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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३५३

अर्थ—वेदान्तवाक्यों के द्वारा ब्रह्म को 'जगत्कारण' बताये जाने पर ब्रह्म को प्रपञ्चयुक्त मानना पड़ेगा। यदि ऐसा न मानें तो वेदान्त में पढ़े गये सृष्टि प्रतिपादक वाक्यों को अप्रमाण कहना होगा। उत्तर में कहते हैं—नहीं, वेदान्त के सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों का सृष्टि के कथन में तात्पर्य न होकर ब्रह्म के अद्वय प्रतिपादन में तात्पर्य है।

विवरण--'अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निष्कले च प्रलीयते'--अव्यक्त, निष्कल पुरुष में विलीन होता है—इससे जगत् साक्षात् या परम्परा से परमात्मा में विलीन होता है। इस स्मृति से ब्रह्म को जगत् का उपादान कारण कहना होगा। तब मृत्तिका के जैसे घट-शरावादि प्रपञ्च, वैसे ही जगत् को ब्रह्म का प्रपञ्च कहना होगा। क्योंकि ब्रह्म 'प्रपञ्चसहवर्तमान' होने से प्रपञ्च, ब्रह्मपदवाच्य होगा। और ऐसा न मानने पर वेदान्त में (तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः) बताये गये सृष्टिवाक्यों की क्या गति होगी? अर्थात् वे अप्रमाण होंगे। इस पर ग्रंथकार उत्तर देते हैं कि वेदान्त के सृष्टि-वाक्यों का उद्देश्य सृष्टिप्रतिपादन में नहीं है, अपितु 'ब्रह्म, अद्वितीय है'—यह बताने में है। इसी बात को अग्रिम ग्रंथ से कहते हैं—

तत्प्रतिपत्तौ कथं सृष्टेरुपयोगः ? । इत्थम्—यदि सृष्टिमनुपन्यस्य निषेधो ब्रह्मणि प्रपञ्चस्य प्रतिपाद्येत, तदा ब्रह्मणि ²निषिद्धस्य प्रपञ्चस्य वायौ प्रतिषिद्धस्य रूपस्येव ब्रह्मणोऽन्यत्रावस्थानशङ्कायां न निर्विचिकित्समद्वितीयत्वं प्रतिपादितं स्यात् । ततः सृष्टिवाक्याद् ब्रह्मणोपादेयत्व-ज्ञाने सत्युपादानं विना कार्यस्यान्यत्र सद्भावशङ्कायां निरस्तायां नेति नेतीत्या³दीनां ब्रह्मण्यपि तस्यासत्त्वोपपादने ⁴प्रपञ्चस्य तुच्छत्वावगमे निरस्ताखिलद्वैतविभ्रममखण्डं सच्चिदानन्दैकरसं ब्रह्म सिद्धयतीति परम्परया सृष्टिवाक्यानाम⁵प्यद्वितीये ब्रह्मण्येव तात्पर्यम् ।⁶

अर्थ—सृष्टि का (सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों का) ब्रह्मज्ञान करा देने में उपयोग कैसे होता है ? (उत्तर)—इस रीति से उपयोग होता है—सृष्टि का उपन्यास न कर प्रपञ्च का ब्रह्म में यदि निषेध कहें तो उस निषिद्ध प्रपञ्च की ब्रह्म से अन्यत्र स्थिति की


१. 'णिप्रतिपा'-इति पाठान्तरम् ।२. 'प्रतिषि'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'त्यादिना'-इति पाठान्तरम् ।४. 'नेन'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'मद्वितीये'-इति पाठान्तरम् ।

६. आनन्दस्वरूपस्यैव प्रमाणान्तराऽगृहीतत्वादप्राप्ते शास्त्रमर्थवत् इति न्यायेन तत्रैव तात्पर्यमिति । अर्थात् सर्वाणि कारणतापरवाक्यानि सृष्टिवाक्यानि अद्वितीयब्रह्मस्वरूप-प्रतिपादनार्थानीति भावः ।

३५४वेदान्तपरिभाषा[ सृष्ट्यादिवाक्यानां ब्रह्मपरत्वम्

आशंका हो सकती है, जैसे—वायु में रूप का निषेध करने पर, उससे अन्यत्र रूप की स्थिति की आशंका होती है। तब असन्दिग्ध अद्वैत नहीं बता पाये—कहा जायगा। अतः सृष्टिवाक्यों से 'जगत्, ब्रह्मोपादानक है' यह ज्ञान होने पर 'उपादान के बिना कार्य का अन्यत्र रहना असंभव है'—इस प्रकार आशंका का निरास हो जाता है। 'नेति-नेति' वाक्य से ब्रह्म में ही प्रपञ्च का असत्त्व बताये जाने पर प्रपञ्च की तुच्छता का ज्ञान होता है। और समस्तद्वैत, विभ्रमरहित, अखण्ड, सच्चिदानन्दघन एक ब्रह्म ही सिद्ध होता है। इस रीति से सृष्टिवाक्यों का पर्याय से अद्वितीय ब्रह्म में ही पर्य-वसान होता है।

विवरण--सृष्टि का प्रस्ताव न कर ब्रह्म में प्रपञ्च का अभाव यदि कहा होता तो प्रपञ्च का कारण अन्य कोई होना चाहिये—यह आशंका होना स्वाभाविक है। उससे ब्रह्म के अद्वितीयत्व में बाध होता है। इसलिये सृष्टिवाक्यों से प्रपञ्च की उत्पत्ति, ब्रह्म से बताकर उसका निराकरण किया है। और इस रीति से एकमेवाद्वितीय ब्रह्म की सिद्धि की गई है। इस कारण सृष्टिवाक्यों का वाच्यार्थ ग्रहण न कर 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः'—जिसमें शब्द का तात्पर्य हो वही उस शब्द का अर्थ है—इस उक्ति के अनुसार सृष्टिवाक्यों कायथाश्रुत अर्थ ग्रहण न कर तात्पर्यार्थ का ग्रहण करना चाहिये। जैसे 'विषं भुंक्ष्व' वाक्य का वाच्यार्थ 'विष भक्षण कर' है। परन्तु वह उद्दिष्ट न होकर 'शत्रुगृह में भोजन करने की अपेक्षा विष खाना अच्छा' इस न्याय से इस वाक्य का तात्पर्यार्थ 'शत्रुगृह में भोजन मत करो' यही लेना पड़ता है। अतः सृष्टिवाक्यों का वाच्यार्थ ग्रहण न कर ब्रह्माद्वितीयत्वप्रतिपादक तात्पर्यार्थ ग्रहण करने पर सृष्टिवाक्य अप्रमाण नहीं होते।

शंका—सृष्टिवाक्यों से अद्वितीय ब्रह्म का बोध होने पर भी असन्दिग्ध अद्वितीय ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकेगा। क्योंकि वेदान्त के "य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः (छा० ६-७-८) आदि वाक्यों में सगुण ब्रह्म का प्रतिपादन किया है। यह आशंका कर ग्रन्थकार कहते हैं—

'उपासनाप्रकरणपठितसगुणब्रह्मवाक्यानां² चोपासनाविध्यपेक्षित-गुणारोपमात्रपरत्वं, न गुणपरत्वम्। निर्गुणप्रकरणपठितानां सगुण-वाक्यानां तु निषेधवाक्यापेक्षितनिषेध्य³सम्पादकत्वेन विनियोग इति न किञ्चिदपि वाक्यमद्वितीयब्रह्मप्रतिपादने विरुध्यते।


१. ननु भवतु सृष्टिवाक्यानां कथमपि निषेधशेषत्वेन अद्वितीयब्रह्मप्रतिपत्त्युपायत्वम्। किन्तु हिरण्मयः, सत्यकामः, सत्यसंकल्पः इत्यादिवाक्यानां स्वत एव सफलोपासनावाक्य-गम्यानां न निषेधशेषत्वं संभवति। यथा च तैः सद्वितीयत्वं ब्रह्मणः सिद्धम् इत्याशंकाया-माह उपासनेति।
२. 'नामुपास'—इति पाठान्तरम्।
३. 'समर्पकत्वेन'—इति पाठान्तरम्।

जीवेश्वरनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३५५

अर्थ— उपासना के प्रकरण में आये हुए सगुणब्रह्मप्रतिपादक वाक्यों का तात्पर्य, उपासनाविधि में अपेक्षित गुणों का केवल आरोप करने के लिये होता है। ब्रह्म में उन गुणों का अस्तित्व प्रतिपादन में नहीं। निर्गुण ब्रह्म प्रकरण में आये हुए सगुणब्रह्म-प्रतिपादकवाक्यों का उपयोग, निषेधवाक्यों में निषेध के उपयोगी (निषेध के लिये इष्ट) गुणों की केवल उपस्थिति करा देना मात्र है। इस रीति से कोई भी वाक्य अद्वितीय-ब्रह्मप्रतिपादन के विरुद्ध नहीं है।

विवरण— सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों के होने पर भी ब्रह्म के अद्वैत होने में किस प्रकार बाध नहीं है—यह बता चुके। अब सगुणब्रह्मस्वरूप के प्रतिपादक वाक्यों के होने पर भी ब्रह्म के निःशङ्क अद्वितीयत्व होने में किस प्रकार बाध नहीं होता, सो बताते हैं।

