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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३७२ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीवस्वरूपम् ]


**अर्थ—**उस जीव को मायोपाधिक मानने पर एक और अन्तःकरणोपाधिक मानने पर (अन्तःकरण के नाना होने से) अनेक—ऐसा व्यवहार होता है। (इसी की अनुक्रम से एक जीववाद और अनेक जीववाद—संज्ञायें हैं) इस प्रकार (जीव को विभु बताने से) जीव के अणुत्व का खण्डन हुआ। 'स्वयं के गुण से (अपरिच्छिन्नत्व धर्म से) अवर (जिससे वर = महान् कोई नहीं) आत्मा, बुद्धि के गुणों से (अन्तःकरण के सूक्ष्मत्व धर्म से) आरे (नेमि) के अग्र के समान दीखता है' इत्यादि श्रुति में जीव, बुद्धिशब्दवाच्य अन्तःकरणपरिमाणोपाधि के कारण परमाणु बताया गया है।

**विवरण—**जीव परिमाण के सम्बन्ध में तीन वाद हो सकते हैं, एक—अणुपरिमाणवाद, दूसरा—मध्यम परिमाणवाद, और तीसरा—विभुपरिमाणवाद। सिद्धान्ती के मत में जीव, विभुपरिमाण है। अन्यत्र श्रुति में कहीं-कहीं जीव को अणुपरिमाण भी बताया है। जैसे—'वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥' इस श्रुति में जीव को अतीव सूक्ष्म प्रमाण बताया है किन्तु सिद्धान्ती के मत से यह परिमाण जीव की उपाधिरूप बुद्धि के परिमाण की दृष्टि से बताया गया है।

स च जीवः स्वयंप्रकाशः। स्वप्नावस्थामधिकृत्य 'अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः' (बृ० ४-३-८) इति श्रुतेः। अनुभवरूपश्च 'प्रज्ञानघनः' (मा० ५) इत्यादिश्रुतेः। अनुभवामीति व्यवहारस्तु वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यमादायोपपद्यते।

¹एवं त्वंपदार्थो निरूपितः।

**अर्थ—**और वह जीव स्वयं प्रकाश है। स्वप्नावस्था को उद्देश्य कर 'इस अवस्था में यह पुरुष स्वयं प्रकाश होता है।' ऐसी बृहदारण्यक श्रुति है। (इसी तरह) वह अनुभव रूप है। क्योंकि 'वह प्रज्ञानघन—विज्ञानमूर्ति है'। ऐसी माण्डूक्य श्रुति है। 'मैं अनुभव करता हूँ' यह व्यवहार वृत्ति में प्रतिबिम्बित हुए चैतन्य को स्वीकार करके ही उपपन्न होता है।

इस प्रकार से 'त्वम्' पदार्थ का निरूपण हुआ।

**विवरण—**आत्मा को स्वप्रकाश, और ज्ञानस्वरूप यहाँ बताया है। किन्तु प्रश्न यह उठता है कि यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप (अनुभवस्वरूप) है तो 'मैं अनुभव करता हूँ' ऐसा अनुभवाश्रय रूप व्यवहार कैसे होता है? इसका उत्तर सिद्धान्ती यह देता है कि अन्तःकरण में चैतन्य के प्रतिबिम्बित होने पर 'मैं अनुभव करता हूँ' यह औपचारिक व्यवहार होता है। (वृत्ति में ज्ञान का उपचार किया जाता है।)

²अधुना तत्त्वंपदार्थयोरैक्यं महावाक्यप्रतिपाद्यमभिधीयते।


१. विज्ञानमेव जीवस्य स्वरूपलक्षणम्।
२. महावाक्यार्थस्य 'तत्-त्वम्' पदार्थयोरैक्यस्य ज्ञानं तत्त्वंपदार्थज्ञानाधीनमिति