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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 482 में से

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सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३५३

अर्थ—वेदान्तवाक्यों के द्वारा ब्रह्म को 'जगत्कारण' बताये जाने पर ब्रह्म को प्रपञ्चयुक्त मानना पड़ेगा। यदि ऐसा न मानें तो वेदान्त में पढ़े गये सृष्टि प्रतिपादक वाक्यों को अप्रमाण कहना होगा। उत्तर में कहते हैं—नहीं, वेदान्त के सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों का सृष्टि के कथन में तात्पर्य न होकर ब्रह्म के अद्वय प्रतिपादन में तात्पर्य है।

विवरण--'अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निष्कले च प्रलीयते'--अव्यक्त, निष्कल पुरुष में विलीन होता है—इससे जगत् साक्षात् या परम्परा से परमात्मा में विलीन होता है। इस स्मृति से ब्रह्म को जगत् का उपादान कारण कहना होगा। तब मृत्तिका के जैसे घट-शरावादि प्रपञ्च, वैसे ही जगत् को ब्रह्म का प्रपञ्च कहना होगा। क्योंकि ब्रह्म 'प्रपञ्चसहवर्तमान' होने से प्रपञ्च, ब्रह्मपदवाच्य होगा। और ऐसा न मानने पर वेदान्त में (तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः) बताये गये सृष्टिवाक्यों की क्या गति होगी? अर्थात् वे अप्रमाण होंगे। इस पर ग्रंथकार उत्तर देते हैं कि वेदान्त के सृष्टि-वाक्यों का उद्देश्य सृष्टिप्रतिपादन में नहीं है, अपितु 'ब्रह्म, अद्वितीय है'—यह बताने में है। इसी बात को अग्रिम ग्रंथ से कहते हैं—

तत्प्रतिपत्तौ कथं सृष्टेरुपयोगः ? । इत्थम्—यदि सृष्टिमनुपन्यस्य निषेधो ब्रह्मणि प्रपञ्चस्य प्रतिपाद्येत, तदा ब्रह्मणि ²निषिद्धस्य प्रपञ्चस्य वायौ प्रतिषिद्धस्य रूपस्येव ब्रह्मणोऽन्यत्रावस्थानशङ्कायां न निर्विचिकित्समद्वितीयत्वं प्रतिपादितं स्यात् । ततः सृष्टिवाक्याद् ब्रह्मणोपादेयत्व-ज्ञाने सत्युपादानं विना कार्यस्यान्यत्र सद्भावशङ्कायां निरस्तायां नेति नेतीत्या³दीनां ब्रह्मण्यपि तस्यासत्त्वोपपादने ⁴प्रपञ्चस्य तुच्छत्वावगमे निरस्ताखिलद्वैतविभ्रममखण्डं सच्चिदानन्दैकरसं ब्रह्म सिद्धयतीति परम्परया सृष्टिवाक्यानाम⁵प्यद्वितीये ब्रह्मण्येव तात्पर्यम् ।⁶

अर्थ—सृष्टि का (सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों का) ब्रह्मज्ञान करा देने में उपयोग कैसे होता है ? (उत्तर)—इस रीति से उपयोग होता है—सृष्टि का उपन्यास न कर प्रपञ्च का ब्रह्म में यदि निषेध कहें तो उस निषिद्ध प्रपञ्च की ब्रह्म से अन्यत्र स्थिति की


१. 'णिप्रतिपा'-इति पाठान्तरम् ।२. 'प्रतिषि'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'त्यादिना'-इति पाठान्तरम् ।४. 'नेन'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'मद्वितीये'-इति पाठान्तरम् ।

६. आनन्दस्वरूपस्यैव प्रमाणान्तराऽगृहीतत्वादप्राप्ते शास्त्रमर्थवत् इति न्यायेन तत्रैव तात्पर्यमिति । अर्थात् सर्वाणि कारणतापरवाक्यानि सृष्टिवाक्यानि अद्वितीयब्रह्मस्वरूप-प्रतिपादनार्थानीति भावः ।