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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 482 में से

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अपरमस्मदादिलिङ्गशरीरम् । तत्र हिरण्यगर्भलिङ्ग शरीरं महत्तत्त्वम्, अस्मदादि-लिङ्गशरीरमहङ्कार¹ इत्याख्यायते ।

**अर्थ—**पूर्वोक्त अपञ्चीकृत ( सूक्ष्म ) भूतों के योग से ही परलोकगमनादि समस्त कार्यों का निर्वाहक ( कर्तृ ), मोक्ष तक स्थायी, लिङ्गशरीर उत्पन्न होता है । वह, ( लिङ्गशरीर ) मन, बुद्धि, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय और पञ्चप्राणों से युक्त रहता है । ( उक्तार्थ में मैत्रेयोपनिषद् का प्रमाण देते हैं ) इसी कारण यह वचन है—पाँच-प्राण, मन, बुद्धि और दस इन्द्रियों से युक्त एवं अपञ्चीकृत भूतों से बना हुआ सूक्ष्म-शरीर, भोग का साधन है । वह लिङ्गशरीर पर-अपर भेद से द्विविध है । उनमें हिरण्य-गर्भ का लिङ्गशरीर 'पर' ( व्यापक ) होता है और हम लोगों का लिङ्गशरीर 'अपर' ( अव्यापक ) होता है । हिरण्यगर्भ के लिङ्ग-शरीर की 'महत्तत्त्व' संज्ञा है और हमारे लिङ्ग-शरीर को 'अहंकार' कहा जाता है ।

**विवरण—**शुद्ध आत्मा व्यापक एवं निष्क्रिय होने से उसका परलोक में गमन और वहाँ से पुनः आगमन होना सम्भव नहीं और स्थूल देह तो यहीं भस्म हो जाता है । इस कारण परलोकगमन आदि की उपपत्ति लगाने के लिए मोक्ष तक स्थिर रहने वाले सप्तदश-अवयवात्मक लिङ्ग-शरीर का अवश्य स्वीकार करना चाहिए । यहाँ जो पर एवं अपर संज्ञाएं बताई गई हैं उन्हें समष्टि एवं व्यष्टि भी कहते हैं ।

एवं तमोगुणयुक्तेभ्यः पञ्चीकृतभूतेभ्यो भूम्यन्तरिक्ष-स्वर्मह-र्जनस्तपः-सत्या²त्मकस्योर्ध्वलोकसप्तकस्य ³अतलवितलसुतलतलातल-रसातलमहातलपातालाख्याधोलोकसप्तकस्य ब्रह्माण्डस्य जरायुजाण्डज-स्वेदजोद्भिज्जाख्य⁴चतुर्विध-स्थूलशरीराणां⁵मुत्पत्तिः । तत्र जरायुजानि जरायुभ्यो जातानि मनुष्य-पश्वादिशरीराणि । अण्डजानि अण्डेभ्यो जातानि पक्षि-पन्नगादिशरीराणि । स्वेदजानि⁶ स्वेदाज्जातानि यूका⁷मशकादीनि । उद्भिज्जानि ⁸भूमिमुद्भिद्य जातानि वृक्षादीनि । वृक्षा-दीनामपि पापफल-भोगायतनत्वेन शरीरत्वम् ।


१. 'तत्त्वमित्या०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्याख्यस्या०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'अतल-पाताल-वितल-सुतल-तलातल-रसातल-महातलाख्यस्याधो'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'रूपाणां'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'णां चोत्प०'-इति पाठान्तरम् ।
६. 'नि तु'-इति पाठान्तरम् ।
७. 'क-मश'-इति पाठान्तरम् ।
८. 'तु'-इति पाठान्तरम् ।