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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 482 में से

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पृष्ठ 403

नित्यप्रलयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३४५

समाधान— वस्तुतः सुप्त पुरुष के श्वासोच्छ्वास आदि का भी लय ही होता है। क्योंकि सुप्त पुरुष को किसी प्रकार की कोई प्रतीति नहीं हुआ करती। किन्तु अन्य जागृत पुरुषों को उसके प्राणादि क्रिया की जो प्रतीति होती है, वह उस पुरुष के शरीर प्रतीति के तुल्य ही भ्रमरूप है, अर्थात् जैसे निद्रा में पुरुष को 'यह मेरा शरीर' इत्याकारक शरीर का ज्ञान न होने से उसकी दृष्टि में शरीरादिकों का भी अभाव होने के कारण ही अन्य लोगों को उसका शरीर दिखलाई पड़ने पर भी वह भ्रम ही है। इसी प्रकार उसमें रहनेवाले श्वासोच्छ्वासादि का ज्ञान भी मिथ्याज्ञान ही है। निद्रा भी एक व्यक्ति का प्रलय होने से, एक पुरुष का प्रलय होने पर भी वह दूसरे को ज्ञात नहीं हो पाता। यह उत्तर ग्रन्थकार ने दृष्टिसृष्टिवाद को मानकर (दृष्टि = वस्तु का ज्ञान ही सृष्टि = उत्पत्ति) दिया है। इस कारण प्रत्यक्षादिविरोध नहीं होता।

इस पर वादी की शंका और उसका समाधान—

न चैवं ¹सुप्तस्य परेतादविशेषः। ²सुप्तस्य हि लिङ्गशरीरं संस्कारात्मनाऽत्रैव वर्तते, प्रेतस्य तु लोकान्तरे इति वैलक्षण्यात्। यद्वा, अन्तःकरणस्य द्वे शक्ती—ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिश्चेति। तत्र ज्ञानशक्तिविशिष्टान्तःकरणस्य सुषुप्तौ विनाशः, न क्रियाशक्ति-विशिष्टस्येति प्राणाद्यवस्थानमविरुद्धम्। 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यति, अथास्मिन् प्राण³ एवैकधा भवति, अथैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति, (कौ० ३-२) 'सता ⁴सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' (छां ६-८-१) इत्यादिश्रुतिरुक्तसुषुप्तौ मानम्।

अर्थ— यह मानने पर 'निद्रित मनुष्य में और मृत मनुष्य में कोई अन्तर नहीं रहता।' यह शंका नहीं की जा सकती क्योंकि सुप्त मनुष्य का लिंग-शरीर संस्काररूप से यहीं रहता है। परन्तु मृत मनुष्य का लिङ्ग शरीर अन्य लोक (लोकान्तर) में रहता है। यह दोनों में अन्तर है। अथवा क्रियाशक्ति एवं ज्ञानशक्ति के भेद से अन्तःकरण की दो शक्तियां होती हैं। उनमें से ज्ञानशक्ति विशिष्ट अन्तःकरण का ही निद्रावस्था में नाश होता है। क्रियाशक्तिविशिष्ट का नहीं। इस कारण निद्रा में प्राणादिकों का रहना विरुद्ध नहीं है। 'जिस अवस्था में पुरुष समस्त विशेष-ज्ञानरहित होकर निद्रित रहता है तब किसी भी जाग्रद्वासनारूप पदार्थ को नहीं देखता, उस समय इस प्राण में ही (क्रियाशक्ति में ही) एकत्व को पाता है, तब इस प्राणोपाधिक आत्मा में वाणी


१. 'सुषुप्तस्य'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'सुषुप्तस्य'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'प्राण एकधा'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'सोम्य'—इति पाठान्तरम् ।