्ति होगी—ऐसी शंका करना ठीक नहीं। क्योंकि निद्रावस्था में वस्तुतः प्राण नहीं होते। किन्तु अन्य पुरुषों को जो उसकी प्रतीति होती है, वह निद्रित पुरुष के शरीर-प्रतीति के समान ही भ्रमरूप है।

विवरण—जगदुत्पत्ति का निरूपण करने के अनन्तर क्रमानुरूप जगत् की स्थिति का निरूपण करना था, परन्तु ‘स्थिति’ सर्वलोक प्रसिद्ध होने से ग्रन्थकार प्रलय का ही प्रारम्भ करते हैं। स्वर्ग, मृत्यु और पाताल—इन तीनों लोकों के लय को ही ‘प्रलय’ कहते हैं। प्राकृत और आत्यन्तिक प्रलय में सभी का नाश होता है, केवल त्रैलोक्य का ही नहीं होता। तथापि उसमें त्रैलोक्य का भी नाश हो ही जाने से प्राकृत-प्रलय के लक्षण पर अव्याप्ति दोष नहीं हो पाता। कूर्मपुराण में प्रलय के नित्यादि चार भेद कहे गये हैं। उनमें नित्यप्रलय का अर्थ है—निद्रा। क्योंकि निद्रा में समस्त कार्यों का लय होता है, यह अनुभवसिद्ध है। ‘सुषुप्तिकाले सकले विलीने’ इत्यादि श्रुति भी यही बता रही है।

शंका—‘निद्रावस्था में सबके साथ धर्म-अधर्म आदि का भी लय होता है’ तब जागृत हुए पुरुष को सुख-दुःखों का अनुभव कैसे हो सकेगा?’ इस शंका का ‘धर्माधर्म०’ आदि हेतु से समाधान किया गया है। निद्रा में धर्म, अधर्म और पूर्वानुभवों के संस्कार का आत्यन्तिक लय नहीं होता, किन्तु जैसे वृक्ष बीज में रहता है वैसे ही वे स्व-कारण में (अविद्या में) स्थित रहते हैं, इसी से निद्रित पुरुष जगता है। धर्माधर्मानुरूप क्रमशः सुख-दुःख को भोगता है, और पूर्वसंस्कारों के जागृत होने पर उसे पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण भी होता है।

शंका—‘निद्रा में समस्त कार्यों के साथ अन्तःकरण का भी लय होता है’ यह मानने पर सुप्त पुरुष के श्वासोच्छ्वासादि क्रियाएं नहीं हो सकेंगी, क्योंकि समस्त व्यापार मन के अधीन होते हैं।


१. ‘शेन’–इति पाठान्तरम् ।
२. ‘सुषुप्तश’–इति पाठान्तरम् ।

नित्यप्रलयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३४५

समाधान— वस्तुतः सुप्त पुरुष के श्वासोच्छ्वास आदि का भी लय ही होता है। क्योंकि सुप्त पुरुष को किसी प्रकार की कोई प्रतीति नहीं हुआ करती। किन्तु अन्य जागृत पुरुषों को उसके प्राणादि क्रिया की जो प्रतीति होती है, वह उस पुरुष के शरीर प्रतीति के तुल्य ही भ्रमरूप है, अर्थात् जैसे निद्रा में पुरुष को 'यह मेरा शरीर' इत्याकारक शरीर का ज्ञान न होने से उसकी दृष्टि में शरीरादिकों का भी अभाव होने के कारण ही अन्य लोगों को उसका शरीर दिखलाई पड़ने पर भी वह भ्रम ही है। इसी प्रकार उसमें रहनेवाले श्वासोच्छ्वासादि का ज्ञान भी मिथ्याज्ञान ही है। निद्रा भी एक व्यक्ति का प्रलय होने से, एक पुरुष का प्रलय होने पर भी वह दूसरे को ज्ञात नहीं हो पाता। यह उत्तर ग्रन्थकार ने दृष्टिसृष्टिवाद को मानकर (दृष्टि = वस्तु का ज्ञान ही सृष्टि = उत्पत्ति) दिया है। इस कारण प्रत्यक्षादिविरोध नहीं होता।

इस पर वादी की शंका और उसका समाधान—

न चैवं ¹सुप्तस्य परेतादविशेषः। ²सुप्तस्य हि लिङ्गशरीरं संस्कारात्मनाऽत्रैव वर्तते, प्रेतस्य तु लोकान्तरे इति वैलक्षण्यात्। यद्वा, अन्तःकरणस्य द्वे शक्ती—ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिश्चेति। तत्र ज्ञानशक्तिविशिष्टान्तःकरणस्य सुषुप्तौ विनाशः, न क्रियाशक्ति-विशिष्टस्येति प्राणाद्यवस्थानमविरुद्धम्। 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यति, अथास्मिन् प्राण³ एवैकधा भवति, अथैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति, (कौ० ३-२) 'सता ⁴सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' (छां ६-८-१) इत्यादिश्रुतिरुक्तसुषुप्तौ मानम्।

