वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४२ | वेदान्तपरिभाषा | [ भौतिकसृष्टिः
अर्थ—इस प्रकार तमोगुणयुक्त पञ्चीकृत भूतों से भूमि, आकाश, स्वर्ग, महर्, जन, तपस् और सत्य—इन सात ऊर्ध्व लोकों की और अतल, वितल, भुतल, तलातल, रसातल, महातल, पाताल—इन सात अधोलोकों की ( ब्रह्माण्ड की ) एवं जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चतुर्विध स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है। उनमे जरायु से उत्पन्न हुए मनुष्य एवं पशु आदि के शरीर 'जरायुज' कहलाते हैं। अण्ड से उत्पन्न होनेवाले पक्षी-सर्प आदि के शरीर 'अण्डज' कहलाते हैं। घर्म ( पसीना ) से उत्पन्न होनेवाले जू, मक्खी आदि कीटकों के शरीर 'स्वेदज' कहलाते हैं। भूमि को भेदकर ऊपर आनेवाले वृक्षादि के शरीर को 'उद्भिज्ज' कहते हैं। वृक्षादि भी पापफल के भोग के स्थान होने से उन्हें भी शरीरत्व है।
विवरण—पञ्चीकृत भूतों से चतुर्दश भुवन (ब्रह्माण्ड), एवं चतुर्विध प्राणिशरीरों की उत्पत्ति होती है। वृक्षादिकों के भी शरीर होते हैं—यह कैसे ज्ञात हुआ ? क्योंकि अन्य प्राणियों की तरह उनकी प्रवृत्ति या कहीं आना-जाना भी नहीं दीखता। इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि वृक्ष आदिकों के भी शरीर होते हैं। क्योंकि 'आत्मनो भोगायतनं शरीरम्'—आत्मा के भोग के स्थान को 'शरीर' कहते हैं—यह शरीर का लक्षण है। वृक्षादिक भी पूर्वकृत पापकर्म के उपभोग लेने के स्थान हैं। 'शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः'—मनुष्य, शरीरजन्य कर्मदोषों से स्थावरयोनि को पाते हैं—इत्यादि स्मृति इस विषय में प्रमाण हैं। वैसे ही उनमें किये घाव भी भर जाते हैं। इत्यादि अनुभव से उनकी विशिष्ट योनि होना सिद्ध होता है।
आधुनिक प्राणिशरीर एवं घट-पटादि कार्य मनुष्यजन्य होते दीखते हैं। तब 'ईश्वर, समस्त जगत् का कर्ता है' यह कथन कैसे सम्भव हो सकता है ?
उत्तर देते हैं—
'तत्र परमेश्वरस्य पञ्चतन्मात्रायुत्पत्तौ सप्तदशावयवोपेतलिङ्गशरीरोत्पत्तौ हिरण्यगर्भ-स्थूलशरीरोत्पत्तौ च साक्षात्कर्तृत्वम्। इतर निखिलप्रपञ्चोत्पत्तौ हिरण्यगर्भादि द्वारा,—'हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० ६-३-२ ) इति श्रुतेः। हिरण्यगर्भो नाम मूर्तित्रयादन्यः प्रथमो जीवः।
स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।
आदिकर्त्ता स भूतानां ब्रह्माऽग्रे समवर्तत ॥ १ ॥
१. 'अत्र'-इति पाठान्तरम्।