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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 482 में से

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जीवेश्वरभेद[निरूपणम्] विषयपरिच्छेदः ३५९

बिम्बभूतमहाकाश के एक होने से, जिस जलादि-प्रदेश में उसका प्रतिबिम्ब गिरा है तदवच्छिन्न प्रदेश के साथ भी उसका सम्बन्ध रहता है। वैसे ही परिच्छिन्न-बिम्ब-स्वरूप परमेश्वर का, प्रतिबिम्बस्वरूप जीव के साथ सम्बन्ध न रहने पर भी अपरिच्छिन्न ब्रह्मबिम्ब का सबके साथ अर्थात् प्रतिबिम्ब जीव के साथ भी सम्बन्ध है ही। इस कारण ईश्वर के सर्वान्तर्यामित्व में कोई हानि नहीं हो पाती।

अब सिद्धान्ती उदाहरण में दिये दृष्टान्त पर दोष की आशंका कर उसका परिहार करते हैं—

'न च ²रूपहीनस्य ब्रह्मणो न प्रतिबिम्बसम्भवः, रूपवत एव तथात्वदर्शनादिति वाच्यम्। नीरूपस्यापि रूपस्य प्रतिबिम्ब दर्शनात्। न च नीरूपस्य द्रव्यस्य प्रतिबिम्बभावनियमः, आत्मने द्रव्यत्वाभावस्योक्तत्वात्।

'एक एव हि भूतात्मा भूते भूतेव्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥' (ब्र० बिं० उ० १२)

'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा॥

इत्यादिवाक्येन ब्रह्मप्रतिबिम्बाभावानुमानस्य³ बाधितत्वाच्च। तदेवं ⁴तत्पदार्थो निरूपितः।

**अर्थ—**ब्रह्म, रूपरहित है। और रूपहीन का प्रतिबिम्ब गिरना सम्भव नहीं, क्योंकि रूपवान् पदार्थ का प्रतिबिम्ब गिरता देखा जाता है—ऐसी शंका नहीं की जा सकती। क्योंकि रूप में अपना स्वयं का पृथक् रूप न रहने पर भी उसका प्रतिबिम्ब गिरता देखा जाता है। इसके अतिरिक्त 'रूपरहित' द्रव्य के प्रतिबिम्ब का अभाव रहता है' (प्रतिबिम्ब नहीं गिरता)—यह नियम भी नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि आत्मा में द्रव्यत्व का अभाव (आत्मा द्रव्य नहीं है) हम पहले ही बता चुके हैं। इसके


१. रूपवतः एवं प्रतिबिम्बः इति न नियमः, किन्तु रूपवद्द्रव्यस्यैव प्रतिबिम्बः इति नियमो वर्तते। ब्रह्म द्रव्यं सदपि न रूपवत्, तस्मात् तस्य प्रतिबिम्बो न युक्तः इतिशंकाकृदाशयः। २. 'नीरूपस्य'—इति पाठान्तरम्। ३. 'ब्रह्म न प्रतिबिम्बते अचाक्षुषत्वात् गन्धवत्' इति ब्रह्मप्रतिबिम्बाभावानुमानस्येत्यर्थः। ४. तत्त्वमसीतिवाक्यावयवस्य 'तत्' पदस्य शक्यार्थो लक्ष्यार्थश्चेत्यर्थः।

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