ब्रह्मोपासना के प्रकरण में उपासना के दो प्रकार बताये गये हैं। एक सगुणब्रह्मो-पासना और दूसरी निर्गुणब्रह्मोपासना। उनमें से प्रथम उपासना में अपेक्षित गुणों का आरोप करनेभर के लिये सगुणब्रह्मवाक्यों का उपयोग है, और दूसरी उपासना में सगुणब्रह्मप्रतिपादक वाक्यों का उपयोग केवल 'नेति-नेति' (यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं) निषेध के लिये अपेक्षित पदार्थों का संग्रह करना मात्र है। इस रीति से सगुण-वाक्यों की गति लगाने पर ब्रह्म का निःसन्दिग्ध अद्वितीयत्व सिद्ध हो जाता है।

इस प्रकार द्विविध लक्षणों से (स्वरूप लक्षण और तटस्थ लक्षण) जो लक्ष्य बताया जाता है, उसे बताते हैं—

'तदेवं स्वरूपतटस्थलक्षणलक्षितं तत्पदवाच्यमीश्वरचैतन्यं मायाप्रतिबिम्बितमिति केचित्। तेषामयमाशयः-जीवपरमेश्वरसाधारणं² चैतन्यमात्रं बिम्बम्, तस्यैव बिम्बस्याविद्यात्मिकायां मायायां प्रतिबिम्बमीश्वरचैतन्यमन्तःकरणेषु प्रतिबिम्बं जीवचैतन्यम्। 'कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः' इति श्रुतेः। एतन्मते³ जलाशयगतशरावगतसूर्यप्रतिबिम्बयोरिव जीवपरमेश्वरयोर्भेदः। अविद्यात्मकोपाधेर्व्यापकत्वात्तदुपाधिकेश्वरस्यापि व्यापकत्वम्। अन्तःकरणस्य परिच्छिन्नतया तदुपाधिकजीवस्यापि परिच्छिन्नत्वम्।

अर्थ— इस रीति से—स्वरूपलक्षण एवं तटस्थलक्षण-इन दो लक्षणों से लक्षित और


१. लक्षणद्वयलक्षितस्य ईश्वरस्य स्वरूपे मतभेदात् आह-तदेवमिति। केचिदिति संक्षेपशारीरककाराः।
२. 'णचे'-इति पाठान्तरम्।
३. एतन्मते-संक्षेपशारीरकन्मते।

३५६ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीवेश्वरनिरूपणम्

'तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद से वाच्य जो ईश्वर-चैतन्य, वही माया में प्रतिबिम्बित हुआ 'चैतन्य' है—यह मत, कतिपय वेदान्तियों का है। इनका आशय यह है—जीव एवं परमेश्वर दोनों के लिये जो साधारण ( उभय साधारण ) 'चैतन्य', वह तो बिम्ब है, और इस बिम्ब का अविद्यात्मक माया में जो प्रतिबिम्ब गिरता है, वह 'ईश्वर-चैतन्य' ( ईश्वर ) है। एवं अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित होने वाला चैतन्य 'जीवचैतन्य' ( जीव ) है। इस विषय में 'जीव' कार्योपाधि है, और 'ईश्वर' कारणोपाधि है' इसमें श्रुति प्रमाण है। ( 'अन्तःकरण', माया का कार्य है और वही जीव की उपाधि होने से उसे ( जीव को ) 'कार्योपाधि' कहा गया है, एवं 'माया', जगत्कारण है, और वही 'ईश्वर' की उपाधि होने से 'ईश्वर' को 'कारणोपाधि' कहा है। ) इस मत के अनुसार एक ही सूर्य के भिन्न-भिन्न प्रतिबिम्बों के समान 'जीव' और 'ईश्वर' में भेद है। 'अविद्यात्मक उपाधि' के व्यापक होने से 'तदुपाधिक-ईश्वर' भी व्यापक और अन्तःकरण के परिच्छिन्न ( अव्यापक = व्याप्य ) होने से 'तदुपाधिक जीव' भी परिच्छिन्न कहा जाता है।

विवरण—इस परिच्छेद के आरम्भ में जीवब्रह्मैक्यरूप पारमार्थिक तत्व का ज्ञान, 'तत्त्वं' पदार्थ के ज्ञानाधीन होने से 'तत् पदार्थ' के निरूपण का आरम्भ किया प्रसंगवश लक्षण और उसके प्रकार ( भेद ) का भी विवेचन हुआ। अब ग्रन्थकार द्विविध-लक्षणों से लक्षित और 'तत्' पद के वाच्य ईश्वर-चैतन्य को बता रहे हैं। इस ईश्वरस्वरूप-विषयकवाद को वेदान्त में 'प्रतिबिम्बवाद' कहते हैं, जिसे कि पञ्चदशी में अच्छा समझाया गया है। इस मत के अनुसार माया में प्रतिबिम्बित शुद्ध-चैतन्य ही 'ईश्वर' है। ईश्वरस्वरूपगतचैतन्य' और 'जीवस्वरूपगतचैतन्य' दोनों एक ही हैं। किन्तु माया में उसका ( चैतन्य का ) गिरा हुआ प्रतिबिम्ब 'ईश्वर', और अन्तःकरण में गिरा हुआ प्रतिबिम्ब 'जीव', कहलाता है। एक ही सूर्य के भिन्न-भिन्न स्थलों में गिरे 'प्रतिबिम्ब' जैसे अनेक होते हैं वैसे ही 'ईश्वर' और 'जीव' परस्पर भिन्न होते हैं। इतना ही नहीं, अपितु जीव भी परस्पर भिन्न हैं। ईश्वर की उपाधि माया के व्यापक होने से ईश्वर-स्वरूप अर्थात् व्यापक होता है और जीव की उपाधि परिच्छिन्न होने से जीवस्वरूप परिच्छिन्न होता है। इस मत के अनुसार जीव की अनेकता सिद्ध होती है। इस मत में दोष दिखलाकर ग्रन्थकार दूसरा मत बताते हैं।

एतन्मतेऽविद्याकृत दोषा जीव इव परमेश्वरेऽपि स्युरुपाधेः प्रतिबिम्बपक्षपातित्वादित्यस्वरसाद् बिम्बात्मकमीश्वरचैतन्यमित्यपरे¹। तेषामयमाशयः—एकमेव चैतन्यं बिम्बत्वाक्रान्तमीश्वरचैतन्यं प्रतिबिम्बत्वाक्रान्तं जीवचैतन्यम्। बिम्बप्रतिबिम्बकल्पनोपाधिश्चैकजीव-


१. अपरे—विवरणकाराः। तेषाम्—विवरणकाराणाम्।

जीवेश्वरभेदन्निरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३५७

वादे अविद्या, अनेकजीववादे तु अन्तःकरणान्येव । '$^१$अविद्यान्तःकरण$^२$- रूपोपाधिप्रयुक्तो जीवपरभेदः । उपाधिकृतदोषाश्च प्रतिबिम्बे जीव एव वर्तन्ते, न तु बिम्बे परमेश्वरे । उपाधेः प्रतिबिम्बपक्षपातित्वात् । एत- न्मते च गगनसूर्यस्य जलादौ भासमानप्रतिबिम्बसूर्यस्येव जीव- परयोर्भेदः ।

अर्थ—इस मत में (ईश्वर, मायाप्रतिबिम्बित चैतन्य है) जीव के तुल्य ईश्वर में भी अविद्या के कारण दोष हो सकते हैं। क्योंकि उपाधिरूप अविद्या भी प्रतिबिम्ब की कोटि में ही है। इस अरुचि से कुछ वेदान्ती (मायाप्रतिबिम्बितचैतन्य को ईश्वर- स्वरूप न मानकर) बिम्बरूप चैतन्य को ही ईश्वर मानते हैं। इनका आशय यह है—एक ही चैतन्य बिम्बरूप से ईश्वर, ओर प्रतिबिम्बरूप से जीव कहा जाता है। बिम्ब ओर प्रतिबिम्ब की कल्पना होने में ‘एकजीववाद' पक्ष में 'अविद्या' रूप उपाधि और 'अनेकजीववाद' पक्ष में 'अन्तःकरण' उपाधि है।

जीव और ईश्वर में भेद, अविद्या (एकजीववाद पक्ष में) और अन्तःकरण (अनेकजीववाद पक्ष में) रूप उपाधि से होता है। उपाधि से उत्पन्न होने वाले दोष प्रतिबिम्बभूत जीव में ही रहते हैं। बिम्बभूत परमेश्वर में नहीं हो पाते। क्योंकि उपाधि प्रतिबिम्बपक्ष में अन्तर्भूत होती है। इस मत के अनुसार आकाश के सूर्य और जल में भासमान प्रतिबिम्बभूत सूर्य के भेद के समान जीव और ईश्वर में भेद है।

विवरण—पूर्व मत में मायाप्रतिबिम्ब चैतन्य को ईश्वरस्वरूप मानने से माया के दोष (अविद्यादोष) ईश्वर में होना सम्भव हैं उन्हें दूर करने के लिये बिम्बभूतचैतन्य को ही ईश्वरस्वरूप मानना चाहिये। प्रतिबिम्ब में उपाधि का अन्तर्भाव होने से उसके दोष बिम्बवादी के मत में ईश्वर में सम्भव नहीं हो सकते। किन्तु जीव, उपाधि में प्रति- बिम्बित होता है। इसमें पुनः दो पक्ष हैं। 'समस्तजीव एक ही है'—ऐसा मानने वाले


१. जीवेश्वरयोरभेदेऽपि भेदव्यवहारमाह अविद्येति । एकजीववादे अविद्योपाधिको जीवेशभेदः, प्रतिबिम्बस्य जीवत्वात्, बिम्बस्य ईशत्वात् । नाना जीववादे तु अन्तःकरण- तत्संस्कारावच्छिन्नाज्ञानोपाधिकः, अन्तःकरणतत्संस्कारावच्छिन्नाज्ञानप्रतिबिम्बितचैतन्यस्य जीवत्वात् बिम्बस्य च ईशत्वात् इति । एतन्मते—विवरणकारमते ।

