वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य' ( यजु० १३-४, ऋ० सं० १०-१२०-१ ) इत्यादिश्रुतेः । एवं 'भूत-भौतिकसृष्टिर्निरूपिता ।
अर्थ--इन समस्त कार्यों में से पञ्चतन्मात्राओं की उत्पत्ति में एवं अवयवात्मक लिंग शरीर की उत्पत्ति में परमेश्वर को साक्षात् कर्तृत्व है इससे भिन्न समस्त प्रपञ्च की उत्पत्ति हिरण्यगर्भ के द्वारा होता है । '( वह सदाख्य देवता ) अब मैं इन तीन देवताओं में इस जीव से ( आत्मरूप से ) अनुप्रवेश कर नाम और रूप को व्यक्त करता हूँ—इस प्रकार ईक्षण करती हुई' यह श्रुति इस विषय में प्रमाण है ( छां० ६-३-२ ) । ब्रह्मा, विष्णु, महेश--इन तीन मूर्तियों से भिन्न हिरण्यगर्भसंज्ञक प्रथम जीव है । इस विषय में 'वही पहला शरीरी और वही पुरुष कहा जाता है । वह प्राणिमात्र का आदिकर्ता ब्रह्मा प्रथम उत्पन्न हुआ' हिरण्यगर्भ भूतों से पूर्व उत्पन्न हुआ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है । इस रीति से भूत-भौतिक सृष्टि का निरूपण किया गया ।
विवरण—पांच सूक्ष्म भूत, लिंग शरीर और हिरण्यगर्भाख्य आदिजीव की उत्पत्ति का परमेश्वर साक्षात् कर्ता है । उसके पश्चात् होनेवाली समस्त सृष्टि को हिरण्यगर्भ के द्वारा वह उत्पन्न करता है । यह उक्त श्रुति से ज्ञात होने के कारण उक्त दोष नहीं हो पाता । क्योंकि आधुनिक कर्म भी ईश्वरानुग्रह के बिना नहीं होते, यह वेदान्त सिद्धान्त है । समस्त लिंग ( सूक्ष्म ) शरीरों के अभिमानी प्रथम जीव को 'हिरण्यगर्भ' कहते हैं । इस विषय में श्रुतियों के अनेक आधार दिये गये हैं । आदि शब्द से 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्' ( श्वे० ६-१८ ) इत्यादि श्रुतियों को समझना चाहिए ।
इस प्रकार भूत एवं भूतकार्यों की उत्पत्ति बताकर ग्रन्थकार कहते हैं—
इदानीं प्रलयो निरूप्यते । प्रलयो नाम त्रैलोक्य-नाशः, स च ^२चतुर्विधः-नित्यः प्राकृतो नैमित्तिक आत्यन्तिकश्चेति । तत्र नित्यः प्रलयः-सुषुप्तिः, तस्याः सकलकार्य-प्रलयरूपत्वात् । धर्माधर्मपूर्वसंस्काराणां च तदा कारणात्मनाऽवस्थानम् । तेन ^३सुषुप्तोत्थितस्य न सुखदुःखाद्य^४नुभवानुपपत्तिः । न वा स्मरणानुपपत्तिः । न च
१. एतावता प्रपञ्चेन "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इति श्रुतिर्व्याख्याता । इतः परं 'यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' इति श्रुतिर्व्याख्यास्यते ।
२. नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विजाः ।
नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥"
३. 'सुप्तोत्थित'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'नुप'-इति पाठान्तरम् ।