अर्थ— यह मानने पर 'निद्रित मनुष्य में और मृत मनुष्य में कोई अन्तर नहीं रहता।' यह शंका नहीं की जा सकती क्योंकि सुप्त मनुष्य का लिंग-शरीर संस्काररूप से यहीं रहता है। परन्तु मृत मनुष्य का लिङ्ग शरीर अन्य लोक (लोकान्तर) में रहता है। यह दोनों में अन्तर है। अथवा क्रियाशक्ति एवं ज्ञानशक्ति के भेद से अन्तःकरण की दो शक्तियां होती हैं। उनमें से ज्ञानशक्ति विशिष्ट अन्तःकरण का ही निद्रावस्था में नाश होता है। क्रियाशक्तिविशिष्ट का नहीं। इस कारण निद्रा में प्राणादिकों का रहना विरुद्ध नहीं है। 'जिस अवस्था में पुरुष समस्त विशेष-ज्ञानरहित होकर निद्रित रहता है तब किसी भी जाग्रद्वासनारूप पदार्थ को नहीं देखता, उस समय इस प्राण में ही (क्रियाशक्ति में ही) एकत्व को पाता है, तब इस प्राणोपाधिक आत्मा में वाणी


१. 'सुषुप्तस्य'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'सुषुप्तस्य'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'प्राण एकधा'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'सोम्य'—इति पाठान्तरम् ।

३४६वेदान्तपरिभाषा[ प्राकृतप्रलयनिरूपणम्

समस्त नाम के साथ लय को प्राप्त होती है। (कौ० ३-३) 'हे सोम्य, वह उस समय 'सत्' से सम्पन्न होता है। स्वयं को (आत्मा को) प्राप्त होता है।' (छां० ६-८-१) इत्यादि श्रुतियां उक्त सुषुप्ति में प्रमाण हैं।

विवरणशंका—'निद्रा में प्राण का भी अभाव रहता है।' यह कहने पर निद्रा और प्राणवियोगरूप मृत्यु, ये दोनों समान ही कहे जायेंगे।

समाधान—नहीं, क्योंकि सुप्त पुरुष का लिंगशरीर संस्काररूप से यहीं (इस लोक में ही) रहता है, परन्तु मृत मनुष्य का लिंगशरीर स्वर्ग-नरकादि परलोक में रहता है—इस कारण उन दोनों में भेद है। तथापि व्यवहार में अबाधितरूप से होने वाली श्वासोच्छ्वासादिप्रतीति को 'भ्रम' कैसे कहा जा सकेगा ? और उसे भ्रमरूप कहा जाय तो प्रत्यक्षादिप्रमाण पर किसी का विश्वास ही नहीं होगा। इस प्रकार पूर्व-समाधान पर अरुचि होने से दूसरा समाधान 'यद्वा' इत्यादि ग्रन्थ से कहा गया है।

अन्तःकरण की 'ज्ञान' और 'क्रिया' नाम की दो शक्तियां होती हैं। उनमें से 'ज्ञानशक्ति' का निद्रावस्था में लय हो जाता है। क्रियाशक्ति का लय नहीं होता। इस कारण क्रियाशक्तिमत् अन्तःकरण उस समय रहता ही है और प्राणादिक्रिया भी स्वरूपतः रहती है। अतः उसकी प्रतीति होती है। परन्तु यह मानने में आधार क्या है ? इसके उत्तर में श्रुतियों को आधार (प्रमाण) के रूप में प्रस्तुत करते हैं। 'प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न किञ्चन वेद'—'प्राज्ञ' आत्मा के साथ तादात्म्य को पाया हुआ यह जीव कुछ भी नहीं जानता। तस्मात् 'निद्रा' नित्य (दैनन्दिन) प्रलय है। अब क्रमप्राप्त प्राकृत प्रलय को बताते हैं—

प्राकृतप्रलयस्तु कार्यब्रह्म-विनाश-निमित्तकः सकल-कार्यनाशः। यदा तु प्रागेवोत्पन्न-ब्रह्मसाक्षात्कारस्य कार्यब्रह्मणो ब्रह्माण्डाधिकारलक्षणप्रारब्धकर्मसमाप्तौ विदेहकैवल्यात्मिका ^१परा मुक्तिः, तदा तल्लोकवासिनामप्युत्पन्नब्रह्मसाक्षात्काराणां ब्रह्मणा सह विदेहकैवल्यम्।

ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥ इति श्रुतेः।

अर्थ—प्राकृत प्रलय का अर्थ है कि कार्यब्रह्म (हिरण्यगर्भ) के विनाश से होनेवाला समस्त कार्यों का नाश। जब जिसे पहले ही ब्रह्मसाक्षात्कार हुआ हो ऐसे हिरण्यगर्भ को ब्रह्माण्ड पर अधिकार-सम्पादनरूप फलवाले प्रारब्ध कर्म की समाप्ति होकर


