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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३४० | वेदान्तपरिभाषा | [ लिङ्गशरीरोत्पत्तिः

( उस भूत का अंशरूप ) होता है, और दूसरा अर्ध भाग चार भूतों का अष्टमांश रूप होता है । तथापि पृथिव्यादि चार भूतों में स्वयं के अंश का ही आधिक्य होने से उनमें 'यह पृथिवी' इत्यादि व्यवहार ( शब्द प्रयोग ) होता है । इसी कारण कहा गया है कि 'पृथिवी आदियों में उन्हीं के अंश का वैशेष्य ( आधिक्य ) होने से 'पृथिवी' आदि व्यवहार होता है ।

विवरण—अपञ्चीकृत भूतों के तमोगुणात्मक अंशों से पञ्चीकृत भूत ( स्थूलभूत ) होते हैं। छान्दोग्योपनिषद् में यद्यपि त्रिवृत्करण ही बताया है तथापि वह पञ्चीकरण का भी उपलक्षक ( संग्राहक ) है । वहाँ तेज, आप् और अन्न ( पृथिवी ) इन तीन भूतों की ही उत्पत्ति कही गई है। इस कारण त्रिवृत्करण ( तीनों का ही मेलन ) बताया है। उस पर से पाँच भूतों का ज्ञान होने के कारण उनके पञ्चीकरण करने में कोई विरोध नहीं है। मूल के उद्धृत ब्रह्मसूत्र में 'तद्वादः' पद की द्विरुक्ति अध्याय की समाप्ति दिखलाने के लिए है।

लिङ्ग-शरीर की उत्पत्ति दिखाते हैं—

'पूर्वोक्तै^२रपञ्चीकृतैर्लिङ्गशरीरं परलोकयात्रानिर्वाहकं मोक्षपर्यन्तं स्थायि मनोबुद्धिभ्यामुपेतं ज्ञानेन्द्रिय-पञ्चक-कर्मेन्द्रियपञ्चक-प्राणादि-पञ्चक-संयुक्तं जायते ।

तदुक्तम्—
पञ्च-प्राण-मनोबुद्धि-दशेन्द्रिय-समन्वितम् ।
अपञ्चीकृत-भूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं ^३भोगसाधनम् ॥१॥ इति ।

तच्च द्विविधं—परमपरं च^४ । तत्र परं हिरण्यगर्भ-लिङ्गशरीरम्,


१. अवयवातिरिक्तोऽपि अवयवी न अवयवारब्धः, किन्तु अवयवसामग्र्यैवारभ्यः । नहि नैयायिकसम्मतमुपादानकारणत्वं समवायित्वनिबन्धनं वेदान्तिनां सम्मतम् । वेदान्तिनो हि अवयविनि अवयवा विद्यन्ते तादात्म्येन, न अवयवेषु अवयवी, वृक्षे शाखा इत्येव अनुभवस्य विद्यमानत्वात् इति मन्यन्ते । तथा च-अपञ्चीकृतभूतकार्यारब्धत्वमेव सूक्ष्म-शरीरस्येति वादो न युक्तः ।
२. तैश्चापञ्चीकृतैर्भूतैलिङ्ग०-इति पाठान्तरम् ।
३. भोगसाधनम् स्थूलशरीरं भोगावच्छेदकम्, सूक्ष्मशरीरं तु अनुभवविशेषात्मक-भोगसाधनम् इति वैषम्यम् । नहि स्थूलशरीरं विना सूक्ष्मशरीरमात्रेण भोगः संभवति ! तदुक्तं चित्रदीपे—"स्थूलदेहं विना लिङ्गदेहो न क्वापि दृश्यते ।"
४. 'चेति'-इति पाठान्तरम् ।