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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३५८वेदान्तपरिभाषा[ जीवेश्वरभेदनिरूपणम्

एकजीववादी और जीव परस्पर भिन्न हैं—ऐसा मानने वाले अनेकजीववादी हैं। 'जीव एक हैं' यह मानने पर एक उपाधि माननी होती है और वह है अविद्या। 'जीव अनेक हैं'—यह मानने पर उपाधियां अनेक माननी होती हैं, और वे भिन्न-भिन्न अन्तः-करण हैं। इस मत में दोषाश्रय केवल जीव ही हो सकता है क्योंकि वह प्रतिबिम्बभूत है और उपाधि, प्रतिबिम्बपक्षान्तर्भूत है। आकाशस्थ सूर्य और जलाशयगत सूर्य में जैसे भेद है वैसे ही जीव और परमेश्वर में भेद होता है।

इस दूसरे मत में पूर्वोक्त दोष न होने पर भी अन्य दोष की आशङ्का कर उसका निराकरण करते हैं।

ननु ग्रीवास्थमुखस्य दर्पणप्रदेश इव बिम्बचैतन्यस्य परमेश्वरस्य जीवप्रदेशेऽभावात्तस्य सर्वान्तर्यामित्वं न स्यादिति चेत्। न। साभ्र-नक्षत्रस्य आकाशस्य जलादौ प्रतिबिम्बितत्वेऽपि। बिम्बभूतमहाकाश-स्यापि जलादिप्रदेशसम्बन्धदर्शनेन परिच्छिन्नबिम्बस्य प्रतिविम्बदेशा-सम्बन्धि १त्वेऽप्यपरिच्छिन्नब्रह्मबिम्बस्य प्रतिबिम्ब २देशसम्बन्धा-विरोधात्।

अर्थ—शंका—ग्रीवा पर (कण्ठ पर) स्थित मुख का दर्पण में जैसे अभाव रहता है (दर्पण में केवल उसका प्रतिबिम्बमात्र रहता है) वैसे ही (ईश्वर को यदि बिम्बरूप मानें) बिम्बभूतचैतन्यस्वरूपपरमेश्वर का जीव-प्रदेश में अभाव होने से ईश्वर का सर्वान्तर्यामित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा।

समाधान—ऐसी शङ्का करना ठीक नहीं है। अभ्र (मेघ) नक्षत्र सहित आकाश का जल में प्रतिबिम्ब पड़ने पर बिम्बभूतमहाकाश का भी जल प्रदेश के साथ सम्बन्ध जैसे दीखता है वैसे ही परिच्छिन्नबिम्ब का प्रतिबिम्ब-प्रदेश के साथ सम्बन्ध न होने पर भी अपरिच्छिन्न ब्रह्मबिम्ब का प्रतिबिम्ब-देश के साथ सम्बन्ध हो सकने में कोई विरोध नहीं है।

विवरण—पूर्वपक्षी के कहने का आशय यह है—बिम्बचैतन्य को 'परमेश्वर' एवं प्रतिबिम्बचैतन्य को 'जीव' कहने पर बिम्ब का प्रतिबिम्ब के साथ जैसे साक्षात् सम्बन्ध नहीं वैसे ही ईश्वर का जीव के साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं हो सकेगा। तब ईश्वर का 'सर्वनियन्तृत्व' सिद्ध न होगा।

इस पर सिद्धान्ती का उत्तर यह है—हम अभ्रनक्षत्रों के सहित आकाश के उदाहरण से देखें। ऐसे आकाश का, जल में गिरे प्रतिबिम्ब के साथ सम्बन्ध न रहने पर भी


१. 'खेऽप्य'–इति पाठान्तरम्।
२. 'म्बप्रदेश'–इति पाठान्तरम्।