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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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जीवस्यावस्थात्रयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३६१

नामेन्द्रियजन्यज्ञानावस्था । अवस्थान्तरे इन्द्रियाभावान्नातिव्याप्तिः । इन्द्रियजन्यज्ञानं चान्तःकरणवृत्तिः । स्वरूपज्ञानस्यानादित्वात् ।

अर्थ— उस जीव की जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीन अवस्थाएँ होती हैं । ( जाग्रदवस्था की व्याख्या ) जाग्रत् दशा का अर्थ है कि जिसमें इन्द्रियों के द्वारा ज्ञान होता है—वह अवस्था । अन्य अवस्थाओं में इन्द्रियों के न होने से ( इन्द्रियव्यापार न होने से ) उसमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । इन्द्रियजन्य ज्ञान का अर्थ है अन्तःकरणवृत्ति । स्वरूपज्ञान अनादि होने से ( अन्तःकरणवृत्ति को ही ज्ञान कहना पड़ता ) है।

विवरण— जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति के भेद से जीव की तीन अवस्थाएँ होती हैं । उनमें से पहली अवस्था में इन्द्रियों के द्वारा बाह्यवस्तु का ज्ञान होता है । अन्य दो अवस्थाओं में इन्द्रियव्यापार न हो सकने से जाग्रदवस्था का यह लक्षण दो अवस्थाओं अतिव्याप्त नहीं होता । इन्द्रियजन्य ज्ञान का स्वरूप यह है—अन्तःकरणवृत्ति ( अन्तःकरण की तत्तत्पदार्थ के आकार के तुल्य होनेवाली स्थिति ) यहाँ पर अन्तःकरणवृत्त में 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग गौणतया किया है । अब यह यहाँ शंका हो सकती है कि जीव के ज्ञानस्वरूप में ही 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता ? उसके उत्तर में यह कहा जाता है कि चैतन्यरूप अनादि होने से अजन्य है, और इन्द्रियजन्यज्ञान तो उत्पत्तिविनाशशालि होता है । यदि स्वरूपज्ञान को ही इन्द्रियजन्यज्ञान कहा जाय तो वह अनादि अनन्त होने से जाग्रदवस्था में खण्ड ही न पड़ा होता । अतः यह सब अनुभवविरुद्ध होने से अन्तःकरणवृत्ति को ही इन्द्रियजन्यज्ञान कहा गया है ।

अब अन्तःकरणवृत्ति को क्यों माना गया है यह बताने के लिये तद्विषयक मतमतान्तरों का प्रस्ताव करते हैं—

'सा चान्तःकरणवृत्तिरावरणाभिभवार्थेत्येकं मतम् । तथा हि—

१. अन्तःकरणवृत्तिः किमर्थं स्वीक्रियते ? यतः सर्वेषां पदार्थानां साक्षिप्रकाशादेव प्रकाशः संभवति इति चेत्, भवतु कथमपि वृत्त्यङ्गीकारः, तस्या बहिर्निर्गमवादः असंगत एव । परोक्षस्थल इव विनावृत्तिनिर्गमं प्रकाशसंभवात् । यथा हि शब्दपरोक्षस्य आनुमानिकपरोक्षस्य च भेदःकरणभेदनिबन्धनः, एवं प्रत्यक्ष-परोक्षभेदोऽपि तन्निबन्धनः सेत्स्यत्येवेत्याशंकायामाह 'सा चेति' । शब्दानुमानावगतेभ्यः प्रत्यक्षावगते स्पष्टता अनुभूयते । सा च प्रत्यक्षग्राह्ये अभिव्यक्तचैतन्यावगुण्ठनम्, अन्यत्र परोक्षग्राह्ये न तत् इत्यत एव निर्वहणीया । चैतन्याभिव्यक्तिश्च चैतन्यावरणाभिभवमन्तरा न संभवति । स च आवरणाभिभवः ज्ञानाऽज्ञानयोरुभयोरपि समानाश्रयत्वमन्तरा न संभवतीति तत्सम्पादनार्थं वृत्तिनिर्गमः अपेक्ष्यते । सति हि तस्मिन् विषयान्तःकरणवृत्तीनामेकचैतन्यावच्छेदकत्वेन विषयचैतन्यं, प्रमातृचैतन्यं चैकं भवति, इति विषयाश्रितं ज्ञानं प्रमात्राश्रितमज्ञानं च