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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 482 में से

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पृष्ठ 405

प्राकृतप्रलयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३४७

विदेहकैवल्य के साथ परम मोक्ष प्राप्त होता है, तब उस ब्रह्मलोक में रहनेवाले उपासकों को भी ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान होकर उस हिरण्यगर्भ के साथ ही विदेहमुक्ति मिलती है। क्योंकि 'महाप्रलय के प्राप्त होने पर हिरण्यगर्भ के अन्तसमय ( उसके अधिकार की परिसमाप्ति होने पर ) शुद्ध चित्त हुये ब्रह्मलोकनिवासी जिन्हें सम्यग्ज्ञान हुआ है, वे सब मुक्त होनेवाले हिरण्यगर्भ के साथ परमपद में प्रवेश करते हैं' यह श्रुति है।

**विवरण—**हिरण्यगर्भाख्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अधिकारी प्रथम जीव अर्थात् ईश्वर, ब्रह्मापरोक्षज्ञानवान् होने से जीवन्मुक्त ही है। परन्तु सकलब्रह्माण्डात्मक जगत् पर सत्ता चलाने का ( उसका नियमन करने का ) प्रारब्ध कर्म उसका अवशिष्ट होने से उसे तत्काल विदेहमुक्ति नहीं मिलती। अपितु उपासना के उत्कर्ष से उसे हिरण्यगर्भ का अधिकार मिल जाता है। अधिकारफलक उस प्रारब्ध कर्म का भोग से क्षय होने पर वह विदेहमुक्ति को पाता है अर्थात् ब्रह्मरूप होता है। उस समय जो समस्त कार्य का नाश होता है, वही प्राकृतप्रलय है। प्राकृतप्रलय के समय उपासना के बल से अर्चिरादि उत्तर मार्ग से ब्रह्मलोक में प्राप्त हुए ब्रह्मलोक-निवासियों को भी वह हिरण्यगर्भ ज्ञानोपदेश करता है और इस रीति से उन्हें भी ब्रह्मसाक्षात्कार के होने पर उसके साथ वे भी परम मुक्ति पाते हैं।

एवं ^१स्वलोकवासिभिः सह कार्ये ब्रह्मणि मुच्यमाने तदधिष्ठित-ब्रह्माण्ड ^२तदन्तर्वर्ति-निखिललोक-तदन्तर्वर्ति-स्थावरादीनां भौतिकानां भूतानां च प्रकृतौ मायायां^३ च लयः, न तु ब्रह्मणि, बाधरूप-विनाशस्यैव ब्रह्मनिष्ठत्वात् । अतः प्राकृत^४ इत्युच्यते ।

**अर्थ—**इस रीति से स्वलोकनिवासी लोगों के साथ हिरण्यगर्भ के मुक्त होते समय स्व-अधिष्ठित ब्रह्माण्ड, तदन्तर्गत भूरादि समस्त लोक और वहां के स्थावरादि ( चतुर्विध प्राणिजात ) भूत कार्यों का एवं आकाशादि पञ्चभूतों का प्रकृति में ( मूलकारणभूत माया में ही ) लय होता है, ब्रह्म में नहीं। क्योंकि बाधरूप विनाश ही ब्रह्मनिष्ठ होता है ( निवृत्तिरूप नहीं होता ) इसी कारण ( प्रकृति में लय होने के कारण ही ) इस प्रलय को प्राकृत कहते हैं।

**विवरण—**ब्रह्माण्डादि समस्त कार्य का प्रकृति में ( माया में ही ) लय होने से उसे प्राकृतलय कहते हैं। ब्रह्मज्ञान से अविद्यानिवृत्ति होने पर समस्त जगत् का जो बाधरूप नाश होता है वही ब्रह्मनिष्ठ होता है। इससे भिन्न, निवृत्तिरूप विनाश तन्निष्ठ


१. 'तल्लोकवा'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'ण्डान्तर्व'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'यां लयः'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'प्राकृतप्रलय'-इति पाठान्तरम् ।