१. 'परम्'-इति पाठान्तरम्।

प्राकृतप्रलयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३४७

विदेहकैवल्य के साथ परम मोक्ष प्राप्त होता है, तब उस ब्रह्मलोक में रहनेवाले उपासकों को भी ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान होकर उस हिरण्यगर्भ के साथ ही विदेहमुक्ति मिलती है। क्योंकि 'महाप्रलय के प्राप्त होने पर हिरण्यगर्भ के अन्तसमय ( उसके अधिकार की परिसमाप्ति होने पर ) शुद्ध चित्त हुये ब्रह्मलोकनिवासी जिन्हें सम्यग्ज्ञान हुआ है, वे सब मुक्त होनेवाले हिरण्यगर्भ के साथ परमपद में प्रवेश करते हैं' यह श्रुति है।

**विवरण—**हिरण्यगर्भाख्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अधिकारी प्रथम जीव अर्थात् ईश्वर, ब्रह्मापरोक्षज्ञानवान् होने से जीवन्मुक्त ही है। परन्तु सकलब्रह्माण्डात्मक जगत् पर सत्ता चलाने का ( उसका नियमन करने का ) प्रारब्ध कर्म उसका अवशिष्ट होने से उसे तत्काल विदेहमुक्ति नहीं मिलती। अपितु उपासना के उत्कर्ष से उसे हिरण्यगर्भ का अधिकार मिल जाता है। अधिकारफलक उस प्रारब्ध कर्म का भोग से क्षय होने पर वह विदेहमुक्ति को पाता है अर्थात् ब्रह्मरूप होता है। उस समय जो समस्त कार्य का नाश होता है, वही प्राकृतप्रलय है। प्राकृतप्रलय के समय उपासना के बल से अर्चिरादि उत्तर मार्ग से ब्रह्मलोक में प्राप्त हुए ब्रह्मलोक-निवासियों को भी वह हिरण्यगर्भ ज्ञानोपदेश करता है और इस रीति से उन्हें भी ब्रह्मसाक्षात्कार के होने पर उसके साथ वे भी परम मुक्ति पाते हैं।

एवं ^१स्वलोकवासिभिः सह कार्ये ब्रह्मणि मुच्यमाने तदधिष्ठित-ब्रह्माण्ड ^२तदन्तर्वर्ति-निखिललोक-तदन्तर्वर्ति-स्थावरादीनां भौतिकानां भूतानां च प्रकृतौ मायायां^३ च लयः, न तु ब्रह्मणि, बाधरूप-विनाशस्यैव ब्रह्मनिष्ठत्वात् । अतः प्राकृत^४ इत्युच्यते ।

**अर्थ—**इस रीति से स्वलोकनिवासी लोगों के साथ हिरण्यगर्भ के मुक्त होते समय स्व-अधिष्ठित ब्रह्माण्ड, तदन्तर्गत भूरादि समस्त लोक और वहां के स्थावरादि ( चतुर्विध प्राणिजात ) भूत कार्यों का एवं आकाशादि पञ्चभूतों का प्रकृति में ( मूलकारणभूत माया में ही ) लय होता है, ब्रह्म में नहीं। क्योंकि बाधरूप विनाश ही ब्रह्मनिष्ठ होता है ( निवृत्तिरूप नहीं होता ) इसी कारण ( प्रकृति में लय होने के कारण ही ) इस प्रलय को प्राकृत कहते हैं।

**विवरण—**ब्रह्माण्डादि समस्त कार्य का प्रकृति में ( माया में ही ) लय होने से उसे प्राकृतलय कहते हैं। ब्रह्मज्ञान से अविद्यानिवृत्ति होने पर समस्त जगत् का जो बाधरूप नाश होता है वही ब्रह्मनिष्ठ होता है। इससे भिन्न, निवृत्तिरूप विनाश तन्निष्ठ


१. 'तल्लोकवा'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'ण्डान्तर्व'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'यां लयः'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'प्राकृतप्रलय'-इति पाठान्तरम् ।

३४८ | वेदान्तपरिभाषा | [ नैमित्तिकप्रलयनिरूपणम्

नहीं होता। इस कारण प्राकृतप्रलय में लीन होनेवाले अन्य जीवों की मुक्ति का प्रश्न नहीं उठता।

अब तीसरे नैमित्तिक प्रलय को बताते हैं—

कार्य-ब्रह्मणो दिवसावसान-निमित्तकस्त्रैलोक्यमात्र-प्रलयः नैमित्तिकप्रलयः। ब्रह्मणो¹ दिवसश्चतुर्युग-सहस्र-परिमित-कालः, 'चतुर्युग-सहस्राणि² ब्रह्मणो दिनमुच्यते' इति वचनात्। प्रलय-कालो दिवस-काल-परिमितः, रात्रिकालस्य दिवस³काल-तुल्यत्वात्।

