वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतुरीयप्रलयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३४९
अर्थ-- प्राकृतप्रलय और नैमित्तिकप्रलय के विषय में पुराणवचन इस प्रकार हैं—'ब्रह्मा के शतवर्षात्मक आयुष्य के पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध एवं परार्धों के अतिक्रान्त होने पर परमपद पर रहनेवाले ब्रह्मा का प्रलय होता है, उस समय महदादि सात प्रकृतियों का प्रलय होता है। हे राजन् ! जिसमें समस्त कार्य लीन होते हैं वह, यह वचन प्राकृत-प्रलय में प्रमाण है। 'जिसमें विश्वस्रष्टा शेषरूप आसन पर सबको आत्मसात् ( स्वयं में लीन ) कर सोता है वह नैमित्तिक प्रलय है। यह वचन नैमित्तिक-प्रलय के सद्भाव में प्रमाण है।
अब आत्यन्तिक प्रलय बताते हैं—
तुरीय-प्रलयस्तु ब्रह्मसाक्षात्कार-निमित्तकः सर्वमोक्षः । ^१स चैकजीववादे युगपदेव, नानाजीव-वादे तु क्रमेण । 'सर्वे एकीभवन्ति' इत्यादिश्रुतेः तत्राद्यास्त्रयोऽपि प्रलयाः कर्मोपरति ^२निमित्ताः, तुरीयस्तु ज्ञानोदय-निमित्तो लयोऽज्ञानेन सहैवेति विशेषः । एवं चतुर्विधप्रलयो निरूपितः ।
अर्थ— परब्रह्म के साक्षात्कार से होनेवाला सर्वमोक्ष, चतुर्थ ( आत्यन्तिक ) प्रलय है। 'एकजीववाद' पक्ष में वह एकदम ही ( युगपदेव ) होता है, किन्तु 'नानाजीववाद' पक्ष में क्रम से होता है। क्योंकि 'सब एक होते हैं' यह श्रुति है। ( अब तक बताये गये चार प्रलयों मे से ) पहले तीनों प्रलय कर्म के उपरम से होते हैं। किन्तु यह चौथा प्रलय, ज्ञानोत्पत्ति से होता है, इसमें अज्ञानसहित कर्मों का उपरम होता है, यह इसमें विशेष है। इस रीति से चार प्रकार के प्रलयों का निरूपण हुआ।
विवरण— तत्त्वज्ञान होने पर अविद्या और उसके समस्त कार्यों का प्रलय होता है। यह चौथा प्रलय है, इसी को 'सर्वमोक्ष' भी कहते हैं। समस्त जीवों को एक मानने पर एक जीव के मुक्त होते ही समस्त जीवों को एकदम मुक्त होना चाहिये। क्योंकि एकजीववादियों के मत में 'अविद्योपाधिक चैतन्य' ही 'जीव' होने से और उस अविद्या के एक होने से 'जीव' एक है। ऐसी स्थिति में एक जीव को तत्त्वज्ञान होते ही समस्त जीवों को एकदम तत्त्वज्ञान हो ही जाना चाहिये। और समस्त जीवों का एकदम प्रलय हो जाना चाहिये। परन्तु इस मत के अनुयायी बहुत न होने से और शुकनारदादिकों के मुक्त हो जाने पर भी अन्य लोगों को मुक्ति नहीं मिली—यह दिखलाई देने से ग्रन्थकार ने अनेकवादिसम्मत 'नानाजीव' वाद का उल्लेख किया है। इस मत में
१. स चैकजीववादे समष्टिजीवातिरिक्तव्यष्टिजीवाः परमार्थतो न सन्ति, तत्कल्पिता एवेमे नानाजीवा इति मते तादृशकल्पितजीवेन वस्तुसदात्मनो ज्ञानादिना मोक्षे सर्वमुक्तिरेव ।
२. 'रमति'-इति पाठान्तरम् ।