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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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४५२ | वेदान्तपरिभाषा | [ सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम्

वायु आकाश में और आकाश अव्यक्त में और अव्यक्त निष्कल पुरुष में लीन होता है।" 'तत्त्वमसि'-महावाक्य के 'तत्' पद का अर्थ जो ब्रह्म, उसका 'ऐसे प्रलय का कारण होना' यही तटस्थलक्षण है।

विवरण—स्थूल भूतों की उत्पत्ति, जीवाहंकार से तो कहीं बताई नहीं गई। अपञ्चीकृत भूतों से पञ्चीकरण होने पर स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति बताई गई है। ऐसी स्थिति में उनका जीवाहङ्कार में लय होना कैसे बताया जा रहा है।

समाधान—अपञ्चीकृत भूतों के कतिपय अंशों से लिग शरीर के अवयव उत्पन्न कर अवशिष्ट अंशों का पञ्चीकरण कर स्थूलभूतों को उत्पन्न किया गया है। इस कारण स्थूल भूतों के लय के समय लिंगशरीरावयवान्तर्गत अपञ्चीकृत भूतों के अतिरिक्त अन्य अपञ्चीकृत भूतों का अस्तित्व न रहने से महाभूतों का जीवर्लिंग शरीर में (जीवाहंकार में) विलय बताया गया है (मूल में जीवाहंकार शब्द जीवर्लिंग शरीर के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है)।

जीवर्लिंगशरीर, हिरण्यगर्भलिंगशरीर से उत्पन्न होने के कारण उसका लय, हिरण्यगर्भाहंकार में बताया गया है और उसका अविद्या में लय बताया है। क्योंकि अविद्या, मूलोपादान है अतः उपलक्षण से अविद्या का परमात्मा में शक्तिरूप से लय होना चाहिये।

यहाँ तक सविस्तार निरूपण किये गये प्रलयपदार्थ से घटित ब्रह्मशब्द के तटस्थ-लक्षण को बताया गया।

अब ब्रह्म के 'जगत्कारण' रूप लक्षण पर होने वाले एक दोष का निरसन करते हैं।

ननु वेदान्तैर्ब्रह्मणि जगत्कारणत्वेन प्रतिपाद्यमाने सति सप्रपञ्चं । ब्रह्म स्यादन्यथा 'सृष्टिवाक्यानामप्रामाण्यापत्तेरिति चेत् । न । न हि सृष्टिवाक्यानां सृष्टौ तात्पर्यं किन्तु अद्वितीये ब्रह्मण्येव ।


१. सृष्टिवाक्यानि अपि वेदान्तवाक्यानि, अद्वितीयवाक्यमपि वेदान्तवाक्यम् इति तुल्यबलत्वात् सृष्टिवाक्यप्रसक्तस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मणि निषेधो नोपपन्नः। किन्तु वेदान्तवाक्यत्वेन साम्येऽपि निषेधवाक्यानाम् अपच्छेदन्यायेन प्राबल्यमिति तत्र तन्निषेधः उपपद्यते।

ननु अपच्छेदन्यायो न प्रमामाण्याऽप्रामाण्यविषयः, किन्तु अनुष्ठानाऽननुष्ठानविषय एव। एवं च "अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति, नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति" इति वाक्ययोरुभयोरपि बोधकत्वेन अबाधितार्थविषयत्वलक्षणप्रामाण्यस्य स्वीकारेण उपपत्तिर्भवति। तेन न्यायेन ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न बाधितम्, श्रुतिबोधितत्वात्। इति स्वीकर्तव्यमिति चेत् सृष्टिवाक्यानां पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्वलक्षणप्रामाण्यानङ्गीकारात् निष्प्रपञ्चब्रह्मबोधनमद्वितीयवाक्येन सम्भवत्येव। अतिरात्रविधिनिषेधवाक्ययोरुभयोरपि व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्वलक्षणं प्रामाण्यमेवस्वीक्रियते इति वैषम्यम्।