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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 482 में से

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पृष्ठ 408
३५०वेदान्तपरिभाषा[ प्रलयक्रमनिरूपणम् ]

'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव' है, और अन्तःकरण अनेक हैं। अतः चैतन्य के एक होने पर भी चैतन्योपाधि के अनेक होने से जीव भिन्न हैं। इस कारण चैत्र-व्यक्ति को तत्त्वज्ञान होने के कारण उसके मुक्त होने पर भी मैत्रव्यक्ति का मुक्त होना सम्भव नहीं। एक की मुक्ति से सब मुक्त नहीं होंगे। प्रथम कहे हुये तीन प्रकारों में किसी विशेष कारण से हुई कर्म की उपरति से प्रलय होता है। किन्तु इस ज्ञाननिमित्तक प्रलय में समस्त कर्म और उनके मूलकारण अविद्या का प्रलय होता है। इस रीति से तत्त्व-ज्ञान के कारण अविद्या का उच्छेद होने से बीजनिवृत्ति हो जाने से पुनरावृत्ति, न होना ही इस प्रलय में विशेष है।

अब प्रलय के क्रम को बताते हैं—

तस्येदानीं क्रमो निरूप्यते—

भूतानां भौतिकानां च न कारणलयक्रमेण लयः। कारणलयसमये कार्याणामाश्रया¹न्तराभावेनावस्थानानुपपत्तेः। किन्तु सृष्टिक्रमविपरीतक्रमेण तत्तत्कार्यनाशे तत्तज्जनकादृष्ट-नाशस्यैव प्रयोजकतया उपादाननाशस्याप्रयोजकत्वात्। अन्यथा न्यायमतेऽपि। महाप्रलये पृथिवी-परमाणु-गतरूप-गन्धरसादेरविनाशापत्तेः।

अर्थ— अब उस प्रलय के क्रम का निरूपण करते हैं। भूत और उनसे उत्पन्न पदार्थों के लय का क्रम, कारण से कार्य की ओर नहीं होता। क्योंकि कारणलय के समय कार्य का अन्य आश्रय न रहने से उसकी स्थिति नहीं बन सकती। अतः जिस क्रम से सृष्टि उत्पन्न होती है उसके विपरीत क्रम से लय होता है। किसी भी कार्य के नाश में उसके जनकभूत अदृष्ट का नाश ही प्रयोजक होता है। उस कार्य के उपादान कारण का नाश प्रयोजक नहीं होता। अन्यथा न्यायमत के तुल्य महाप्रलय के होने पर भी पृथिवीपरमाणुओं में विद्यमान रूपरसादि गुणों के नाश न होने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा।

विवरण— भूतों की उत्पत्ति का क्रम जैसा श्रुति में बताया है 'तस्माद्वा एतस्मा-दात्मन आकाशः संभूतः, आकाशाद् वायुः'—ऐसे ही लय का भी क्रम होना चाहिये। किन्तु वह क्रम, उत्पत्तिक्रम से विपरीत होता है। कार्य, कारण में लीन होता है। और वह कारण, जिस कारण का कार्य होगा उस कारण में लीन होता है। जैसे पृथिवी, जल में लीन होती है, जल अग्नि में लीन होता है इत्यादि। परन्तु नैयायिकों का मत, इसके विरुद्ध है। उनका कहना है कि प्रथम कारण का लय (नाश) होता है पश्चात् कार्य का। उस पर वेदान्ती का उत्तर है कि प्रथम कारण का लय होने पर कार्य निराधार रहेगा। मृत्तिका का लय यदि प्रथम हो जाय, तो मृत्तिकाविकाररूपघट, किसके आश्रय


१. 'यमन्तरेणावस्था०'—इति पाठान्तरम्।