एवं च विवरणकारमते जीवेशयोर्भेदस्तथैव, यथा गगनसूर्य-प्रतिबिम्बसूर्ययोः पार- मार्थिकभेदाऽभावेऽपि औपाधिकः कल्पितो भेदः ।

अत्र विवरणाभिमतबिम्बप्रतिबिम्बभावस्यैव अनुसन्धानेन हि परिभाषाकाराः भामत्य- भिमत अवच्छेदवादे स्वस्य असम्मति सूचयति । तत्र निमित्तं तु अवच्छेदपक्षे ईश्वरस्य सर्वान्तर्यामित्वाद्यनुपपत्तिः । न हि जीवे मायावच्छिन्नचैतन्यस्य प्रवेशः संभवति ।

२. 'णोपाधि०'—इति पाठान्तरम् ।

३५८वेदान्तपरिभाषा[ जीवेश्वरभेदनिरूपणम्

एकजीववादी और जीव परस्पर भिन्न हैं—ऐसा मानने वाले अनेकजीववादी हैं। 'जीव एक हैं' यह मानने पर एक उपाधि माननी होती है और वह है अविद्या। 'जीव अनेक हैं'—यह मानने पर उपाधियां अनेक माननी होती हैं, और वे भिन्न-भिन्न अन्तः-करण हैं। इस मत में दोषाश्रय केवल जीव ही हो सकता है क्योंकि वह प्रतिबिम्बभूत है और उपाधि, प्रतिबिम्बपक्षान्तर्भूत है। आकाशस्थ सूर्य और जलाशयगत सूर्य में जैसे भेद है वैसे ही जीव और परमेश्वर में भेद होता है।

इस दूसरे मत में पूर्वोक्त दोष न होने पर भी अन्य दोष की आशङ्का कर उसका निराकरण करते हैं।

ननु ग्रीवास्थमुखस्य दर्पणप्रदेश इव बिम्बचैतन्यस्य परमेश्वरस्य जीवप्रदेशेऽभावात्तस्य सर्वान्तर्यामित्वं न स्यादिति चेत्। न। साभ्र-नक्षत्रस्य आकाशस्य जलादौ प्रतिबिम्बितत्वेऽपि। बिम्बभूतमहाकाश-स्यापि जलादिप्रदेशसम्बन्धदर्शनेन परिच्छिन्नबिम्बस्य प्रतिविम्बदेशा-सम्बन्धि १त्वेऽप्यपरिच्छिन्नब्रह्मबिम्बस्य प्रतिबिम्ब २देशसम्बन्धा-विरोधात्।

अर्थ—शंका—ग्रीवा पर (कण्ठ पर) स्थित मुख का दर्पण में जैसे अभाव रहता है (दर्पण में केवल उसका प्रतिबिम्बमात्र रहता है) वैसे ही (ईश्वर को यदि बिम्बरूप मानें) बिम्बभूतचैतन्यस्वरूपपरमेश्वर का जीव-प्रदेश में अभाव होने से ईश्वर का सर्वान्तर्यामित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा।

समाधान—ऐसी शङ्का करना ठीक नहीं है। अभ्र (मेघ) नक्षत्र सहित आकाश का जल में प्रतिबिम्ब पड़ने पर बिम्बभूतमहाकाश का भी जल प्रदेश के साथ सम्बन्ध जैसे दीखता है वैसे ही परिच्छिन्नबिम्ब का प्रतिबिम्ब-प्रदेश के साथ सम्बन्ध न होने पर भी अपरिच्छिन्न ब्रह्मबिम्ब का प्रतिबिम्ब-देश के साथ सम्बन्ध हो सकने में कोई विरोध नहीं है।

विवरण—पूर्वपक्षी के कहने का आशय यह है—बिम्बचैतन्य को 'परमेश्वर' एवं प्रतिबिम्बचैतन्य को 'जीव' कहने पर बिम्ब का प्रतिबिम्ब के साथ जैसे साक्षात् सम्बन्ध नहीं वैसे ही ईश्वर का जीव के साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं हो सकेगा। तब ईश्वर का 'सर्वनियन्तृत्व' सिद्ध न होगा।

इस पर सिद्धान्ती का उत्तर यह है—हम अभ्रनक्षत्रों के सहित आकाश के उदाहरण से देखें। ऐसे आकाश का, जल में गिरे प्रतिबिम्ब के साथ सम्बन्ध न रहने पर भी


१. 'खेऽप्य'–इति पाठान्तरम्।
२. 'म्बप्रदेश'–इति पाठान्तरम्।

जीवेश्वरभेद[निरूपणम्] विषयपरिच्छेदः ३५९

बिम्बभूतमहाकाश के एक होने से, जिस जलादि-प्रदेश में उसका प्रतिबिम्ब गिरा है तदवच्छिन्न प्रदेश के साथ भी उसका सम्बन्ध रहता है। वैसे ही परिच्छिन्न-बिम्ब-स्वरूप परमेश्वर का, प्रतिबिम्बस्वरूप जीव के साथ सम्बन्ध न रहने पर भी अपरिच्छिन्न ब्रह्मबिम्ब का सबके साथ अर्थात् प्रतिबिम्ब जीव के साथ भी सम्बन्ध है ही। इस कारण ईश्वर के सर्वान्तर्यामित्व में कोई हानि नहीं हो पाती।

अब सिद्धान्ती उदाहरण में दिये दृष्टान्त पर दोष की आशंका कर उसका परिहार करते हैं—

'न च ²रूपहीनस्य ब्रह्मणो न प्रतिबिम्बसम्भवः, रूपवत एव तथात्वदर्शनादिति वाच्यम्। नीरूपस्यापि रूपस्य प्रतिबिम्ब दर्शनात्। न च नीरूपस्य द्रव्यस्य प्रतिबिम्बभावनियमः, आत्मने द्रव्यत्वाभावस्योक्तत्वात्।

'एक एव हि भूतात्मा भूते भूतेव्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥' (ब्र० बिं० उ० १२)

'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा॥

इत्यादिवाक्येन ब्रह्मप्रतिबिम्बाभावानुमानस्य³ बाधितत्वाच्च। तदेवं ⁴तत्पदार्थो निरूपितः।

**अर्थ—**ब्रह्म, रूपरहित है। और रूपहीन का प्रतिबिम्ब गिरना सम्भव नहीं, क्योंकि रूपवान् पदार्थ का प्रतिबिम्ब गिरता देखा जाता है—ऐसी शंका नहीं की जा सकती। क्योंकि रूप में अपना स्वयं का पृथक् रूप न रहने पर भी उसका प्रतिबिम्ब गिरता देखा जाता है। इसके अतिरिक्त 'रूपरहित' द्रव्य के प्रतिबिम्ब का अभाव रहता है' (प्रतिबिम्ब नहीं गिरता)—यह नियम भी नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि आत्मा में द्रव्यत्व का अभाव (आत्मा द्रव्य नहीं है) हम पहले ही बता चुके हैं। इसके


१. रूपवतः एवं प्रतिबिम्बः इति न नियमः, किन्तु रूपवद्द्रव्यस्यैव प्रतिबिम्बः इति नियमो वर्तते। ब्रह्म द्रव्यं सदपि न रूपवत्, तस्मात् तस्य प्रतिबिम्बो न युक्तः इतिशंकाकृदाशयः। २. 'नीरूपस्य'—इति पाठान्तरम्। ३. 'ब्रह्म न प्रतिबिम्बते अचाक्षुषत्वात् गन्धवत्' इति ब्रह्मप्रतिबिम्बाभावानुमानस्येत्यर्थः। ४. तत्त्वमसीतिवाक्यावयवस्य 'तत्' पदस्य शक्यार्थो लक्ष्यार्थश्चेत्यर्थः।

३६०वेदान्तपरिभाषा[ अवस्थात्रयनिरूपणम्

अतिरिक्त "( निरुपाधिक ) एकरूप आत्मा ( अन्तःकरणोपाधियों से ) जलस्थचन्द्र के समान अनेक प्रकार से दीखता है" "यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधै-कोऽनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा"—जिस प्रकार ज्योतिःस्वरूप सूर्य भिन्न विभिन्न जलों में अनेक प्रकार से दीखता है, यह अज आत्म-देव भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में ( अन्तःकरणों में ) उपाधियों से भिन्न होता है—इत्यादि श्रुतिवाक्यों से ब्रह्मप्रतिबिम्बाभावसाधक अनुमान, बाधित हो जाते हैं। इस प्रकार 'तत्' पदार्थ का निरूपण हुआ।

