वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३६ वेदान्तपरिभाषा [ शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वनिराकरणम्
'अपरिमित' इत्यादि विशेषण से उक्त शंका का निरसन किया है । निरुपाधिक ब्रह्म में जगत् का स्रष्टृत्व ( उत्पादकत्व ) यद्यपि संभव नहीं हो सकता, तथापि अनादि, अनिर्वचनीय, अपरिमित शक्तिरूप अपनी माया की उपाधि से जब ब्रह्म, युक्त हो जाता है तब उस सोपाधिक ब्रह्म ( ईश्वर ) में जगत्कर्तृत्व उत्पन्न होता है । अतः उक्त शंका युक्त नहीं है ।
अब नैयायिकों के 'शब्द आकाश का ही गुण है' मत का निरसन करते हैं ।
न¹ च ²शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वम्, वाय्वादावपि तदुपलम्भात् । न चासौ भ्रमः, बाधकाभावात् ।
अर्थ— शब्द को केवल आकाश का ही गुण नहीं कहा जा सकता । क्योंकि वायु आदि में भी उसकी प्रतीति होती है । इसे भ्रम भी नहीं कह सकते क्योंकि उस प्रतीति में कोई बाधक नहीं है ।
विवरण— शब्द केवल आकाश का ही गुण है वायु आदि भूतों में 'शब्द' गुण नहीं होता—यह नैयायिक मानते हैं । परन्तु ग्रन्थकार कहते हैं कि यह उचित नहीं है । क्योंकि आकाश में प्रतिध्वनिरूप शब्द की जैसी प्रतीति होती है, वैसी वायु, तेज, जल और पृथिवी में भी क्रम से 'बिस्स्' 'भुग् भुग्' 'बुल बुल' और 'कड कड' आदि शब्द सुनाई पड़ते हैं । अतः इस प्रतीति के अनुसार पांचों भूतों में शब्द को मानना चाहिये ।
इस पर नैयायिक कहता है कि वायु आदि द्रव्यों में शब्द की प्रतीति भ्रम से होती है । जैसे—अग्नि की उष्णता जल में भासित होने से 'उष्णं जलम्' व्यवहार होता है,
१. 'न तु श०'—इति पाठान्तरम् । २. न च शब्दस्येति । शब्दः आकाशमात्रस्य गुणः इति नैयायिकाः कथयन्ति । किन्तु वाय्वादीनामपि शब्दो गुण इति वेदान्तिनः । नैयायिका हि न हि आकाशाद् वायोरुत्पत्ति मन्यन्ते, इति न आकाशगुणस्य शब्दस्य वाय्वादिक्रमेण तेज आदिषु तेषामंगीकारो युक्तः । वेदान्तिनां तु आकाशाद् वायुरिति श्रुतिप्रमाणपरतन्त्राणां न नैयायिकानां मतादरणमुचितम् । तदुक्तं पञ्चदश्याम्—
"शब्दस्पर्शो रूपरसो गन्धो भूतगुणा इमे । एकद्वित्रिचतुःपञ्चगुणा व्योमादिषु क्रमात् ॥ प्रतिध्वनिवियच्छब्दः वायौ बीसीति शब्दनम् । अनुष्णाशीतसंस्पर्शो वह्नौ भुगु भुगु ध्वनिः ॥ उष्णस्पर्शः प्रभारूपं जले बुलुबुलुध्वनिः । शीतस्पर्शः शुक्लरूपं रसो माधुर्यमीरितम् ॥ भूमौ कडकडाशब्दः काठिन्यं स्पर्श इष्यते । नीलादिकं चित्ररूपं मधुराम्लादिको रसः ॥"