वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूतानाम्पञ्चीकरणम् ] विषयपरिच्छेदः ३३९
'हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले। उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः ॥' यह श्लोक प्रसिद्ध है। प्राण का स्थान बताते समय 'नासादि' यहाँ 'आदि' शब्द का प्रयोग इसीलिये किया है। तथापि प्राणादिकों के नासिकादिस्थान 'वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्' (ऐत०) श्रुति से व्यक्त होते हैं।
अब स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति और पञ्चीकरण प्रकार दिखलाते हैं।
'तैरेव तमोगुणोपेतैरपञ्चीकृतभूतैः पञ्चीकृतानि² जायन्ते। 'तासां³ त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि' (छा० ६-३-३.) इति श्रुतेः पञ्चीकरणोपलक्षणार्थत्वात्।
पञ्चीकरणप्रकारश्चेत्थम्—आकाशमादौ द्विधा विभज्य तयोरेकं भागं पुनश्चतुर्द्धा विभज्य तेषां⁴ चतुर्णामंशानां वाय्वादिषु चतुर्षु भूतेषु⁵ संयोजनम्। एवं वायुं द्विधा विभज्य तयोरेकं भागं पुनः चतुर्द्धा विभज्य तेषां चतुर्णामंशानामाकाशादिषु⁶ संयोजनम्। एवं तेज आदीनामपि। तदेवमेकैकभूतस्यार्द्धं स्वांशात्मकमर्द्धान्तरं चतु-⁷र्विधभूतमयमिति पृथिव्यादिषु स्वांशाधिक्यात्पृथिव्यादिव्यवहारः। तदुक्तम्—
'वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः' (ब्र० सू० २-४-२३) इति।
**अर्थ—**तमोगुण से युक्त हुए उन्हीं अपञ्चीकृतभूतों से पञ्चीकृत भूत होते हैं। क्योंकि 'उन तीन देवताओं में से एक-एक देवता को मैं त्रिवृत् त्रिवृत् करती हूँ' (छां० ६-३-३) इत्यादि त्रिवृत्करण श्रुति ही पञ्चीकरण का उपलक्षण है पञ्चीकरण का यह प्रकार है—प्रथमतः आकाश के दो भाग करें, उनमें से एक भाग के पुनः चार भाग करें। तब इन चार अंशों को (भागों को) क्रम से वायु आदि चार भूतों में मिला दें। इसी प्रकार वायु के प्रथमतः दो भाग कर उनमें से एक भाग के पुनः चार भाग करें, और उन्हें आकाशादि चार भूतों में मिला दें। इसी प्रकार तेज आदि भूतों का पञ्चीकरण समझ लेना चाहिये। इस रीति से एक-एक भूत का अर्ध भाग स्वांशात्मक
१. 'तैश्च तमो०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'तानि भूतानि'—इति पाठान्तरम्।
३. 'सां च त्रि'-इति पाठान्तरम्।
४. 'षां तु'-इति पाठान्तरम्।
५. 'षु योज०'-इति पाठान्तरम्।
६. 'षु योज०-इति पाठान्तरम्।
७. 'तुर्भुत'-इति पाठान्तरम्।