भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 402
३४४वेदान्तपरिभाषा[ नित्यप्रलयनिरूपणम्

सुषुप्तावन्तःकरणस्य विनाशे¹ तदधीनप्राणादिक्रियाऽनुपपत्तिः। वस्तुतः श्वासाद्यभावेऽपि तदुपलब्धेः पुरुषान्तरविभ्रममात्रत्वात् ²सुप्तशरीरोपलब्धिवत् ।

अर्थ—अब प्रलय का निरूपण किया जाता है। प्रलय का अर्थ है—त्रैलोक्य का नाश। वह नित्य, प्राकृत, नैमित्तिक और आत्यन्तिक भेद से चतुर्विध है। उनमें सुषुप्ति (निद्रा) नित्य प्रलय है क्योंकि वह समस्तकार्यप्रलयरूप होती है। और उस समय धर्म, अधर्म एवं पूर्वसंस्कार कारण रूप से रहते हैं। इस कारण निद्रा से उठे व्यक्ति के सुख-दुःखादिकों के अनुभव की अनुपपत्ति या स्मरण का असंभव नहीं हो पाता।

शंका—‘निद्रा में अन्तःकरण का नाश होता है’ यह माना जाय तो उसके (अन्तःकरण के) अधीन रहनेवाले प्राणादिकों के क्रिया की अनुपपत्ति होगी—ऐसी शंका करना ठीक नहीं। क्योंकि निद्रावस्था में वस्तुतः प्राण नहीं होते। किन्तु अन्य पुरुषों को जो उसकी प्रतीति होती है, वह निद्रित पुरुष के शरीर-प्रतीति के समान ही भ्रमरूप है।

विवरण—जगदुत्पत्ति का निरूपण करने के अनन्तर क्रमानुरूप जगत् की स्थिति का निरूपण करना था, परन्तु ‘स्थिति’ सर्वलोक प्रसिद्ध होने से ग्रन्थकार प्रलय का ही प्रारम्भ करते हैं। स्वर्ग, मृत्यु और पाताल—इन तीनों लोकों के लय को ही ‘प्रलय’ कहते हैं। प्राकृत और आत्यन्तिक प्रलय में सभी का नाश होता है, केवल त्रैलोक्य का ही नहीं होता। तथापि उसमें त्रैलोक्य का भी नाश हो ही जाने से प्राकृत-प्रलय के लक्षण पर अव्याप्ति दोष नहीं हो पाता। कूर्मपुराण में प्रलय के नित्यादि चार भेद कहे गये हैं। उनमें नित्यप्रलय का अर्थ है—निद्रा। क्योंकि निद्रा में समस्त कार्यों का लय होता है, यह अनुभवसिद्ध है। ‘सुषुप्तिकाले सकले विलीने’ इत्यादि श्रुति भी यही बता रही है।

शंका—‘निद्रावस्था में सबके साथ धर्म-अधर्म आदि का भी लय होता है’ तब जागृत हुए पुरुष को सुख-दुःखों का अनुभव कैसे हो सकेगा?’ इस शंका का ‘धर्माधर्म०’ आदि हेतु से समाधान किया गया है। निद्रा में धर्म, अधर्म और पूर्वानुभवों के संस्कार का आत्यन्तिक लय नहीं होता, किन्तु जैसे वृक्ष बीज में रहता है वैसे ही वे स्व-कारण में (अविद्या में) स्थित रहते हैं, इसी से निद्रित पुरुष जगता है। धर्माधर्मानुरूप क्रमशः सुख-दुःख को भोगता है, और पूर्वसंस्कारों के जागृत होने पर उसे पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण भी होता है।

शंका—‘निद्रा में समस्त कार्यों के साथ अन्तःकरण का भी लय होता है’ यह मानने पर सुप्त पुरुष के श्वासोच्छ्वासादि क्रियाएं नहीं हो सकेंगी, क्योंकि समस्त व्यापार मन के अधीन होते हैं।


१. ‘शेन’–इति पाठान्तरम् ।
२. ‘सुषुप्तश’–इति पाठान्तरम् ।