विवरण--'जीव' को चित्प्रतिबिम्ब मानने पर यह दोष आता है कि 'चित्' ( ब्रह्म ) यदि रूपरहित है तो उसका प्रतिबिम्ब कैसे ? क्योंकि रूपवान् पदार्थ का ही प्रतिबिम्ब देखने में आता है। इस पर सिद्धान्ती का यह उत्तर है कि 'रूप' गुण स्वयं रूपरहित है। क्योंकि 'रूप' पर 'रूप' नहीं रहता 'गुणे गुणानङ्गीकारात्।' तथापि रूप का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। तब नीरूप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब में कोई बाधा नहीं हो सकती। अथवा यदि पूर्वपक्षी यह व्याप्ति माने कि 'जो द्रव्य रूपवान् हो उसी का प्रतिबिम्ब होता है, तथापि हमें कोई हानि नहीं है। क्योंकि हम ( वेदान्ती ) 'आत्मा' को द्रव्य नहीं मानते। 'रूपरहित आकाश-द्रव्य का प्रतिबिम्ब नहीं होता'—यह मानने पर भी 'रूपरहित और अद्रव्य-ब्रह्म का रूपवत् प्रतिबिम्ब मानने में कोई आपत्ति नहीं है। ब्रह्म के प्रतिबिम्ब का अभाव सिद्ध करने के लिये प्रस्तुत किये सभी अनुमानों का श्रुतियों से बाध हो जाता है। इस रीति से 'तत्त्वमसि' महावाक्यस्थ 'तत्' पदार्थ का विवेचन किया गया है।

अब 'त्वम्' पदार्थ के विवेचनार्थ ग्रन्थकार जीवसम्बन्धी भिन्न-भिन्न वादों को बता रहे हैं।

इदानीं त्वं पदार्थो निरूप्यते। 'एकजीववादेऽविद्याप्रतिबिम्बो जीवः, अनेकजीववादे अन्तः-करणप्रतिबिम्बः।

अब 'त्वम्' पदार्थ का निरूपण किया जाता है ( 'त्वम्' पदार्थ ही जीव है ) 'एक-जीववादपक्ष' में अविद्या में पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब ही जीव है।

अनेकजीववादपक्ष में अन्तःकरण में पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब ही जीव है।

स च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिरूपावस्थात्रयवान्। तत्र जाग्रद्दशा


१. एकजीववादे जीवस्य स्वरूपम्—अविद्यायां चित्प्रतिबिम्बः, उपाधिभूताया अविद्याया एकत्वात् जीवस्य एकत्वम्। अनेकजीववादे तत्स्वरूपम्—अन्तःकरणे चित्प्रति-बिम्बः। जीवोपाधेः अन्तःकरणस्य नानात्वात् जीवस्यापि नानात्वम्।

जीवस्यावस्थात्रयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३६१

नामेन्द्रियजन्यज्ञानावस्था । अवस्थान्तरे इन्द्रियाभावान्नातिव्याप्तिः । इन्द्रियजन्यज्ञानं चान्तःकरणवृत्तिः । स्वरूपज्ञानस्यानादित्वात् ।

अर्थ— उस जीव की जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीन अवस्थाएँ होती हैं । ( जाग्रदवस्था की व्याख्या ) जाग्रत् दशा का अर्थ है कि जिसमें इन्द्रियों के द्वारा ज्ञान होता है—वह अवस्था । अन्य अवस्थाओं में इन्द्रियों के न होने से ( इन्द्रियव्यापार न होने से ) उसमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । इन्द्रियजन्य ज्ञान का अर्थ है अन्तःकरणवृत्ति । स्वरूपज्ञान अनादि होने से ( अन्तःकरणवृत्ति को ही ज्ञान कहना पड़ता ) है।

विवरण— जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति के भेद से जीव की तीन अवस्थाएँ होती हैं । उनमें से पहली अवस्था में इन्द्रियों के द्वारा बाह्यवस्तु का ज्ञान होता है । अन्य दो अवस्थाओं में इन्द्रियव्यापार न हो सकने से जाग्रदवस्था का यह लक्षण दो अवस्थाओं अतिव्याप्त नहीं होता । इन्द्रियजन्य ज्ञान का स्वरूप यह है—अन्तःकरणवृत्ति ( अन्तःकरण की तत्तत्पदार्थ के आकार के तुल्य होनेवाली स्थिति ) यहाँ पर अन्तःकरणवृत्त में 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग गौणतया किया है । अब यह यहाँ शंका हो सकती है कि जीव के ज्ञानस्वरूप में ही 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता ? उसके उत्तर में यह कहा जाता है कि चैतन्यरूप अनादि होने से अजन्य है, और इन्द्रियजन्यज्ञान तो उत्पत्तिविनाशशालि होता है । यदि स्वरूपज्ञान को ही इन्द्रियजन्यज्ञान कहा जाय तो वह अनादि अनन्त होने से जाग्रदवस्था में खण्ड ही न पड़ा होता । अतः यह सब अनुभवविरुद्ध होने से अन्तःकरणवृत्ति को ही इन्द्रियजन्यज्ञान कहा गया है ।

अब अन्तःकरणवृत्ति को क्यों माना गया है यह बताने के लिये तद्विषयक मतमतान्तरों का प्रस्ताव करते हैं—

'सा चान्तःकरणवृत्तिरावरणाभिभवार्थेत्येकं मतम् । तथा हि—

१. अन्तःकरणवृत्तिः किमर्थं स्वीक्रियते ? यतः सर्वेषां पदार्थानां साक्षिप्रकाशादेव प्रकाशः संभवति इति चेत्, भवतु कथमपि वृत्त्यङ्गीकारः, तस्या बहिर्निर्गमवादः असंगत एव । परोक्षस्थल इव विनावृत्तिनिर्गमं प्रकाशसंभवात् । यथा हि शब्दपरोक्षस्य आनुमानिकपरोक्षस्य च भेदःकरणभेदनिबन्धनः, एवं प्रत्यक्ष-परोक्षभेदोऽपि तन्निबन्धनः सेत्स्यत्येवेत्याशंकायामाह 'सा चेति' । शब्दानुमानावगतेभ्यः प्रत्यक्षावगते स्पष्टता अनुभूयते । सा च प्रत्यक्षग्राह्ये अभिव्यक्तचैतन्यावगुण्ठनम्, अन्यत्र परोक्षग्राह्ये न तत् इत्यत एव निर्वहणीया । चैतन्याभिव्यक्तिश्च चैतन्यावरणाभिभवमन्तरा न संभवति । स च आवरणाभिभवः ज्ञानाऽज्ञानयोरुभयोरपि समानाश्रयत्वमन्तरा न संभवतीति तत्सम्पादनार्थं वृत्तिनिर्गमः अपेक्ष्यते । सति हि तस्मिन् विषयान्तःकरणवृत्तीनामेकचैतन्यावच्छेदकत्वेन विषयचैतन्यं, प्रमातृचैतन्यं चैकं भवति, इति विषयाश्रितं ज्ञानं प्रमात्राश्रितमज्ञानं च

३६२वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः

१अविद्योपहितचैतन्यस्य जीवत्वपक्षे घटाद्यधिष्ठानचैतन्यस्य जीवरूपतया जीवस्य सर्वदा घटादिभानप्रसक्तौ २घटाद्यवच्छिन्नचैतन्यावरकमज्ञानं मूलाविद्यापरतन्त्रमवस्थापदवाच्यमभ्युपगन्तव्यम् । एवं सति घटादेर्न सर्वदा भानप्रसङ्गः, अनावृतचैतन्य३सम्बन्धस्यैव भानप्रयोजकत्वात् । तस्य चावरणस्य सदातनत्वे कदाचिदपि घटभानं न स्यादिति तद्भङ्गो वक्तव्ये, तद्भङ्गजनकं न चैतन्यमात्रम् । तद्भासकस्य तदनिवर्तकत्वात् नापि वृत्त्युपहितं चैतन्यम्, परोक्षस्थलेऽपि तन्निवृत्त्यापत्तेरिति परोक्षवृत्तिव्यावृत्तवृत्तिविशेषस्य, तदुपहित-चैतन्यस्य वाऽऽवरण-भङ्गजनकत्वमित्यावरणाभिभवार्था वृत्तिरित्युच्यते ।


समानाश्रयं भवति । अन्यथा भिन्नाश्रयत्वात् समानाश्रयत्वं कदापि प्रयोजकं न स्यात् । तथा च सति देवदत्तीयघटज्ञानात् यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्यापि निवृत्त्यापत्तिः । तथा च विना चैतन्याभिव्यञ्जनं स्पष्टतानिर्वाहो न भवतीति तदुपपत्त्यर्थं वृत्तिनिर्गमः अपेक्ष्यते एव । यत्तु सिद्धान्तलेशसंग्रहे अभेदाभिव्यञ्जनार्था वृत्तिः, चिदुपरागार्था वृत्तिः आवरणाभिभवार्था वृत्तिः इति त्रीणि मतानि वर्णितानि । तत्र चिदुपरागार्थत्वपक्षः मूले एव स्पष्टीभविष्यति । अभेदाभिव्यक्त्यर्थावृत्तिः इति न मतान्तरम् । यतः चिदुपरागार्थत्वपक्षस्यैव जीवपरिच्छिन्नत्वपक्षे अभेदाभिव्यक्त्यर्था वृत्तिः इति नामान्तरेण व्यपदेशः इति जीवस्य सर्वगतत्वे प्रथमः, तत्परिच्छिन्नत्वे सति द्वितीयः इति ।

