वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३४६ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्राकृतप्रलयनिरूपणम् |
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समस्त नाम के साथ लय को प्राप्त होती है। (कौ० ३-३) 'हे सोम्य, वह उस समय 'सत्' से सम्पन्न होता है। स्वयं को (आत्मा को) प्राप्त होता है।' (छां० ६-८-१) इत्यादि श्रुतियां उक्त सुषुप्ति में प्रमाण हैं।
विवरण—शंका—'निद्रा में प्राण का भी अभाव रहता है।' यह कहने पर निद्रा और प्राणवियोगरूप मृत्यु, ये दोनों समान ही कहे जायेंगे।
समाधान—नहीं, क्योंकि सुप्त पुरुष का लिंगशरीर संस्काररूप से यहीं (इस लोक में ही) रहता है, परन्तु मृत मनुष्य का लिंगशरीर स्वर्ग-नरकादि परलोक में रहता है—इस कारण उन दोनों में भेद है। तथापि व्यवहार में अबाधितरूप से होने वाली श्वासोच्छ्वासादिप्रतीति को 'भ्रम' कैसे कहा जा सकेगा ? और उसे भ्रमरूप कहा जाय तो प्रत्यक्षादिप्रमाण पर किसी का विश्वास ही नहीं होगा। इस प्रकार पूर्व-समाधान पर अरुचि होने से दूसरा समाधान 'यद्वा' इत्यादि ग्रन्थ से कहा गया है।
अन्तःकरण की 'ज्ञान' और 'क्रिया' नाम की दो शक्तियां होती हैं। उनमें से 'ज्ञानशक्ति' का निद्रावस्था में लय हो जाता है। क्रियाशक्ति का लय नहीं होता। इस कारण क्रियाशक्तिमत् अन्तःकरण उस समय रहता ही है और प्राणादिक्रिया भी स्वरूपतः रहती है। अतः उसकी प्रतीति होती है। परन्तु यह मानने में आधार क्या है ? इसके उत्तर में श्रुतियों को आधार (प्रमाण) के रूप में प्रस्तुत करते हैं। 'प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न किञ्चन वेद'—'प्राज्ञ' आत्मा के साथ तादात्म्य को पाया हुआ यह जीव कुछ भी नहीं जानता। तस्मात् 'निद्रा' नित्य (दैनन्दिन) प्रलय है। अब क्रमप्राप्त प्राकृत प्रलय को बताते हैं—
प्राकृतप्रलयस्तु कार्यब्रह्म-विनाश-निमित्तकः सकल-कार्यनाशः। यदा तु प्रागेवोत्पन्न-ब्रह्मसाक्षात्कारस्य कार्यब्रह्मणो ब्रह्माण्डाधिकारलक्षणप्रारब्धकर्मसमाप्तौ विदेहकैवल्यात्मिका ^१परा मुक्तिः, तदा तल्लोकवासिनामप्युत्पन्नब्रह्मसाक्षात्काराणां ब्रह्मणा सह विदेहकैवल्यम्।
ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥ इति श्रुतेः।
अर्थ—प्राकृत प्रलय का अर्थ है कि कार्यब्रह्म (हिरण्यगर्भ) के विनाश से होनेवाला समस्त कार्यों का नाश। जब जिसे पहले ही ब्रह्मसाक्षात्कार हुआ हो ऐसे हिरण्यगर्भ को ब्रह्माण्ड पर अधिकार-सम्पादनरूप फलवाले प्रारब्ध कर्म की समाप्ति होकर
१. 'परम्'-इति पाठान्तरम्।