अर्थ—हिरण्यगर्भ का दिन (दिवस) समाप्त होने से होनेवाले केवल त्रैलोक्य के लय को नैमित्तिकप्रलय कहते हैं। 'चतुर्युग सहस्रन्तु ब्रह्मणो दिनमुच्यते'--ब्रह्मा का दिन एक हजार चतुर्युग (चोकड़ी) का कहा जाता है--इस पुराणवचन के अनुसार एक हजार चतुर्युगात्मक काल के पूर्ण होने पर ब्रह्म का दिन पूर्ण होता है। प्रलय-काल भी दिन के परिमाण के तुल्य ही होता है, क्योंकि रात्रिकाल भी दिनकाल के बराबर ही होता है।

विवरण--कृत, त्रेता, द्वापर और कलि--इन चार युगों को चतुर्युग कहते हैं। ऐसे हजार चतुर्युगों के बीतने में जितना काल लगता है, उतने समय में ब्रह्मदेव (हिरण्यगर्भ) का एक दिन होता है और उतने ही समय की रात्रि प्रारम्भ हो जाती है। उस समय वह सोता है, इस कारण केवल भू, भुवर् और स्वर् (स्वर्ग) इन तीन लोकों का नाश होता है। निद्रा निमित्त से होनेवाला यही नैमित्तिक प्रलय है।

प्राकृत प्रलय और नैमित्तिक प्रलय में प्रमाण बताते हैं—

प्राकृतप्रलये नैमित्तिक-प्रलये च पुराणवचनानि⁴।
द्विपरार्द्धे त्वतिक्रान्ते ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
तदा प्रकृतयः सप्त कल्प्यन्ते प्रलयाय हि॥
एष प्राकृतिको राजन् प्रलयो यत्र लीयते।
इति वचनं प्राकृत प्रलये मानम्।
एष नैमित्तिकः प्रोक्तः प्रलयो यत्र विश्वसृक्।
शेतेऽनन्तासने नित्यमात्मसात्कृत्य चाखिलम्॥
इति वचनं नैमित्तिकप्रलये मानम्।


१. 'ब्रह्मदिव'-इति पाठान्तरम्।
२. 'सहस्रन्तु'-इति पाठान्तरम्।
३. 'सतुल्य'-इति पाठान्तरम्।
४. 'नि प्रमाणानि'-इति पाठान्तरम्।

तुरीयप्रलयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३४९

अर्थ-- प्राकृतप्रलय और नैमित्तिकप्रलय के विषय में पुराणवचन इस प्रकार हैं—'ब्रह्मा के शतवर्षात्मक आयुष्य के पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध एवं परार्धों के अतिक्रान्त होने पर परमपद पर रहनेवाले ब्रह्मा का प्रलय होता है, उस समय महदादि सात प्रकृतियों का प्रलय होता है। हे राजन् ! जिसमें समस्त कार्य लीन होते हैं वह, यह वचन प्राकृत-प्रलय में प्रमाण है। 'जिसमें विश्वस्रष्टा शेषरूप आसन पर सबको आत्मसात् ( स्वयं में लीन ) कर सोता है वह नैमित्तिक प्रलय है। यह वचन नैमित्तिक-प्रलय के सद्भाव में प्रमाण है।

अब आत्यन्तिक प्रलय बताते हैं—

तुरीय-प्रलयस्तु ब्रह्मसाक्षात्कार-निमित्तकः सर्वमोक्षः । ^१स चैकजीववादे युगपदेव, नानाजीव-वादे तु क्रमेण । 'सर्वे एकीभवन्ति' इत्यादिश्रुतेः तत्राद्यास्त्रयोऽपि प्रलयाः कर्मोपरति ^२निमित्ताः, तुरीयस्तु ज्ञानोदय-निमित्तो लयोऽज्ञानेन सहैवेति विशेषः । एवं चतुर्विधप्रलयो निरूपितः ।

अर्थ— परब्रह्म के साक्षात्कार से होनेवाला सर्वमोक्ष, चतुर्थ ( आत्यन्तिक ) प्रलय है। 'एकजीववाद' पक्ष में वह एकदम ही ( युगपदेव ) होता है, किन्तु 'नानाजीववाद' पक्ष में क्रम से होता है। क्योंकि 'सब एक होते हैं' यह श्रुति है। ( अब तक बताये गये चार प्रलयों मे से ) पहले तीनों प्रलय कर्म के उपरम से होते हैं। किन्तु यह चौथा प्रलय, ज्ञानोत्पत्ति से होता है, इसमें अज्ञानसहित कर्मों का उपरम होता है, यह इसमें विशेष है। इस रीति से चार प्रकार के प्रलयों का निरूपण हुआ।

विवरण— तत्त्वज्ञान होने पर अविद्या और उसके समस्त कार्यों का प्रलय होता है। यह चौथा प्रलय है, इसी को 'सर्वमोक्ष' भी कहते हैं। समस्त जीवों को एक मानने पर एक जीव के मुक्त होते ही समस्त जीवों को एकदम मुक्त होना चाहिये। क्योंकि एकजीववादियों के मत में 'अविद्योपाधिक चैतन्य' ही 'जीव' होने से और उस अविद्या के एक होने से 'जीव' एक है। ऐसी स्थिति में एक जीव को तत्त्वज्ञान होते ही समस्त जीवों को एकदम तत्त्वज्ञान हो ही जाना चाहिये। और समस्त जीवों का एकदम प्रलय हो जाना चाहिये। परन्तु इस मत के अनुयायी बहुत न होने से और शुकनारदादिकों के मुक्त हो जाने पर भी अन्य लोगों को मुक्ति नहीं मिली—यह दिखलाई देने से ग्रन्थकार ने अनेकवादिसम्मत 'नानाजीव' वाद का उल्लेख किया है। इस मत में


