वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तःकरणोत्पत्तिः ] विषयपरिच्छेदः ३३७
उसी तरह आकाशनिष्ठ शब्द ही वायु आदि में भासित होता है, और उसी की 'यह वायु का शब्द है' ऐसी भ्रान्ति होती है।
सिद्धान्ती कहता है कि यह ठीक नहीं, क्योंकि बाधज्ञान होने पर ही पूर्वज्ञान भ्रम रूप सिद्ध होता है। परन्तु स्थूल वायु में प्रतीयमान शब्द-प्रतीति का कभी बाध नहीं होता। इस कारण उसे भ्रम मानना उचित नहीं। किन्तु पृथ्वी का एकमात्र गन्ध ही गुण मानना चाहिये, क्योंकि जल आदि में जो गन्ध की प्रतीति होती है, वह अन्वय-व्यतिरेक से पृथ्वी के सम्बन्ध से ही होती है—यह अनुभवसिद्ध है।
अब उपक्रमपूर्वक इन्द्रियादि-सृष्टि को बताते हैं—
इमानि भूतानि त्रिगुणमाया-कार्याणि त्रिगुणानि। गुणास्सत्त्व-रजस्तमांसि। एतैश्च सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतैर्व्यस्तैः$^१$ पृथक् पृथक् क्रमेण श्रोत्र-त्वक्चक्षू-रसन-घ्राणाख्यानि पञ्च$^२$ ज्ञानेन्द्रियाणि जायन्ते। $^३$एतेभ्यः पुनराकाशादिगतसात्त्विकांशेभ्यो मिलितेभ्यो मनोबुद्धयहङ्कार-चित्तानि जायन्ते। श्रोत्रादीनां पञ्चानां क्रमेण दिग्वातार्कवरुणाश्विनोऽ-धिष्ठातृदेवताः। मन आदीनां$^४$ चतुर्णां क्रमेण चन्द्रचतुर्मुखशङ्करा-च्युता अधिष्ठातृ-देवताः।
**अर्थ—**ये (अपञ्चीकृत) भूत, त्रिगुणात्मक माया के कार्य होने से त्रिगुणात्मक रहते हैं। उनमें सत्त्वगुण से युक्त हुए पाँच भूतों से व्यक्तिशः यथाक्रम श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। परन्तु आकाशादिकों के एकत्र हुए सात्त्विक अंश से मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त उत्पन्न होते हैं। श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों की क्रमशः दिशा, वायु, सूर्य, वरुण और अश्विनीकुमार—ये अधिष्ठातृ-देवता हैं। मन आदि चारों के क्रम से चन्द्र, ब्रह्मदेव, शंकर और विष्णु—ये अधिष्ठातृ-देवता हैं।
**विवरण—**ये भूत, सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका माया से उत्पन्न होने के कारण त्रिगुणात्मक ही होते हैं। उनमें से प्रत्येक के सत्त्वांश से क्रमशः श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे—आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न होता है इत्यादि। वैसे ही इन पाँच भूतों के एकत्रित हुए सात्त्विकांश से मन इत्यादि अन्तःकरण-चतुष्टय उत्पन्न होता है। उनकी अधिष्ठातृदेवता अर्थात् श्रवणादि इन्द्रियों में श्रवण
१. 'स्तैर्यथाक्रमं श्रो०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'पञ्चेन्द्रियाणि'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'एतैरेव च सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतैर्मिलितैर्मनो०'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'नां क्र०'-इति पाठान्तरम् ।
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