१. ननु घटादिस्पष्टताप्रतीतिनिर्वाहार्थमावरणाभिभवार्था वृत्तिः इति न युक्तम् । तथाहि—आवरणाभिभवो नाम अज्ञाननिवृत्तिः । सा च घटे, घटावच्छिन्नचैतन्ये वा अज्ञानस्य सत्त्वे एव संभवति, नान्यथा । तत्र घटस्य जडस्य अज्ञानाश्रयत्वं न संभवति । तदवच्छिन्नचैतन्यमपि न अज्ञानाश्रयः, "आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्विभागचितिरेव केवला" इति निर्विशेषचैतन्यस्यैव तदाश्रयत्वात् । यदि तु अज्ञानस्य ब्रह्म विषयः, जीवस्तु आश्रयः, अहमज्ञः इत्याद्यनुभवात् । एवं च अविद्योपहितचैतन्यस्यैव जीवत्वमितिपक्षे जीवस्यैव घटादिविवर्तकारणत्वेन घटावच्छिन्नचैतन्यस्यैव जीवरूपतया जीवस्येव घटादीनामपि अज्ञानाश्रयत्वं संभवति इत्युच्यते, तर्हि साधु समर्थितं वृत्तिनिर्गमनस्य प्रयोजनम् । यतो हि उक्तपक्षे विनापि वृत्तिनिर्गमं घटं जानामि इति प्रत्ययो भवतीति सर्वदा घटादिभानप्रसंगः इति शंकाकतुंराशयः—अविद्योपहितेत्यादिना—प्रसक्तावित्यन्तेन ग्रन्थेन प्रकटितः ।

२. जीवकारणतापक्षे अभेदस्य स्वतः सिद्धत्वात् चिदुपरागो नापेक्षितः इति तस्मिन्नेव पक्षे केवलावरणाभिभवार्थवृत्तिरिति फलितम् ।

३. 'न्यस्यैवभान'-इति पाठान्तरम् ।

अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६३

अर्थ— यह अन्तःकरणवृत्ति (विषयगत) आवरण दूर करने के लिये है—ऐसा एक मत है। इस मत में घटादि-अधिष्ठान में विद्यमान चैतन्य भी जीवगतचैतन्य होने से जीव को सदैव घटादिज्ञान होने का प्रसंग आवेगा। अतः घटादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य को आवृत्त करनेवाला एक अज्ञान, जो मूलाविद्यापर अवलम्बित रहता है जो अवस्था शब्द से कहा जाता है, मानना पड़ता है। जिससे घटादिकों की सदैव उपलब्धि होने का प्रसंग नहीं प्राप्त होगा। क्योंकि अनावृत-चैतन्य का सम्बन्ध ही ज्ञान के होने में प्रयोजक हेतु होगा। अब इस आवरण को नित्य माने तो घटादिकों की उपलब्धि कभी नहीं होगी। एतदर्थ उसका भंग कहना होगा। किन्तु केवल चैतन्य को उसका भञ्जक नहीं कहा जा सकेगा। क्योंकि जो चैतन्य उस आवरण का भासक है उसी से उसकी निवृत्ति नहीं होगी। क्योंकि परोक्षस्थल में भी (उस आवरण की) निवृत्ति होने लगेगी। इसलिये परोक्षवृत्ति से पृथक् जो विशेषवृत्ति, या तदुपहित चैतन्य ही आवरणभंग करनेवाला है। अतः वृत्ति को आवरण-नाशक कहा गया है।

विवरण— आत्मा का स्वरूपभूतज्ञान नित्य सिद्ध है और उसी से यदि समस्त विषयों का ज्ञान (प्रकाशित होना) सम्भव है तो अन्तःकरण की वृत्ति को मानने की क्या आवश्यकता है? इस शंका के निवारणार्थ सिद्धान्ती उसका प्रयोजन बताता है। इस प्रयोजन के विषय में दो मत हैं। उनमें प्रथम मत 'सा चान्तःकरणवृत्तिः' इत्यादि वाक्यों से बताया गया है। उसका आशय यह है—किसी वस्तु का आवरण, अविद्या-शक्तिविशेषकृत होता है, जैसे घटज्ञान होने से पूर्व वह घट अज्ञात-अज्ञानावृत रहता है। इस आवरण के कारण घट भासमान नहीं होता। इस आवरण का भंग (नाश) करना ही अन्तःकरणवृत्ति का प्रयोजन है। सिद्धान्ती इसी को अधिक स्पष्ट करता है—अविद्योपहितचैतन्य को जीव मानने के पक्ष में—घटादिकों में विद्यमान चैतन्य और जीवगत चैतन्य दोनों के एक ही होने से जीव को घट का भान (ज्ञान) सदैव होता रहेगा, परन्तु वह न तो इष्ट है और न अनुभवसिद्ध ही है। इसलिये घट और जीवगत-चैतन्य दोनों के बीच में अपवारक पदार्थ मानना होगा, वही आवरक अज्ञान है, अर्थात् इस अज्ञान का मूलाविद्या पर अवलम्बित होना भी मानना होगा जिससे घटादिकों की सदैव उपलब्धि नहीं हो सकेगी। यह आवरक अज्ञान यदि सदैव बना रहा तो घटादिकों की कभी उपलब्धि ही न होगी। एतदर्थ उसके भंग करनेवाले (विनाशक) पदार्थ की आवश्यकता होती है। उससे जिन घटादिकों के आवरक अज्ञान का भंग हुआ होगा उन घटादिकों की ही उपलब्धि होगी, अन्य की नहीं। वह पदार्थ केवल चैतन्य तो हो नहीं सकता। क्योंकि वह चैतन्य यदि अज्ञान का भासक हो तो उसी से उसकी निवृत्ति न हो सकेगी। वैसे ही केवल (अविशेषित) वृत्त्युपहित चैतन्य से भी उसका नाश न हो सकेगा। क्योंकि परोक्षस्थल में भी (घटादिकों के स्मरण अथवा अनुमिति के समय) वृत्त्युपहित चैतन्य से आवरक अज्ञान की निवृत्ति होने लगेगी। इसलिये परोक्षव्यावृत्त

३६४ वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः

(स्मरण आदि से भिन्न) वृत्तिविशेष अथवा उस उपाधि से युक्त चैतन्य ही आवरण का भङ्ग करता है—यह मानना पड़ता है। यह मानने पर अन्तःकरणवृत्ति का प्रयोजन अज्ञानावरणभङ्ग है, यह सिद्ध होता है।

अब वृत्ति के प्रयोजन के विषय में दूसरा मत बताते हैं—

'सम्बन्धार्था वृत्तिरित्यपरं मतम्। तत्राप्यविद्योपाधिकोऽपरिच्छिन्नो जीवः। २स च घटादिप्रदेशे विद्यमानोऽपि घटाद्याकारापरोक्षवृत्तिविरहदशायां न घटादिकमवभासयति, घटादिना३ तस्य सम्बन्धाभावात्। तत्तदाकारवृत्तिदशायां तु भासयति, तदा सम्बन्धसत्त्वात्।

अर्थ—(चैतन्य) सम्बन्ध के लिये वृत्ति होती है—ऐसा दूसरा मत है। इस मत में अविद्यारूप उपाधि से युक्त जीव अपरिच्छिन्न होता है। वह (अपरिच्छिन्नस्वरूप होने से) घटादिप्रदेश में विद्यमान रहने पर भी जिस समय घटादिकों के आकार के अनुसार अपरोक्ष वृत्तिका अभाव रहता है (जिस समय घट का प्रत्यक्षात्मकज्ञान नहीं हो रहा है) उस समय घटादिकों का भासन (ज्ञान) नहीं करता है। क्योंकि घटादिकों का और उसका सम्बन्ध नहीं है। जिस समय वृत्ति तदाकार होती है, उस समय घटादिकों का भासन करता है। क्योंकि उस समय (वृत्ति का चैतन्य के साथ) सम्बन्ध रहता है।

विवरण—जीव-चैतन्य के अपरिच्छिन्न होने से उसका और विषय का सम्बन्ध तो नित्य ही रहता है, तब समस्त विषयों की उपस्थिति (ज्ञान) जीव को सदैव होती रहेगी। परन्तु ऐसा किसी को अनुभव तो है नहीं। अतः जीवगत चैतन्य और विषय दोनों के सम्बन्ध को अपने द्वारा संपादन कराने के लिये अन्तःकरणवृत्ति की आवश्यकता है। यदि घटाकार अपरोक्षवृत्ति न हो तो घट ज्ञान नहीं होगा और घटाकार वृत्ति के होने पर (वृत्ति का) चैतन्य के साथ सम्बन्ध हो जाने से घटज्ञान होने लगता है।


१. सम्बन्धार्था चिदुपरागार्था इति मतान्तरम्। सम्बन्धः विषयेण सह चैतन्यस्य संसर्गः अर्थः प्रयोजनं यस्याः सा इति। अर्थात् जीवस्य विषयोपरागजनिका। एवं च न केवलमन्तःकरणप्रतिबिम्बितस्य जीवस्य विषयोपरागार्था वृत्तिः किन्तु अविद्याप्रतिबिम्बितस्य जीवस्यापीति।

२. स च अविद्योपाधिकः अपरिच्छिन्नो जीवश्च। एवं च सर्वगतत्वनिबन्धनों योऽयं जीवस्य घटादिविषयेण सम्बन्धः, स न घटादिविषयभानप्रयोजकः अपितु तद्विलक्षणः। स च वृत्त्यधीनः, इति वृत्तिविरहदशायां तत्सम्बन्धाभावात् न जीवस्य घटादिभानम्।

३. 'नासम्बन्धा'—इति पाठान्तरम्।

अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६५

इस मत पर शंका और उसका निरसन—

नन्वविद्योपाधिकस्यापरिच्छिन्नस्य जीवस्य स्वत एव समस्तवस्तु-सम्बद्धस्य वृत्तिविरहदशायां सम्बन्धाभावाभिधानमसङ्गतम् । असङ्गत्वदृष्ट्या च सम्बन्धाभावाभिधाने वृत्त्यनन्तरमपि सम्बन्धो न स्यादिति चेत् । उच्यते । न हि वृत्तिविरहदशायां जीवस्य घटादिना सह सम्बन्धसामान्यं निषेधामः, किं तर्हि, घटादिभानप्रयोजकं ^१सम्बन्धविशेषम् । स च सम्बन्धविशेषो विषयस्य जीवचैतन्यस्य च व्यङ्ग्यव्यञ्जक^२तालक्षणः कादाचित्कः^३ तत्तदाकारवृत्तिनिबन्धनः ।