१. स चैकजीववादे समष्टिजीवातिरिक्तव्यष्टिजीवाः परमार्थतो न सन्ति, तत्कल्पिता एवेमे नानाजीवा इति मते तादृशकल्पितजीवेन वस्तुसदात्मनो ज्ञानादिना मोक्षे सर्वमुक्तिरेव ।
२. 'रमति'-इति पाठान्तरम् ।

३५०वेदान्तपरिभाषा[ प्रलयक्रमनिरूपणम् ]

'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव' है, और अन्तःकरण अनेक हैं। अतः चैतन्य के एक होने पर भी चैतन्योपाधि के अनेक होने से जीव भिन्न हैं। इस कारण चैत्र-व्यक्ति को तत्त्वज्ञान होने के कारण उसके मुक्त होने पर भी मैत्रव्यक्ति का मुक्त होना सम्भव नहीं। एक की मुक्ति से सब मुक्त नहीं होंगे। प्रथम कहे हुये तीन प्रकारों में किसी विशेष कारण से हुई कर्म की उपरति से प्रलय होता है। किन्तु इस ज्ञाननिमित्तक प्रलय में समस्त कर्म और उनके मूलकारण अविद्या का प्रलय होता है। इस रीति से तत्त्व-ज्ञान के कारण अविद्या का उच्छेद होने से बीजनिवृत्ति हो जाने से पुनरावृत्ति, न होना ही इस प्रलय में विशेष है।

अब प्रलय के क्रम को बताते हैं—

तस्येदानीं क्रमो निरूप्यते—

भूतानां भौतिकानां च न कारणलयक्रमेण लयः। कारणलयसमये कार्याणामाश्रया¹न्तराभावेनावस्थानानुपपत्तेः। किन्तु सृष्टिक्रमविपरीतक्रमेण तत्तत्कार्यनाशे तत्तज्जनकादृष्ट-नाशस्यैव प्रयोजकतया उपादाननाशस्याप्रयोजकत्वात्। अन्यथा न्यायमतेऽपि। महाप्रलये पृथिवी-परमाणु-गतरूप-गन्धरसादेरविनाशापत्तेः।

अर्थ— अब उस प्रलय के क्रम का निरूपण करते हैं। भूत और उनसे उत्पन्न पदार्थों के लय का क्रम, कारण से कार्य की ओर नहीं होता। क्योंकि कारणलय के समय कार्य का अन्य आश्रय न रहने से उसकी स्थिति नहीं बन सकती। अतः जिस क्रम से सृष्टि उत्पन्न होती है उसके विपरीत क्रम से लय होता है। किसी भी कार्य के नाश में उसके जनकभूत अदृष्ट का नाश ही प्रयोजक होता है। उस कार्य के उपादान कारण का नाश प्रयोजक नहीं होता। अन्यथा न्यायमत के तुल्य महाप्रलय के होने पर भी पृथिवीपरमाणुओं में विद्यमान रूपरसादि गुणों के नाश न होने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा।

विवरण— भूतों की उत्पत्ति का क्रम जैसा श्रुति में बताया है 'तस्माद्वा एतस्मा-दात्मन आकाशः संभूतः, आकाशाद् वायुः'—ऐसे ही लय का भी क्रम होना चाहिये। किन्तु वह क्रम, उत्पत्तिक्रम से विपरीत होता है। कार्य, कारण में लीन होता है। और वह कारण, जिस कारण का कार्य होगा उस कारण में लीन होता है। जैसे पृथिवी, जल में लीन होती है, जल अग्नि में लीन होता है इत्यादि। परन्तु नैयायिकों का मत, इसके विरुद्ध है। उनका कहना है कि प्रथम कारण का लय (नाश) होता है पश्चात् कार्य का। उस पर वेदान्ती का उत्तर है कि प्रथम कारण का लय होने पर कार्य निराधार रहेगा। मृत्तिका का लय यदि प्रथम हो जाय, तो मृत्तिकाविकाररूपघट, किसके आश्रय


१. 'यमन्तरेणावस्था०'—इति पाठान्तरम्।

प्रलयक्रमनिरूपणम्विषयपरिच्छेदः३५१

से रहेगा ? इसलिये कार्य का लय कारण में होता है, यही क्रम मानना चाहिए। ब्रह्म-सूत्र के द्वितीय अध्याय के तृतीय पाद में 'विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च' ऐसा सिद्धान्त सूत्र है। जिस क्रम से सीढ़ी पर चढ़ते हैं उसके ठीक विपरीत क्रम से उतरते हैं। घट, शराव आदि पदार्थ लय होते समय मृत्तिका के स्वरूप को पाते हैं और हिम इत्यादि जल की स्थिति में हो जाते हैं। इस प्रकार पृथ्वी, जल से उत्पन्न हुई है अतः उसका लय जल में होता है यह प्रलयक्रम जानना चाहिये।

