भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 413

जीवेश्वरनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३५५

अर्थ— उपासना के प्रकरण में आये हुए सगुणब्रह्मप्रतिपादक वाक्यों का तात्पर्य, उपासनाविधि में अपेक्षित गुणों का केवल आरोप करने के लिये होता है। ब्रह्म में उन गुणों का अस्तित्व प्रतिपादन में नहीं। निर्गुण ब्रह्म प्रकरण में आये हुए सगुणब्रह्म-प्रतिपादकवाक्यों का उपयोग, निषेधवाक्यों में निषेध के उपयोगी (निषेध के लिये इष्ट) गुणों की केवल उपस्थिति करा देना मात्र है। इस रीति से कोई भी वाक्य अद्वितीय-ब्रह्मप्रतिपादन के विरुद्ध नहीं है।

विवरण— सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों के होने पर भी ब्रह्म के अद्वैत होने में किस प्रकार बाध नहीं है—यह बता चुके। अब सगुणब्रह्मस्वरूप के प्रतिपादक वाक्यों के होने पर भी ब्रह्म के निःशङ्क अद्वितीयत्व होने में किस प्रकार बाध नहीं होता, सो बताते हैं।

ब्रह्मोपासना के प्रकरण में उपासना के दो प्रकार बताये गये हैं। एक सगुणब्रह्मो-पासना और दूसरी निर्गुणब्रह्मोपासना। उनमें से प्रथम उपासना में अपेक्षित गुणों का आरोप करनेभर के लिये सगुणब्रह्मवाक्यों का उपयोग है, और दूसरी उपासना में सगुणब्रह्मप्रतिपादक वाक्यों का उपयोग केवल 'नेति-नेति' (यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं) निषेध के लिये अपेक्षित पदार्थों का संग्रह करना मात्र है। इस रीति से सगुण-वाक्यों की गति लगाने पर ब्रह्म का निःसन्दिग्ध अद्वितीयत्व सिद्ध हो जाता है।

इस प्रकार द्विविध लक्षणों से (स्वरूप लक्षण और तटस्थ लक्षण) जो लक्ष्य बताया जाता है, उसे बताते हैं—

'तदेवं स्वरूपतटस्थलक्षणलक्षितं तत्पदवाच्यमीश्वरचैतन्यं मायाप्रतिबिम्बितमिति केचित्। तेषामयमाशयः-जीवपरमेश्वरसाधारणं² चैतन्यमात्रं बिम्बम्, तस्यैव बिम्बस्याविद्यात्मिकायां मायायां प्रतिबिम्बमीश्वरचैतन्यमन्तःकरणेषु प्रतिबिम्बं जीवचैतन्यम्। 'कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः' इति श्रुतेः। एतन्मते³ जलाशयगतशरावगतसूर्यप्रतिबिम्बयोरिव जीवपरमेश्वरयोर्भेदः। अविद्यात्मकोपाधेर्व्यापकत्वात्तदुपाधिकेश्वरस्यापि व्यापकत्वम्। अन्तःकरणस्य परिच्छिन्नतया तदुपाधिकजीवस्यापि परिच्छिन्नत्वम्।

अर्थ— इस रीति से—स्वरूपलक्षण एवं तटस्थलक्षण-इन दो लक्षणों से लक्षित और


१. लक्षणद्वयलक्षितस्य ईश्वरस्य स्वरूपे मतभेदात् आह-तदेवमिति। केचिदिति संक्षेपशारीरककाराः।
२. 'णचे'-इति पाठान्तरम्।
३. एतन्मते-संक्षेपशारीरकन्मते।