**अर्थ—शंका—**अविद्योपाधिक अपरिच्छिन्नचैतन्यस्वरूपजीव का समस्त-वस्तुओं के साथ सम्बन्ध स्वतःसिद्ध ही है तब वृत्ति के अभाव में उसके साथ सम्बन्ध के न होने का कथन उचित नहीं है । ( आत्मा असंग है ) इस श्रुति के आधार पर सम्बन्ध का अभाव कहें तो वृत्ति के होने पर भी ( विषयों से ) सम्बन्ध न होगा, क्योंकि आत्मा का असङ्गत्व तो सदैव है ।

**समाधान—**वृत्ति के अभाव में जीव का घटादि विषयों के साथ साधारण सम्बन्ध का हम निषेध नहीं कर रहे हैं, किन्तु घटादिकों के ज्ञान होने में तत्प्रयोजक विशेष सम्बन्ध का हम निषेध कर रहे हैं । यह सम्बन्धविशेष व्यङ्ग्य ( अभिव्यक्त होनेवाला ) जीवचैतन्य और व्यञ्जक ( अभिव्यक्त करनेवाला ) विषय, दोनों का है, और वह तावत्कालिक एवं तत्तदाकारघटादिवृत्ति पर निर्भर होता है ।

**विवरण—**जीव को घटज्ञान होने के लिये घट और जीवचैतन्य का सम्बन्ध अपेक्षित है, तदर्थ वृत्ति की आवश्यकता होती है । यह एक मत है । इस पर पूर्वपक्षी पूछता है कि जीवचैतन्य यदि सर्वगत ( परिच्छेद रहित ) है तो सम्बन्धाभाव कैसे होगा ? इस पर कदाचित् आप ( असङ्गो नहि सज्जते ) श्रुति को देखकर उसका किसी से भी सम्बन्ध नहीं होता, तब तो घटाकार-वृत्ति के उत्पन्न होने पर भी जीवचैतन्य का ओर घट का सम्बन्ध न होगा, क्योंकि चैतन्य सदैव असङ्ग ही रहता है ।

इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है कि जीवचैतन्य और घट के सामान्य सम्बन्ध को हम मना नहीं कर रहे हैं, किन्तु घटज्ञान के लिये अपेक्षित व्यङ्ग्यव्यञ्जकताभावलक्षण


१. सम्बन्धविशेषम् प्रकाशकविषयचैतन्याभिन्नप्रमातृचैतन्यवत्त्वम् । अविद्यावच्छिन्नचैतन्यं यथा व्यापकं, न तथा प्रमातृचैतन्यमिति न दोषः ।
२. 'कभावलक्षणः'–इति पाठान्तरम् ।
३. 'कस्तदाकार'–इति पाठान्तरम् ।

३६६ | वेदान्तपरिभाषा | [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः

तावत्कालिक सम्बन्ध सदैव नहीं होता। वह तो घटाकार वृत्ति उत्पन्न होते ही अस्तित्व में आता है और जीव को घट का ज्ञान होता है। (घटाकारवृत्ति के समय तदुपहित-जीवचैतन्य व्यङ्ग्य, और तद्विषय घटादि, व्यञ्जक होता है।)

ग्रन्थकार इसी मत को और अधिक स्पष्ट कर दिखाते हैं।

तथा हि तैजसमन्तःकरणं स्वच्छद्रव्यत्वात् स्वत एव जीवचैतन्याभिव्यञ्जनसमर्थम्, घटादिकं तु न तथा, अस्वच्छद्रव्यत्वात्। स्वाकारवृत्तिसंयोगदशायां तु वृत्त्यभिभूत-जाड्यधर्मकतया च वृत्त्युत्पादितचैतन्याभिव्यञ्जनयोग्यत्वाश्रयतया च वृत्त्युत्थानानन्तरं¹ चैतन्यमभिव्यनक्ति।

**अर्थ—**तैजस अन्तःकरण, एक निर्मल द्रव्य होने से, वह स्वयं ही जीवचैतन्य को प्रकाशित करने में समर्थ रहता है, किन्तु घटादिक (जड़ होने से) वैसे (समर्थ) नहीं होते, क्योंकि वे अस्वच्छ द्रव्य हैं, तथापि घटाद्याकारवृत्ति का संयोग जब घटादिकों से होता है उस समय तद्गत जड़त्व का वृत्ति से निरास होता है और वृत्ति से उत्पन्न होने वाली चैतन्याभिव्यञ्जन की योग्यता, घटादिकों में रहती है। अतः वृत्ति का उदय होने पर घटादि विषय चैतन्य को अभिव्यक्त करते हैं।

**विवरण—**अन्तःकरण के स्वच्छ द्रव्य होने से वह, जीव-चैतन्य को अनायास ही प्रकाशित करता है, किन्तु घटादिक जड़ हैं, इस कारण वे वैसा नहीं कर सकते। घटाकारवृत्ति का घट के साथ संयोग होने पर वृत्ति के द्वारा पहले तो घटादि में विद्यमान जाड्य का अभिभव (नाश) होता है, और घट में 'चैतन्य' प्रकाशित करने की योग्यता आती है। इस रीति से योग्यता के आने पर घटादिक, जीव-चैतन्य को प्रकाशित करते हैं और जीव को घटज्ञान होता है।

इस मत में अभियुक्तों की सम्मति बताते हैं—

तदुक्तं विवरणे—²'अन्तःकरणं हि स्वस्मिन्निव स्वसंसर्गिण्यपि घटादौ चैतन्याभिव्यक्तियोग्यतामापादयतीति। दृष्टं चास्वच्छद्रव्य-


१. 'त्युदयानन्तरं-इति पाठान्तरम्।
२. ननु चैतन्यं केवलघटाद्युपहितं न भासते, वृत्त्युपहितघटाद्युपहितं तु भासते, इत्यत्र किं विनिगमकमिति चेत् तत्रोच्यते—अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यं हि, विनापि वृत्ति सर्वदा भासते अतएव अन्तःकरणं प्रतिभासिकमिति सिद्धान्तः। तथा च जल इव जलोपहितघटादावपि रखेः प्रतिफलनमिव अन्तःकरणे तदुपहितघटादौ च चैतन्यप्रतिफलनमुचितमेवेत्याशयः।

अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६७

स्यापि स्वच्छद्रव्य-सम्बन्धदशायां प्रतिबिम्बग्राहित्वम्। यथा कुड्यादेर्जलादिसंयोगदशायां मुखादिप्रतिबिम्बग्राहिता। घटादेरभिव्यञ्जकत्वं च तत्प्रतिबिम्बग्राहित्वम्। चैतन्याभिव्यक्तत्वं च तत्र प्रतिबिम्बितत्वम्।

अर्थ—'विवरण' नामक ग्रन्थ में ऐसा बताया है—'जिस प्रकार अन्तःकरण स्वयं में चैतन्य की अभिव्यक्ति की योग्यता को पैदा करता है, वैसे ही स्वयं से सम्बद्ध होनेवाले घटादिकों में भी वैसी ही योग्यता को उत्पन्न करता है।' और अस्वच्छ द्रव्य, स्वच्छ द्रव्यों के साथ संयोग को प्राप्त होने पर उनका प्रतिबिम्बग्राहक होना सर्वानुभवसिद्ध है। जैसे—भीत आदि का जल आदि से संयोग होने पर उनमें मुख आदि के प्रतिबिम्बग्रहण करने की योग्यता आती है। चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करना ही घटादिकों का अभिव्यञ्जकत्व है। और घट में प्रतिबिम्बित होना ही चैतन्य का अभिव्यक्तत्व है।

**विवरण—**इस मत की पुष्टि में ग्रंथकार ने 'विवरण' कर्ता के वाक्य को उद्धृत किया है। जिस प्रकार अन्तःकरण में चैतन्याभिव्यंजकत्व होता है वैसे ही वह घटादिकों में भी होता है।' लौकिक अनुभव भी इसी प्रकार है—भीत साक्षात् प्रतिबिम्बग्राहिणी नहीं होती, किन्तु उस पर जल के पड़ने पर प्रतिबिम्बग्राहिणी बन जाती है।

घटादिकों की चैतन्याभिव्यञ्जक बताया है, इसका अर्थ यह है कि वे चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करते हैं।

एवंविधाभिव्यञ्जकत्व-सिद्धयर्थमेव वृत्तेरपरोक्षस्थले बहिर्निर्गमनाङ्गीकारः। 'परोक्षस्थले तु वह्नयादेर्वृत्ति²संसर्गाभावेन चैतन्यानभिव्यञ्जकतया न³ वह्नयादेरपरोक्षत्वम्। एतन्मते⁴ च विषयाणामपरोक्षत्वं चैतन्याभिव्यञ्जकत्वमिति द्रष्टव्यम्। एवं जीवस्याऽपरिच्छिन्नत्वेऽपि वृत्तेः सम्बन्धार्थत्वं निरूपितम्।

**अर्थ—**ऐसे अभिव्यंजक की सिद्धि के लिए ही अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) स्थल में वृत्ति का बाहर जाना ( इस मत में ) माना गया है। परोक्ष स्थल में ( अप्रत्यक्ष स्थल में ) वृत्ति के सम्बन्ध का अभाव होने से वहां चैतन्याभिव्यक्ति नहीं होती, और उसके न होने


