वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४८ | वेदान्तपरिभाषा | [ नैमित्तिकप्रलयनिरूपणम्
नहीं होता। इस कारण प्राकृतप्रलय में लीन होनेवाले अन्य जीवों की मुक्ति का प्रश्न नहीं उठता।
अब तीसरे नैमित्तिक प्रलय को बताते हैं—
कार्य-ब्रह्मणो दिवसावसान-निमित्तकस्त्रैलोक्यमात्र-प्रलयः नैमित्तिकप्रलयः। ब्रह्मणो¹ दिवसश्चतुर्युग-सहस्र-परिमित-कालः, 'चतुर्युग-सहस्राणि² ब्रह्मणो दिनमुच्यते' इति वचनात्। प्रलय-कालो दिवस-काल-परिमितः, रात्रिकालस्य दिवस³काल-तुल्यत्वात्।
अर्थ—हिरण्यगर्भ का दिन (दिवस) समाप्त होने से होनेवाले केवल त्रैलोक्य के लय को नैमित्तिकप्रलय कहते हैं। 'चतुर्युग सहस्रन्तु ब्रह्मणो दिनमुच्यते'--ब्रह्मा का दिन एक हजार चतुर्युग (चोकड़ी) का कहा जाता है--इस पुराणवचन के अनुसार एक हजार चतुर्युगात्मक काल के पूर्ण होने पर ब्रह्म का दिन पूर्ण होता है। प्रलय-काल भी दिन के परिमाण के तुल्य ही होता है, क्योंकि रात्रिकाल भी दिनकाल के बराबर ही होता है।
विवरण--कृत, त्रेता, द्वापर और कलि--इन चार युगों को चतुर्युग कहते हैं। ऐसे हजार चतुर्युगों के बीतने में जितना काल लगता है, उतने समय में ब्रह्मदेव (हिरण्यगर्भ) का एक दिन होता है और उतने ही समय की रात्रि प्रारम्भ हो जाती है। उस समय वह सोता है, इस कारण केवल भू, भुवर् और स्वर् (स्वर्ग) इन तीन लोकों का नाश होता है। निद्रा निमित्त से होनेवाला यही नैमित्तिक प्रलय है।
प्राकृत प्रलय और नैमित्तिक प्रलय में प्रमाण बताते हैं—
प्राकृतप्रलये नैमित्तिक-प्रलये च पुराणवचनानि⁴।
द्विपरार्द्धे त्वतिक्रान्ते ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
तदा प्रकृतयः सप्त कल्प्यन्ते प्रलयाय हि॥
एष प्राकृतिको राजन् प्रलयो यत्र लीयते।
इति वचनं प्राकृत प्रलये मानम्।
एष नैमित्तिकः प्रोक्तः प्रलयो यत्र विश्वसृक्।
शेतेऽनन्तासने नित्यमात्मसात्कृत्य चाखिलम्॥
इति वचनं नैमित्तिकप्रलये मानम्।
१. 'ब्रह्मदिव'-इति पाठान्तरम्।
२. 'सहस्रन्तु'-इति पाठान्तरम्।
३. 'सतुल्य'-इति पाठान्तरम्।
४. 'नि प्रमाणानि'-इति पाठान्तरम्।