वेदान्तियों के मत में कार्य के नाश में उसके (कार्य के) उपादान-कारण का नाश प्रयोजक (कारण) न होकर उस कार्य के उत्पन्न होने में जो अदृष्ट (अपूर्व) कारणीभूत हुआ है उसका नाश ही उसमें प्रयोजक (कारण, हेतु) है।

नैयायिकों के मत के अनुसार उपादान-कारण का नाश, कार्य के नाश में कारण मानें तो महाप्रलय के समय पृथ्वी के परमाणुओं में विद्यमान रूप, रस, गन्ध आदि गुणों का नाश नहीं हो सकेगा। क्योंकि नैयायिकों के मत में परमाणु नित्य होते हैं, उनका नाश न होने से तद्गत गुणों का भी नाश नहीं, और उनका नाश नहीं हुआ तो महाप्रलय कैसा ? इसलिए रूपादिकों के जनक अदृष्ट विशेष का नाश होने पर समवायिकारण के रहते भी रूपादिकों का नाश होता है—यही मानना चाहिये। अर्थात् कारणलय-क्रम से प्रलय को न मानकर कार्यलयक्रम से ही मानना चाहिये।

तथा च पृथिव्या अप्सु, अपां तेजसि, तेजसो वायौ, वायोराकाशे, आकाशस्य जीवाहङ्कारे, तस्य हिरण्यगर्भाहङ्कारे, तस्य चाविद्यायामित्येवंरूपाः^१ प्रलयाः। तदुक्तं विष्णुपुराणे—

जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे ! पृथिव्यप्सु प्रलीयते।
तेजस्यापः प्रलीयन्ते तेजो वायौ प्रलीयते ॥ १ ॥
वायुश्च लीयते व्योम्नि तच्चाव्यक्ते प्रलीयते।
अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् ! निष्कले ^२संप्रलीयते ॥ २ ॥ इति।

एवंविध-प्रलय-कारणत्वं तत्पदार्थस्य ब्रह्मणस्तटस्थलक्षणम्।

अर्थ— इस रीति से पृथ्वी का लय जल में, जल का तेज में, तेज का वायु में, वायु का आकाश में, आकाश का जीवाहंकार में, जीवाहंकार का हिरण्यगर्भाहङ्कार में और उसका अविद्या में प्रलयक्रम समझना चाहिये। विष्णुपुराण में ऐसा कहा है कि 'हे देवर्षे ! जगत् की आधारभूत पृथ्वी, जल में लीन होती है, जल तेज में, तेज वायु में


१. 'प एव प्रलय०'—इति पाठान्तरम्।
२. 'च प्र०'—इति पाठान्तरम्।

४५२ | वेदान्तपरिभाषा | [ सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम्

वायु आकाश में और आकाश अव्यक्त में और अव्यक्त निष्कल पुरुष में लीन होता है।" 'तत्त्वमसि'-महावाक्य के 'तत्' पद का अर्थ जो ब्रह्म, उसका 'ऐसे प्रलय का कारण होना' यही तटस्थलक्षण है।

विवरण—स्थूल भूतों की उत्पत्ति, जीवाहंकार से तो कहीं बताई नहीं गई। अपञ्चीकृत भूतों से पञ्चीकरण होने पर स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति बताई गई है। ऐसी स्थिति में उनका जीवाहङ्कार में लय होना कैसे बताया जा रहा है।

समाधान—अपञ्चीकृत भूतों के कतिपय अंशों से लिग शरीर के अवयव उत्पन्न कर अवशिष्ट अंशों का पञ्चीकरण कर स्थूलभूतों को उत्पन्न किया गया है। इस कारण स्थूल भूतों के लय के समय लिंगशरीरावयवान्तर्गत अपञ्चीकृत भूतों के अतिरिक्त अन्य अपञ्चीकृत भूतों का अस्तित्व न रहने से महाभूतों का जीवर्लिंग शरीर में (जीवाहंकार में) विलय बताया गया है (मूल में जीवाहंकार शब्द जीवर्लिंग शरीर के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है)।

जीवर्लिंगशरीर, हिरण्यगर्भलिंगशरीर से उत्पन्न होने के कारण उसका लय, हिरण्यगर्भाहंकार में बताया गया है और उसका अविद्या में लय बताया है। क्योंकि अविद्या, मूलोपादान है अतः उपलक्षण से अविद्या का परमात्मा में शक्तिरूप से लय होना चाहिये।

यहाँ तक सविस्तार निरूपण किये गये प्रलयपदार्थ से घटित ब्रह्मशब्द के तटस्थ-लक्षण को बताया गया।

