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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 482 में से

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पृष्ठ 412
३५४वेदान्तपरिभाषा[ सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम्

आशंका हो सकती है, जैसे—वायु में रूप का निषेध करने पर, उससे अन्यत्र रूप की स्थिति की आशंका होती है। तब असन्दिग्ध अद्वैत नहीं बता पाये—कहा जायगा। अतः सृष्टिवाक्यों से 'जगत्, ब्रह्मोपादानक है' यह ज्ञान होने पर 'उपादान के बिना कार्य का अन्यत्र रहना असंभव है'—इस प्रकार आशंका का निरास हो जाता है। 'नेति-नेति' वाक्य से ब्रह्म में ही प्रपञ्च का असत्त्व बताये जाने पर प्रपञ्च की तुच्छता का ज्ञान होता है। और समस्तद्वैत, विभ्रमरहित, अखण्ड, सच्चिदानन्दघन एक ब्रह्म ही सिद्ध होता है। इस रीति से सृष्टिवाक्यों का पर्याय से अद्वितीय ब्रह्म में ही पर्य-वसान होता है।

विवरण--सृष्टि का प्रस्ताव न कर ब्रह्म में प्रपञ्च का अभाव यदि कहा होता तो प्रपञ्च का कारण अन्य कोई होना चाहिये—यह आशंका होना स्वाभाविक है। उससे ब्रह्म के अद्वितीयत्व में बाध होता है। इसलिये सृष्टिवाक्यों से प्रपञ्च की उत्पत्ति, ब्रह्म से बताकर उसका निराकरण किया है। और इस रीति से एकमेवाद्वितीय ब्रह्म की सिद्धि की गई है। इस कारण सृष्टिवाक्यों का वाच्यार्थ ग्रहण न कर 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः'—जिसमें शब्द का तात्पर्य हो वही उस शब्द का अर्थ है—इस उक्ति के अनुसार सृष्टिवाक्यों कायथाश्रुत अर्थ ग्रहण न कर तात्पर्यार्थ का ग्रहण करना चाहिये। जैसे 'विषं भुंक्ष्व' वाक्य का वाच्यार्थ 'विष भक्षण कर' है। परन्तु वह उद्दिष्ट न होकर 'शत्रुगृह में भोजन करने की अपेक्षा विष खाना अच्छा' इस न्याय से इस वाक्य का तात्पर्यार्थ 'शत्रुगृह में भोजन मत करो' यही लेना पड़ता है। अतः सृष्टिवाक्यों का वाच्यार्थ ग्रहण न कर ब्रह्माद्वितीयत्वप्रतिपादक तात्पर्यार्थ ग्रहण करने पर सृष्टिवाक्य अप्रमाण नहीं होते।

शंका—सृष्टिवाक्यों से अद्वितीय ब्रह्म का बोध होने पर भी असन्दिग्ध अद्वितीय ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकेगा। क्योंकि वेदान्त के "य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः (छा० ६-७-८) आदि वाक्यों में सगुण ब्रह्म का प्रतिपादन किया है। यह आशंका कर ग्रन्थकार कहते हैं—

'उपासनाप्रकरणपठितसगुणब्रह्मवाक्यानां² चोपासनाविध्यपेक्षित-गुणारोपमात्रपरत्वं, न गुणपरत्वम्। निर्गुणप्रकरणपठितानां सगुण-वाक्यानां तु निषेधवाक्यापेक्षितनिषेध्य³सम्पादकत्वेन विनियोग इति न किञ्चिदपि वाक्यमद्वितीयब्रह्मप्रतिपादने विरुध्यते।


१. ननु भवतु सृष्टिवाक्यानां कथमपि निषेधशेषत्वेन अद्वितीयब्रह्मप्रतिपत्त्युपायत्वम्। किन्तु हिरण्मयः, सत्यकामः, सत्यसंकल्पः इत्यादिवाक्यानां स्वत एव सफलोपासनावाक्य-गम्यानां न निषेधशेषत्वं संभवति। यथा च तैः सद्वितीयत्वं ब्रह्मणः सिद्धम् इत्याशंकाया-माह उपासनेति।
२. 'नामुपास'—इति पाठान्तरम्।
३. 'समर्पकत्वेन'—इति पाठान्तरम्।