वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवेश्वरभेदन्निरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३५७
वादे अविद्या, अनेकजीववादे तु अन्तःकरणान्येव । '$^१$अविद्यान्तःकरण$^२$- रूपोपाधिप्रयुक्तो जीवपरभेदः । उपाधिकृतदोषाश्च प्रतिबिम्बे जीव एव वर्तन्ते, न तु बिम्बे परमेश्वरे । उपाधेः प्रतिबिम्बपक्षपातित्वात् । एत- न्मते च गगनसूर्यस्य जलादौ भासमानप्रतिबिम्बसूर्यस्येव जीव- परयोर्भेदः ।
अर्थ—इस मत में (ईश्वर, मायाप्रतिबिम्बित चैतन्य है) जीव के तुल्य ईश्वर में भी अविद्या के कारण दोष हो सकते हैं। क्योंकि उपाधिरूप अविद्या भी प्रतिबिम्ब की कोटि में ही है। इस अरुचि से कुछ वेदान्ती (मायाप्रतिबिम्बितचैतन्य को ईश्वर- स्वरूप न मानकर) बिम्बरूप चैतन्य को ही ईश्वर मानते हैं। इनका आशय यह है—एक ही चैतन्य बिम्बरूप से ईश्वर, ओर प्रतिबिम्बरूप से जीव कहा जाता है। बिम्ब ओर प्रतिबिम्ब की कल्पना होने में ‘एकजीववाद' पक्ष में 'अविद्या' रूप उपाधि और 'अनेकजीववाद' पक्ष में 'अन्तःकरण' उपाधि है।
जीव और ईश्वर में भेद, अविद्या (एकजीववाद पक्ष में) और अन्तःकरण (अनेकजीववाद पक्ष में) रूप उपाधि से होता है। उपाधि से उत्पन्न होने वाले दोष प्रतिबिम्बभूत जीव में ही रहते हैं। बिम्बभूत परमेश्वर में नहीं हो पाते। क्योंकि उपाधि प्रतिबिम्बपक्ष में अन्तर्भूत होती है। इस मत के अनुसार आकाश के सूर्य और जल में भासमान प्रतिबिम्बभूत सूर्य के भेद के समान जीव और ईश्वर में भेद है।
विवरण—पूर्व मत में मायाप्रतिबिम्ब चैतन्य को ईश्वरस्वरूप मानने से माया के दोष (अविद्यादोष) ईश्वर में होना सम्भव हैं उन्हें दूर करने के लिये बिम्बभूतचैतन्य को ही ईश्वरस्वरूप मानना चाहिये। प्रतिबिम्ब में उपाधि का अन्तर्भाव होने से उसके दोष बिम्बवादी के मत में ईश्वर में सम्भव नहीं हो सकते। किन्तु जीव, उपाधि में प्रति- बिम्बित होता है। इसमें पुनः दो पक्ष हैं। 'समस्तजीव एक ही है'—ऐसा मानने वाले
१. जीवेश्वरयोरभेदेऽपि भेदव्यवहारमाह अविद्येति । एकजीववादे अविद्योपाधिको जीवेशभेदः, प्रतिबिम्बस्य जीवत्वात्, बिम्बस्य ईशत्वात् । नाना जीववादे तु अन्तःकरण- तत्संस्कारावच्छिन्नाज्ञानोपाधिकः, अन्तःकरणतत्संस्कारावच्छिन्नाज्ञानप्रतिबिम्बितचैतन्यस्य जीवत्वात् बिम्बस्य च ईशत्वात् इति । एतन्मते—विवरणकारमते ।
एवं च विवरणकारमते जीवेशयोर्भेदस्तथैव, यथा गगनसूर्य-प्रतिबिम्बसूर्ययोः पार- मार्थिकभेदाऽभावेऽपि औपाधिकः कल्पितो भेदः ।
अत्र विवरणाभिमतबिम्बप्रतिबिम्बभावस्यैव अनुसन्धानेन हि परिभाषाकाराः भामत्य- भिमत अवच्छेदवादे स्वस्य असम्मति सूचयति । तत्र निमित्तं तु अवच्छेदपक्षे ईश्वरस्य सर्वान्तर्यामित्वाद्यनुपपत्तिः । न हि जीवे मायावच्छिन्नचैतन्यस्य प्रवेशः संभवति ।
२. 'णोपाधि०'—इति पाठान्तरम् ।