अब ब्रह्म के 'जगत्कारण' रूप लक्षण पर होने वाले एक दोष का निरसन करते हैं।

ननु वेदान्तैर्ब्रह्मणि जगत्कारणत्वेन प्रतिपाद्यमाने सति सप्रपञ्चं । ब्रह्म स्यादन्यथा 'सृष्टिवाक्यानामप्रामाण्यापत्तेरिति चेत् । न । न हि सृष्टिवाक्यानां सृष्टौ तात्पर्यं किन्तु अद्वितीये ब्रह्मण्येव ।


१. सृष्टिवाक्यानि अपि वेदान्तवाक्यानि, अद्वितीयवाक्यमपि वेदान्तवाक्यम् इति तुल्यबलत्वात् सृष्टिवाक्यप्रसक्तस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मणि निषेधो नोपपन्नः। किन्तु वेदान्तवाक्यत्वेन साम्येऽपि निषेधवाक्यानाम् अपच्छेदन्यायेन प्राबल्यमिति तत्र तन्निषेधः उपपद्यते।

ननु अपच्छेदन्यायो न प्रमामाण्याऽप्रामाण्यविषयः, किन्तु अनुष्ठानाऽननुष्ठानविषय एव। एवं च "अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति, नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति" इति वाक्ययोरुभयोरपि बोधकत्वेन अबाधितार्थविषयत्वलक्षणप्रामाण्यस्य स्वीकारेण उपपत्तिर्भवति। तेन न्यायेन ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न बाधितम्, श्रुतिबोधितत्वात्। इति स्वीकर्तव्यमिति चेत् सृष्टिवाक्यानां पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्वलक्षणप्रामाण्यानङ्गीकारात् निष्प्रपञ्चब्रह्मबोधनमद्वितीयवाक्येन सम्भवत्येव। अतिरात्रविधिनिषेधवाक्ययोरुभयोरपि व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्वलक्षणं प्रामाण्यमेवस्वीक्रियते इति वैषम्यम्।

सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३५३

अर्थ—वेदान्तवाक्यों के द्वारा ब्रह्म को 'जगत्कारण' बताये जाने पर ब्रह्म को प्रपञ्चयुक्त मानना पड़ेगा। यदि ऐसा न मानें तो वेदान्त में पढ़े गये सृष्टि प्रतिपादक वाक्यों को अप्रमाण कहना होगा। उत्तर में कहते हैं—नहीं, वेदान्त के सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों का सृष्टि के कथन में तात्पर्य न होकर ब्रह्म के अद्वय प्रतिपादन में तात्पर्य है।

विवरण--'अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निष्कले च प्रलीयते'--अव्यक्त, निष्कल पुरुष में विलीन होता है—इससे जगत् साक्षात् या परम्परा से परमात्मा में विलीन होता है। इस स्मृति से ब्रह्म को जगत् का उपादान कारण कहना होगा। तब मृत्तिका के जैसे घट-शरावादि प्रपञ्च, वैसे ही जगत् को ब्रह्म का प्रपञ्च कहना होगा। क्योंकि ब्रह्म 'प्रपञ्चसहवर्तमान' होने से प्रपञ्च, ब्रह्मपदवाच्य होगा। और ऐसा न मानने पर वेदान्त में (तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः) बताये गये सृष्टिवाक्यों की क्या गति होगी? अर्थात् वे अप्रमाण होंगे। इस पर ग्रंथकार उत्तर देते हैं कि वेदान्त के सृष्टि-वाक्यों का उद्देश्य सृष्टिप्रतिपादन में नहीं है, अपितु 'ब्रह्म, अद्वितीय है'—यह बताने में है। इसी बात को अग्रिम ग्रंथ से कहते हैं—

तत्प्रतिपत्तौ कथं सृष्टेरुपयोगः ? । इत्थम्—यदि सृष्टिमनुपन्यस्य निषेधो ब्रह्मणि प्रपञ्चस्य प्रतिपाद्येत, तदा ब्रह्मणि ²निषिद्धस्य प्रपञ्चस्य वायौ प्रतिषिद्धस्य रूपस्येव ब्रह्मणोऽन्यत्रावस्थानशङ्कायां न निर्विचिकित्समद्वितीयत्वं प्रतिपादितं स्यात् । ततः सृष्टिवाक्याद् ब्रह्मणोपादेयत्व-ज्ञाने सत्युपादानं विना कार्यस्यान्यत्र सद्भावशङ्कायां निरस्तायां नेति नेतीत्या³दीनां ब्रह्मण्यपि तस्यासत्त्वोपपादने ⁴प्रपञ्चस्य तुच्छत्वावगमे निरस्ताखिलद्वैतविभ्रममखण्डं सच्चिदानन्दैकरसं ब्रह्म सिद्धयतीति परम्परया सृष्टिवाक्यानाम⁵प्यद्वितीये ब्रह्मण्येव तात्पर्यम् ।⁶

अर्थ—सृष्टि का (सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों का) ब्रह्मज्ञान करा देने में उपयोग कैसे होता है ? (उत्तर)—इस रीति से उपयोग होता है—सृष्टि का उपन्यास न कर प्रपञ्च का ब्रह्म में यदि निषेध कहें तो उस निषिद्ध प्रपञ्च की ब्रह्म से अन्यत्र स्थिति की


