वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३६० | वेदान्तपरिभाषा | [ अवस्थात्रयनिरूपणम् |
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अतिरिक्त "( निरुपाधिक ) एकरूप आत्मा ( अन्तःकरणोपाधियों से ) जलस्थचन्द्र के समान अनेक प्रकार से दीखता है" "यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधै-कोऽनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा"—जिस प्रकार ज्योतिःस्वरूप सूर्य भिन्न विभिन्न जलों में अनेक प्रकार से दीखता है, यह अज आत्म-देव भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में ( अन्तःकरणों में ) उपाधियों से भिन्न होता है—इत्यादि श्रुतिवाक्यों से ब्रह्मप्रतिबिम्बाभावसाधक अनुमान, बाधित हो जाते हैं। इस प्रकार 'तत्' पदार्थ का निरूपण हुआ।
विवरण--'जीव' को चित्प्रतिबिम्ब मानने पर यह दोष आता है कि 'चित्' ( ब्रह्म ) यदि रूपरहित है तो उसका प्रतिबिम्ब कैसे ? क्योंकि रूपवान् पदार्थ का ही प्रतिबिम्ब देखने में आता है। इस पर सिद्धान्ती का यह उत्तर है कि 'रूप' गुण स्वयं रूपरहित है। क्योंकि 'रूप' पर 'रूप' नहीं रहता 'गुणे गुणानङ्गीकारात्।' तथापि रूप का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। तब नीरूप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब में कोई बाधा नहीं हो सकती। अथवा यदि पूर्वपक्षी यह व्याप्ति माने कि 'जो द्रव्य रूपवान् हो उसी का प्रतिबिम्ब होता है, तथापि हमें कोई हानि नहीं है। क्योंकि हम ( वेदान्ती ) 'आत्मा' को द्रव्य नहीं मानते। 'रूपरहित आकाश-द्रव्य का प्रतिबिम्ब नहीं होता'—यह मानने पर भी 'रूपरहित और अद्रव्य-ब्रह्म का रूपवत् प्रतिबिम्ब मानने में कोई आपत्ति नहीं है। ब्रह्म के प्रतिबिम्ब का अभाव सिद्ध करने के लिये प्रस्तुत किये सभी अनुमानों का श्रुतियों से बाध हो जाता है। इस रीति से 'तत्त्वमसि' महावाक्यस्थ 'तत्' पदार्थ का विवेचन किया गया है।
अब 'त्वम्' पदार्थ के विवेचनार्थ ग्रन्थकार जीवसम्बन्धी भिन्न-भिन्न वादों को बता रहे हैं।
इदानीं त्वं पदार्थो निरूप्यते। 'एकजीववादेऽविद्याप्रतिबिम्बो जीवः, अनेकजीववादे अन्तः-करणप्रतिबिम्बः।
अब 'त्वम्' पदार्थ का निरूपण किया जाता है ( 'त्वम्' पदार्थ ही जीव है ) 'एक-जीववादपक्ष' में अविद्या में पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब ही जीव है।
अनेकजीववादपक्ष में अन्तःकरण में पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब ही जीव है।
स च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिरूपावस्थात्रयवान्। तत्र जाग्रद्दशा
१. एकजीववादे जीवस्य स्वरूपम्—अविद्यायां चित्प्रतिबिम्बः, उपाधिभूताया अविद्याया एकत्वात् जीवस्य एकत्वम्। अनेकजीववादे तत्स्वरूपम्—अन्तःकरणे चित्प्रति-बिम्बः। जीवोपाधेः अन्तःकरणस्य नानात्वात् जीवस्यापि नानात्वम्।