१. एतन्मते—अविद्योपहितचैतन्यस्य जीवत्वं वृत्तेश्चिदुपरार्थत्वं चेतिपक्षे। यत्तु प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वं विषयप्रत्यक्षत्वप्रयोजकमिति प्रागुक्तं, तत् घटावच्छिन्नादिचैतन्याभिप्रायमिति न विरोधः।
२. 'त्तिसंयोगाभावेन'—इति पाठान्तरम्।
३. 'नापरोक्षत्वम्'—इति पाठान्तरम्।
४. 'ते विष'—इति पाठान्तरम्।

३६८ वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः

से वह्नि आदि का अपरोक्षत्व ( प्रत्यक्ष ) नहीं होता। इस मत में चैतन्याभिव्यञ्जकत्व ही विषय का प्रत्यक्ष है। इस प्रकार जीव को अपरिच्छिन्न मानने पर भी वृत्ति का सम्बन्धार्थ होना बताया गया।

विवरण—प्रत्यक्षज्ञान के समय घटादिकों से सम्बद्ध होने के लिये वृत्ति, बाहर जाती है और तत्स्थ ( विषयगत ) जाड्य का नाश कर घटादिकों में चैतन्याभिव्यक्ति करने का सामर्थ्य पैदा कर देती है। इस रीति से घटादिक जब चैतन्य-प्रतिबिम्ब को ग्रहण करते हैं तब प्रमाता को घटादिकों का प्रत्यक्ष होता है। इस मत के अनुसार यह प्रत्यक्ष की प्रक्रिया है। अन्यत्र वृत्ति का बाहर निकलना यदि नहीं होता तो अर्थात् ही उसका किसी विषय के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तस्मात् उसका प्रत्यक्ष नहीं होता। पीछे अपरोक्षत्व की ( प्रत्यक्ष की ) व्याख्या—"विषयस्य प्रमातृ-चैतन्याऽभिन्नत्वम्" की थी। वह इस मत में ठीक नहीं बैठती। अतः इस मत के अनुसार घटादिकों में चैतन्य-प्रतिबिम्बित-ग्राहित्व होना ही विषयों का प्रत्यक्ष है,—यह बताया गया है।

इस प्रकार अपरिच्छिन्न-जीव पक्ष में वृत्ति, सम्बन्धार्थ कैसे होती है, बताया गया। अब वही परिच्छिन्न-जीव-पक्ष में कैसी होती है, बताते हैं।

¹इदानीं परिच्छिन्नत्वपक्षे सम्बन्धार्थ²क्त्वं निरूप्यते। तथा हि—अन्तःकरणोपाधिको जीवः। तस्य न³ घटाद्युपादानता, घटादिदेशासम्बन्धात्। किन्तु ब्रह्मैव घटाद्युपादानम्। तस्य मायोपहितस्य चैतन्यस्य सकलघटाद्यन्वयित्वात्। अत एव ब्रह्मणः सर्वज्ञता। तथा च जीवस्य घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदमन्तरेण घटाद्यवभासासम्भवे प्राप्ते, तदवभासाय घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदसिद्धयर्थं घटाद्याकारा वृत्तिरिष्यते।

अर्थ—अब परिच्छिन्न जीवपक्ष में ( वृत्ति के ) सम्बन्ध की अपेक्षा को बताते हैं। वह इस प्रकार है—( इस मत में ) जीव, अन्तःकरणोपाधिक है। ( अन्तःकरण के परिच्छिन्न-होने से जीव-चैतन्य भी परिच्छिन्न है ) वह घटादिकों का उपादान नहीं है, क्योंकि उसका घटादिकों के प्रदेश के साथ सम्बन्ध नहीं है अतः ब्रह्म ही घटादिकों का उपादान है। वह मायोपाधिक होकर समस्त घटादिकों के साथ अन्वित होता है ( उनमें


१. यदा अपरिच्छिन्नत्वपक्षेऽपि जीवस्य चिदुपरागार्थमस्ति वृत्तेरपेक्षा, तदा किमु वक्तव्यं जीवपरिच्छेदपक्षे इत्याभिप्रायः। २. 'र्थत्वं नि०'—इति पाठान्तरम्। ३. 'स्य च घटाद्यनुपादानता'—इति पाठान्तरम्।

अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६९

अनुगत है )—इसी कारण ब्रह्म सर्वज्ञ कहा जाता है इस रीति से घटादिकों के अधि- ष्ठानभूत ब्रह्मचैतन्य का और जीव का अभेद हुए बिना घटादिकों के अवभास का असम्भव प्राप्त होने पर उस अवभास के लिए घटादिकों के अधिष्ठानभूत ब्रह्मचैतन्य के अभेद सिद्धयर्थं घटाकार वृत्ति को मानना पड़ता है ।

विवरण—जीव की अन्तःकरण रूप उपाधि के परिच्छिन्न होने से जीव-चैतन्य भी परिच्छिन्न ही है । इस कारण बाह्य विषयों के अधिष्ठानभूत चैतन्य का और उसका अभेद होना सम्भव नहीं और अभेद हुए बिना बाह्य विषयों का प्रत्यक्ष नहीं होगा । तस्मात् जीवचैतन्य और विषयाऽधिष्ठानचैतन्य का अभेद सिद्ध होने के लिए घटाद्याकार- वृत्ति माननी चाहिये । यह इस मत का आशय है ।

इस पर एक शंका और उसका निरसन—

ननु वृत्त्यापि कथं प्रमातृ¹चैतन्यविषयचैतन्ययोरभेदः सम्पाद्यते, घटान्तःकरणरूपोपाधिभेदेन तदवच्छिन्नचैतन्ययोरभेदासम्भवादिति चेत् । न । वृत्तेर्बहिर्देश-निर्गमनांगीकारेण वृत्त्यन्तःकरणविषयाणामेक- देशस्थत्वेन² तदुपधेयभेदाभावस्योक्तत्वात् । एवमपरोक्षस्थले³वृत्तेर्मत- भेदेन विनियोग उपपादितः ।

**अर्थ—**वृत्ति के द्वारा भी प्रमातृचैतन्य और विषयचैतन्य दोनों में अभेद कैसे सम्भव होता है ? घट और अन्तःकरण इन दोनों उपाधियों के भिन्न होने से तद- वच्छिन्न चैतन्य का अभेद होना असम्भव है—परन्तु यह शंका ठीक नहीं है । क्योंकि 'वृत्ति बाहर जाती है' इस पक्ष का स्वीकार करने के कारण वृत्ति, अतःकरण और विषय—ये सब एक देशस्थ होते हैं—और ( उपाधियों के एक देशस्थ होने पर ) उनके उपधेयों ( तदवच्छिन्न चैतन्य ) का अभेद होता है—यह पहले ही बता चुके हैं । इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान के समय भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार वृत्ति का क्या उपयोग है—यह बताया ।

**विवरण—**ऊपर कहे हुए के अनुसार घट के अवभास के लिए घटाकर वृत्ति के मानने पर भी जीवचैतन्य और घटावच्छिन्न चैतन्य दोनों में अभेद कैसे होगा—यह पूर्वपक्षी पूछ रहा है । परन्तु पहले बताई हुई प्रत्यक्ष प्रक्रिया को पूर्वपक्षी भूल गया है, अतः उसी की स्मृति पुनः सिद्धान्ती करा रहा है । इस रीति से प्रत्यक्ष ज्ञान के समय


१. 'तृविषयचैत'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'नोपधेय'-इति पाठान्तरम् ।
३. ले मतभेदेन वृत्तेवि०'-इति पाठान्तरम् ।
२४ वे० प०

३७० वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः

वृत्ति का उपयोग; परिच्छिन्न अपरिच्छिन्न जीव पक्षों में स्पष्ट किया गया और यहीं पर जाग्रद् दशा का भी विवेचन समाप्त हुआ ।

अब स्वप्नावस्था का प्रारम्भ करते हैं—

'इन्द्रियाजन्यविषयगोचरापरोक्षान्तःकरणवृत्त्यवस्था स्वप्नावस्था । जाग्रदवस्थाव्यावृत्त्यर्थम् इन्द्रियाजन्येति । अविद्यावृत्तिमत्यां सुषुप्तौ अतिव्याप्तिवारणायान्तःकरणेति ।

**अर्थ—**इन्द्रियों से अजन्य एवं विषयगोचर, अपरोक्ष अन्तःकरण-वृत्ति को स्वप्नावस्था कहते हैं । लक्षण में 'इन्द्रियाजन्य' पद जाग्रदवस्था की व्यावृत्ति करने के लिए है । अविद्यावृत्तिवाली सुषुप्ति अवस्था में अतिव्याप्ति न हो, इसलिये 'अन्तःकरण' पद दिया है ।

**विवरण—**जिस अवस्था में इन्द्रियों के व्यापार उपरत होते हैं—ऐसा जो प्रातिभासिक विषयगोचर ( कल्पित-गजाद्यधिष्ठानाकार ) अपरोक्ष अन्तःकरणावस्था विशेष—यही स्वप्नावस्था है । जाग्रदवस्था में अन्तःकरणवृत्ति इन्द्रियों के व्यापार पर निर्भर रहती है । अतः 'इन्द्रियाजन्य' पद से जाग्रदवस्था की व्यावृत्ति होती है । 'सुषुप्ति' यह केवल अविद्यावृत्ति होने से और इसमें अन्तःकरण का व्यापार न होने से अन्तःकरण-वृत्ति' पद से सुषुप्ति की व्यावृत्ति हो जाती है ।

