वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५६ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीवेश्वरनिरूपणम्
'तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद से वाच्य जो ईश्वर-चैतन्य, वही माया में प्रतिबिम्बित हुआ 'चैतन्य' है—यह मत, कतिपय वेदान्तियों का है। इनका आशय यह है—जीव एवं परमेश्वर दोनों के लिये जो साधारण ( उभय साधारण ) 'चैतन्य', वह तो बिम्ब है, और इस बिम्ब का अविद्यात्मक माया में जो प्रतिबिम्ब गिरता है, वह 'ईश्वर-चैतन्य' ( ईश्वर ) है। एवं अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित होने वाला चैतन्य 'जीवचैतन्य' ( जीव ) है। इस विषय में 'जीव' कार्योपाधि है, और 'ईश्वर' कारणोपाधि है' इसमें श्रुति प्रमाण है। ( 'अन्तःकरण', माया का कार्य है और वही जीव की उपाधि होने से उसे ( जीव को ) 'कार्योपाधि' कहा गया है, एवं 'माया', जगत्कारण है, और वही 'ईश्वर' की उपाधि होने से 'ईश्वर' को 'कारणोपाधि' कहा है। ) इस मत के अनुसार एक ही सूर्य के भिन्न-भिन्न प्रतिबिम्बों के समान 'जीव' और 'ईश्वर' में भेद है। 'अविद्यात्मक उपाधि' के व्यापक होने से 'तदुपाधिक-ईश्वर' भी व्यापक और अन्तःकरण के परिच्छिन्न ( अव्यापक = व्याप्य ) होने से 'तदुपाधिक जीव' भी परिच्छिन्न कहा जाता है।
विवरण—इस परिच्छेद के आरम्भ में जीवब्रह्मैक्यरूप पारमार्थिक तत्व का ज्ञान, 'तत्त्वं' पदार्थ के ज्ञानाधीन होने से 'तत् पदार्थ' के निरूपण का आरम्भ किया प्रसंगवश लक्षण और उसके प्रकार ( भेद ) का भी विवेचन हुआ। अब ग्रन्थकार द्विविध-लक्षणों से लक्षित और 'तत्' पद के वाच्य ईश्वर-चैतन्य को बता रहे हैं। इस ईश्वरस्वरूप-विषयकवाद को वेदान्त में 'प्रतिबिम्बवाद' कहते हैं, जिसे कि पञ्चदशी में अच्छा समझाया गया है। इस मत के अनुसार माया में प्रतिबिम्बित शुद्ध-चैतन्य ही 'ईश्वर' है। ईश्वरस्वरूपगतचैतन्य' और 'जीवस्वरूपगतचैतन्य' दोनों एक ही हैं। किन्तु माया में उसका ( चैतन्य का ) गिरा हुआ प्रतिबिम्ब 'ईश्वर', और अन्तःकरण में गिरा हुआ प्रतिबिम्ब 'जीव', कहलाता है। एक ही सूर्य के भिन्न-भिन्न स्थलों में गिरे 'प्रतिबिम्ब' जैसे अनेक होते हैं वैसे ही 'ईश्वर' और 'जीव' परस्पर भिन्न होते हैं। इतना ही नहीं, अपितु जीव भी परस्पर भिन्न हैं। ईश्वर की उपाधि माया के व्यापक होने से ईश्वर-स्वरूप अर्थात् व्यापक होता है और जीव की उपाधि परिच्छिन्न होने से जीवस्वरूप परिच्छिन्न होता है। इस मत के अनुसार जीव की अनेकता सिद्ध होती है। इस मत में दोष दिखलाकर ग्रन्थकार दूसरा मत बताते हैं।
एतन्मतेऽविद्याकृत दोषा जीव इव परमेश्वरेऽपि स्युरुपाधेः प्रतिबिम्बपक्षपातित्वादित्यस्वरसाद् बिम्बात्मकमीश्वरचैतन्यमित्यपरे¹। तेषामयमाशयः—एकमेव चैतन्यं बिम्बत्वाक्रान्तमीश्वरचैतन्यं प्रतिबिम्बत्वाक्रान्तं जीवचैतन्यम्। बिम्बप्रतिबिम्बकल्पनोपाधिश्चैकजीव-
१. अपरे—विवरणकाराः। तेषाम्—विवरणकाराणाम्।