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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 409
प्रलयक्रमनिरूपणम्विषयपरिच्छेदः३५१

से रहेगा ? इसलिये कार्य का लय कारण में होता है, यही क्रम मानना चाहिए। ब्रह्म-सूत्र के द्वितीय अध्याय के तृतीय पाद में 'विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च' ऐसा सिद्धान्त सूत्र है। जिस क्रम से सीढ़ी पर चढ़ते हैं उसके ठीक विपरीत क्रम से उतरते हैं। घट, शराव आदि पदार्थ लय होते समय मृत्तिका के स्वरूप को पाते हैं और हिम इत्यादि जल की स्थिति में हो जाते हैं। इस प्रकार पृथ्वी, जल से उत्पन्न हुई है अतः उसका लय जल में होता है यह प्रलयक्रम जानना चाहिये।

वेदान्तियों के मत में कार्य के नाश में उसके (कार्य के) उपादान-कारण का नाश प्रयोजक (कारण) न होकर उस कार्य के उत्पन्न होने में जो अदृष्ट (अपूर्व) कारणीभूत हुआ है उसका नाश ही उसमें प्रयोजक (कारण, हेतु) है।

नैयायिकों के मत के अनुसार उपादान-कारण का नाश, कार्य के नाश में कारण मानें तो महाप्रलय के समय पृथ्वी के परमाणुओं में विद्यमान रूप, रस, गन्ध आदि गुणों का नाश नहीं हो सकेगा। क्योंकि नैयायिकों के मत में परमाणु नित्य होते हैं, उनका नाश न होने से तद्गत गुणों का भी नाश नहीं, और उनका नाश नहीं हुआ तो महाप्रलय कैसा ? इसलिए रूपादिकों के जनक अदृष्ट विशेष का नाश होने पर समवायिकारण के रहते भी रूपादिकों का नाश होता है—यही मानना चाहिये। अर्थात् कारणलय-क्रम से प्रलय को न मानकर कार्यलयक्रम से ही मानना चाहिये।

तथा च पृथिव्या अप्सु, अपां तेजसि, तेजसो वायौ, वायोराकाशे, आकाशस्य जीवाहङ्कारे, तस्य हिरण्यगर्भाहङ्कारे, तस्य चाविद्यायामित्येवंरूपाः^१ प्रलयाः। तदुक्तं विष्णुपुराणे—

जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे ! पृथिव्यप्सु प्रलीयते।
तेजस्यापः प्रलीयन्ते तेजो वायौ प्रलीयते ॥ १ ॥
वायुश्च लीयते व्योम्नि तच्चाव्यक्ते प्रलीयते।
अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् ! निष्कले ^२संप्रलीयते ॥ २ ॥ इति।

एवंविध-प्रलय-कारणत्वं तत्पदार्थस्य ब्रह्मणस्तटस्थलक्षणम्।

अर्थ— इस रीति से पृथ्वी का लय जल में, जल का तेज में, तेज का वायु में, वायु का आकाश में, आकाश का जीवाहंकार में, जीवाहंकार का हिरण्यगर्भाहङ्कार में और उसका अविद्या में प्रलयक्रम समझना चाहिये। विष्णुपुराण में ऐसा कहा है कि 'हे देवर्षे ! जगत् की आधारभूत पृथ्वी, जल में लीन होती है, जल तेज में, तेज वायु में


१. 'प एव प्रलय०'—इति पाठान्तरम्।
२. 'च प्र०'—इति पाठान्तरम्।