अब सुषुप्ति का लक्षण बताते हैं—

२सुषुप्तिर्नामाविद्यागोचराऽविद्यावृत्त्यवस्था । जाग्रत्स्वप्नयोरविद्याकारवृत्तेरन्तःकरण-वृत्तित्वान्न तत्रातिव्याप्तिः ।

**अर्थ—**अविद्याविषयक अविद्या की वृत्ति की सुषुप्ति-अवस्था कहते हैं । जाग्रदवस्था और स्वप्नावस्था में जो अविद्याकारवृत्ति होती है, वह अन्तःकरण की वृत्ति है ( अविद्या की नहीं ) अतः इस लक्षण की उन दो अवस्थाओं में अतिव्याप्ति नहीं होती ।

**विवरण—**सुषुप्ति अवस्था में अविद्यावृत्ति का अविद्या ( अज्ञान ) ही विषय है; स्वप्न में और जाग्रदवस्था में 'मुझे घट ज्ञान नहीं हो रहा है' यह वृत्ति, अविद्याविषयक होने पर भी वह अन्तःकरणवृत्ति है, अविद्या की नहीं है । इस कारण सुषुप्ति का लक्षण, इन दो अवस्थाओं में अतिव्याप्त नहीं होता ।


१. इन्द्रियाऽजन्या इन्द्रियव्यापारोपरमकालीना, विषयगोचरा अधिष्ठानाकारा, अपरोक्षान्तःकरणवृत्तिः । नित्याऽपरोक्षान्तःकरणावस्थाविशेषः स्वप्नावस्थेत्यर्थः ।
२. अविद्याविषयीणी अविद्यावृत्तिः आविद्यकवृत्तिःसुषुप्तिरित्यर्थः । एवं च जाग्रदाद्यवस्थात्रयान्यतमत्वं जीवस्य तटस्थलक्षणम् ।

जीवस्वरूपम् ] विषयपरिच्छेदः ३७१

मरण और मूर्च्छा अवस्थाओं का विवेचन—

अत्र¹ केचिन्मरणमूर्च्छयोरवस्थान्तरत्वमाहुः । अपरे² तु सुषुप्तावेव तयोरन्तर्भावमाहुः । तत्र तयोरवस्थात्रयान्तर्भाव-बहिर्भावयोस्तत्त्वं पदार्थनिरूपणे उपयोगाभावान्न तत्र प्रयतते ।

**अर्थ—**इस सम्बन्ध में कुछ लोग—मरण और मूर्च्छा, इन दो अवस्थाओं को पृथक् ही मानते हैं । और कुछ लोग इन दोनों का सुषुप्ति में अन्तर्भाव मानते हैं । ( हमारे मत से ) हम विषय में इन दो अवस्थाओं का तीनों में अन्तर्भाव करना अथवा बहिर्भाव करना आदि के विचार का 'त्वं' पदार्थ निरूपण में उपयोग न होने से उस विषय में हम प्रयत्न नहीं करते । अब जीव के सम्बन्ध में प्रारम्भ किया हुआ विवेचन आगे चलाते हैं ।

³तस्य च मायोपाध्यपेक्षयैकत्वम् , अन्तःकरणोपाध्यपेक्षया च नानात्वं व्यवह्रियते । एतेन जीवस्याणुत्वं प्रत्युक्तम् । 'बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव ह्याराग्रमात्रो ह्यवरोपि दृष्टः ( श्वे० ५–८ ) इत्यादौ जीवस्य बुद्धिशब्दवाच्यान्तःकरणपरिमाणोपाधिकस्यपरमाणुत्वश्रवणात् ।


१. जीवावस्थासु मध्ये केचित् शंकरानुयायिनः प्रयोजनभेदात् निमित्तभेदात् लक्षणभेदाच्च मरण-मूर्छयोः अवस्थात्रयानन्तर्भावात् अवस्थान्तरत्वमित्याहुः ।
२. स्वाभिमतमत्र निरूपयति अपरेत्विति । 'रे सुषुप्तावेव'—इति पाठान्तरम् ।
३. जीवो हि ब्रह्माभिन्नः स्वतः एको व्यापकश्चेति वदतामद्वैतिनामपि जाग्रदाद्यवस्थाविशिष्टो न विभुरिति सम्मतम् । तस्य ब्रह्माभेदाद्यभावात्, परिच्छित्त्वाच्च कथं जीवस्य न अणुत्वम् ? किन्तु तत्र विचारणीयं यत् परिच्छिन्नत्वांगीकारमात्रेण अणुत्वं जीवस्य कथं सम्भवति । न हि परिच्छिन्नं सर्वमणुपरिमाणं दृष्टम्, शतशो व्यभिचारात् । अतो मध्यमपरिमाणत्वं वा उत अणुपरिमाणत्वं वेति संशये स्वतो व्यापकस्य जीवस्य औपाधिकमेव परिमाणं यतोऽङ्गीकर्तव्यं ततो ज्ञायते मध्यमपरिमाणान्तःकरणोपाधिकत्वादेव जीवो मध्यमपरिमाण एव, न स्वतः, न वाणुपरिमाण इति । तेन 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषः' इति श्रुतिरूपपद्यते । आराग्रमात्र इति पदमपि 'बुद्धेर्गुणेने'ति रामभिव्याहारानुपपत्त्या अन्तःकरणपरिमाणबोधकमेव, सर्वथा परमाणुपरिमाणत्वरूपमणुत्वं जीवस्य न सम्भवतीतिसिद्धम् । तेन 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश'ति श्रुतिरपि व्याख्याता, तस्या अपि चेतसा अन्तःकरणेन अणुरिति योजनया उपाधिपरिमाणसमपरिमाणत्वबोधने एवं तात्पर्यम् ।

३७२ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीवस्वरूपम् ]


**अर्थ—**उस जीव को मायोपाधिक मानने पर एक और अन्तःकरणोपाधिक मानने पर (अन्तःकरण के नाना होने से) अनेक—ऐसा व्यवहार होता है। (इसी की अनुक्रम से एक जीववाद और अनेक जीववाद—संज्ञायें हैं) इस प्रकार (जीव को विभु बताने से) जीव के अणुत्व का खण्डन हुआ। 'स्वयं के गुण से (अपरिच्छिन्नत्व धर्म से) अवर (जिससे वर = महान् कोई नहीं) आत्मा, बुद्धि के गुणों से (अन्तःकरण के सूक्ष्मत्व धर्म से) आरे (नेमि) के अग्र के समान दीखता है' इत्यादि श्रुति में जीव, बुद्धिशब्दवाच्य अन्तःकरणपरिमाणोपाधि के कारण परमाणु बताया गया है।

**विवरण—**जीव परिमाण के सम्बन्ध में तीन वाद हो सकते हैं, एक—अणुपरिमाणवाद, दूसरा—मध्यम परिमाणवाद, और तीसरा—विभुपरिमाणवाद। सिद्धान्ती के मत में जीव, विभुपरिमाण है। अन्यत्र श्रुति में कहीं-कहीं जीव को अणुपरिमाण भी बताया है। जैसे—'वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥' इस श्रुति में जीव को अतीव सूक्ष्म प्रमाण बताया है किन्तु सिद्धान्ती के मत से यह परिमाण जीव की उपाधिरूप बुद्धि के परिमाण की दृष्टि से बताया गया है।

स च जीवः स्वयंप्रकाशः। स्वप्नावस्थामधिकृत्य 'अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः' (बृ० ४-३-८) इति श्रुतेः। अनुभवरूपश्च 'प्रज्ञानघनः' (मा० ५) इत्यादिश्रुतेः। अनुभवामीति व्यवहारस्तु वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यमादायोपपद्यते।

¹एवं त्वंपदार्थो निरूपितः।

**अर्थ—**और वह जीव स्वयं प्रकाश है। स्वप्नावस्था को उद्देश्य कर 'इस अवस्था में यह पुरुष स्वयं प्रकाश होता है।' ऐसी बृहदारण्यक श्रुति है। (इसी तरह) वह अनुभव रूप है। क्योंकि 'वह प्रज्ञानघन—विज्ञानमूर्ति है'। ऐसी माण्डूक्य श्रुति है। 'मैं अनुभव करता हूँ' यह व्यवहार वृत्ति में प्रतिबिम्बित हुए चैतन्य को स्वीकार करके ही उपपन्न होता है।

इस प्रकार से 'त्वम्' पदार्थ का निरूपण हुआ।

**विवरण—**आत्मा को स्वप्रकाश, और ज्ञानस्वरूप यहाँ बताया है। किन्तु प्रश्न यह उठता है कि यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप (अनुभवस्वरूप) है तो 'मैं अनुभव करता हूँ' ऐसा अनुभवाश्रय रूप व्यवहार कैसे होता है? इसका उत्तर सिद्धान्ती यह देता है कि अन्तःकरण में चैतन्य के प्रतिबिम्बित होने पर 'मैं अनुभव करता हूँ' यह औपचारिक व्यवहार होता है। (वृत्ति में ज्ञान का उपचार किया जाता है।)

²अधुना तत्त्वंपदार्थयोरैक्यं महावाक्यप्रतिपाद्यमभिधीयते।


१. विज्ञानमेव जीवस्य स्वरूपलक्षणम्।
२. महावाक्यार्थस्य 'तत्-त्वम्' पदार्थयोरैक्यस्य ज्ञानं तत्त्वंपदार्थज्ञानाधीनमिति