वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पञ्चप्राणोत्पत्तिः
आदि की शक्ति देकर उन पर अनुग्रह करने वाली दिशादि और चन्द्रादि देवताओं का मूल में ही निर्देश किया है ।
पंच कर्मेन्द्रियाँ और प्राणों की उत्पत्ति बताते हैं—
एतैरेव रजोगुणोपेतैः पञ्चभूतै^१र्व्यस्तैर्यथाक्रमं वाक्पाणिपादपायूपस्थान्यानि कर्मेन्द्रियाणि जायन्ते । तेषां च क्रमेण वह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युप्रजापतयोऽधिष्ठातृ-देवताः । रजोगुणोपेतैः पञ्चभूतैरेव^२ मिलितैः पञ्च वायवः प्राणापान-व्यानोदान-समानाख्या जायन्ते । तत्र प्राग्गमनवान् वायुः प्राणो नासादिस्थानवर्ती । अर्वाग्गमनवानपानः पाय्वादिस्थानवर्ती । विष्वग्गतिमान् व्यानः अखिलशरीरवर्ती । ऊर्ध्वगमनवानुत्क्रमणवायुरुदानः कण्ठस्थानवर्ती । अशितपीतान्नादिसमीकरणकरः समानः नाभिस्थानवर्ती ।
अर्थ— रजोगुण से युक्त हुए उन्हीं पांच भूतों से व्यक्तिशः यथाक्रम वाणी, हस्त, पाद, गुदद्वार और मूत्रेन्द्रिय—ये कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, और उनकी क्रमशः अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, विष्णु, मृत्यु और प्रजापति—ये अधिष्ठातृदेवताएँ हैं । रजोगुण से युक्त हुए इन पांच भूतों से ही मिलकर प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान-संज्ञक पाँच वायु उत्पन्न होते हैं । उनमें सर्वदा ऊर्ध्वगतिमान् वायु को 'प्राण' कहते हैं । और वह नासिकादिस्थान में रहता है । वैसे ही अधस्ताद् गमन करने वाले वायु को 'अपान' कहते हैं, और वह गुदादिस्थान में रहता है । शरीर में सर्वतः गमन करने वाले वायु को 'व्यान' कहते हैं और वह समस्त शरीर में वास करता है । जो वायु ऊर्ध्वगामी होकर उत्क्रमण में (खाये हुए अन्न को उलट कर गिराने में और परलोक गमन में) कारण होता है, उसे उदान कहते हैं । वह कण्ठ में रहता है । खाये हुए अन्न का या पीये हुए रस का समीकरण (समविभाग पाचन करने वाला) करने वाले को 'समान' कहते हैं, वह (मुख्यतः) नाभिस्थानवृत्ति होता है ।
विवरण— आकाश के रजोगुणात्मक अंश से वागिन्द्रिय उत्पन्न होती है । इसी क्रम से वायु आदि चार भूतों के प्रत्येक के पृथक्-पृथक् रजोंश से हस्तादि चार कर्मेन्द्रियाँ होती हैं और उनकी अग्न्यादि, अधिष्ठातृ (अनुग्राहक) देवता होती हैं । इसी प्रकार पांच भूतों के एकत्रित रजोंश से प्राणादिसंज्ञक पाँच वायु होते हैं । उनके लक्षण ऊपर बता चुके हैं । इस विषय में—
१. 'तैर्यथा'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'भूतैर्मि०'—इति पाठान्तरम् ।