१. 'णिप्रतिपा'-इति पाठान्तरम् ।२. 'प्रतिषि'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'त्यादिना'-इति पाठान्तरम् ।४. 'नेन'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'मद्वितीये'-इति पाठान्तरम् ।

६. आनन्दस्वरूपस्यैव प्रमाणान्तराऽगृहीतत्वादप्राप्ते शास्त्रमर्थवत् इति न्यायेन तत्रैव तात्पर्यमिति । अर्थात् सर्वाणि कारणतापरवाक्यानि सृष्टिवाक्यानि अद्वितीयब्रह्मस्वरूप-प्रतिपादनार्थानीति भावः ।

३५४वेदान्तपरिभाषा[ सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम्

आशंका हो सकती है, जैसे—वायु में रूप का निषेध करने पर, उससे अन्यत्र रूप की स्थिति की आशंका होती है। तब असन्दिग्ध अद्वैत नहीं बता पाये—कहा जायगा। अतः सृष्टिवाक्यों से 'जगत्, ब्रह्मोपादानक है' यह ज्ञान होने पर 'उपादान के बिना कार्य का अन्यत्र रहना असंभव है'—इस प्रकार आशंका का निरास हो जाता है। 'नेति-नेति' वाक्य से ब्रह्म में ही प्रपञ्च का असत्त्व बताये जाने पर प्रपञ्च की तुच्छता का ज्ञान होता है। और समस्तद्वैत, विभ्रमरहित, अखण्ड, सच्चिदानन्दघन एक ब्रह्म ही सिद्ध होता है। इस रीति से सृष्टिवाक्यों का पर्याय से अद्वितीय ब्रह्म में ही पर्य-वसान होता है।

विवरण--सृष्टि का प्रस्ताव न कर ब्रह्म में प्रपञ्च का अभाव यदि कहा होता तो प्रपञ्च का कारण अन्य कोई होना चाहिये—यह आशंका होना स्वाभाविक है। उससे ब्रह्म के अद्वितीयत्व में बाध होता है। इसलिये सृष्टिवाक्यों से प्रपञ्च की उत्पत्ति, ब्रह्म से बताकर उसका निराकरण किया है। और इस रीति से एकमेवाद्वितीय ब्रह्म की सिद्धि की गई है। इस कारण सृष्टिवाक्यों का वाच्यार्थ ग्रहण न कर 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः'—जिसमें शब्द का तात्पर्य हो वही उस शब्द का अर्थ है—इस उक्ति के अनुसार सृष्टिवाक्यों कायथाश्रुत अर्थ ग्रहण न कर तात्पर्यार्थ का ग्रहण करना चाहिये। जैसे 'विषं भुंक्ष्व' वाक्य का वाच्यार्थ 'विष भक्षण कर' है। परन्तु वह उद्दिष्ट न होकर 'शत्रुगृह में भोजन करने की अपेक्षा विष खाना अच्छा' इस न्याय से इस वाक्य का तात्पर्यार्थ 'शत्रुगृह में भोजन मत करो' यही लेना पड़ता है। अतः सृष्टिवाक्यों का वाच्यार्थ ग्रहण न कर ब्रह्माद्वितीयत्वप्रतिपादक तात्पर्यार्थ ग्रहण करने पर सृष्टिवाक्य अप्रमाण नहीं होते।

शंका—सृष्टिवाक्यों से अद्वितीय ब्रह्म का बोध होने पर भी असन्दिग्ध अद्वितीय ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकेगा। क्योंकि वेदान्त के "य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः (छा० ६-७-८) आदि वाक्यों में सगुण ब्रह्म का प्रतिपादन किया है। यह आशंका कर ग्रन्थकार कहते हैं—

'उपासनाप्रकरणपठितसगुणब्रह्मवाक्यानां² चोपासनाविध्यपेक्षित-गुणारोपमात्रपरत्वं, न गुणपरत्वम्। निर्गुणप्रकरणपठितानां सगुण-वाक्यानां तु निषेधवाक्यापेक्षितनिषेध्य³सम्पादकत्वेन विनियोग इति न किञ्चिदपि वाक्यमद्वितीयब्रह्मप्रतिपादने विरुध्यते।


१. ननु भवतु सृष्टिवाक्यानां कथमपि निषेधशेषत्वेन अद्वितीयब्रह्मप्रतिपत्त्युपायत्वम्। किन्तु हिरण्मयः, सत्यकामः, सत्यसंकल्पः इत्यादिवाक्यानां स्वत एव सफलोपासनावाक्य-गम्यानां न निषेधशेषत्वं संभवति। यथा च तैः सद्वितीयत्वं ब्रह्मणः सिद्धम् इत्याशंकाया-माह उपासनेति।
२. 'नामुपास'—इति पाठान्तरम्।
३. 'समर्पकत्वेन'—इति पाठान्तरम्।