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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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महावाक्यार्थनिर्णयः] विषयपरिच्छेदः ३७३

**अर्थ—**अब महावाक्य के प्रतिपाद्यभूत 'तत् और त्वम्' दोनों का ऐक्य बताया जाता है।

इस सम्बन्ध में एक शंका और उसका निरसन—

ननु नाहमीश्वर इत्यादिप्रत्यक्षेण, किञ्चिज्ज्ञत्वसर्वज्ञत्व¹विरुद्धधर्माश्रयत्वादिलिङ्गेन, द्वा सुपर्णेत्यादिश्रुत्या,
द्वाविमौ पुरुषौ लोकेक्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ (भ०गी०१५–१६)
इत्यादिस्मृत्या च जीवपरभेदस्यावगतत्वेन तत्त्वमस्यादिवाक्यमादित्यो यूपो, यजमानः प्रस्तर इत्यादिवाक्यवद् उपचारितार्थमेवेति चेत् । न । भेदप्रत्यक्षस्य सम्भावितकरणदोषस्यासम्भावितदोषवेदजन्यज्ञानेन बाध्यमानत्वात् । अन्यथा चन्द्रगताधिकपरिमाणग्राहिज्योतिःशास्त्रस्य चन्द्रप्रादेशग्राहिप्रत्यक्षेण बाधापत्तेः । पाकरक्ते घटे रक्तोऽयं न श्याम इति वत् सविशेषणे हीति न्यायेन जीवपरभेदग्राहिप्रत्यक्षस्य विशेषणीभूतधर्मभेदविषयत्वाच्च ।

**अर्थ—**१-'मैं ईश्वर नहीं'—इस (जीव) प्रत्यक्ष से, तथा २-किञ्चिज्ज्ञत्व और सर्वज्ञत्व रूप परस्पर विरुद्ध धर्म के (जीव और परमेश्वर) आश्रय होने से, इसी प्रकार ३-'दो पक्षी' इत्यादि श्रुति से तथा ४-'इस लोक में दो पुरुष हैं। एक क्षर और दूसरा अक्षर, उनमें से समस्तभूत क्षर पुरुष हैं, और कूटस्थ, अक्षर पुरुष हैं' इत्यादि भगवद्गीता–जैसी स्मृति से जीवात्मा और परमात्मा में भेद का ज्ञान होने से तत्त्वमस्यादि वाक्य का अभेदज्ञापक अर्थ, 'यूप, आदित्य हैं' 'प्रस्तर, यजमान हैं' आदि वाक्यों के अर्थ के समान औपचारिक है—यह शंका करना ठीक नहीं होगा।

जीवात्मा और परमात्मा के भेद प्रत्यक्ष में, इन्द्रियजन्य ज्ञान का वेदजन्य ज्ञान से बाध हो जाता है। इन्द्रियों में दोषों की संभावना होने से और वेदों में दोष की संभावना भी न होने से तदुत्पन्न ज्ञान से इन्द्रियजन्य ज्ञान का बाध होता है। अन्यथा (प्रत्यक्ष


तत्त्वं पदार्थों निरूपितौ । तज्ज्ञानाधीनं तत्त्वंपदार्थयोरैक्यं प्रतिपादयतीति भावः । महावाक्यं नाम षड्विध–तात्पर्यग्राहकलिङ्गोपेत–वाक्यम् । तच्चतुर्विधम्–(१) तत्त्वमसि, (२) प्रज्ञानं ब्रह्म, (३) अयमात्मा ब्रह्म, (४) अहं ब्रह्म । चतुर्विधमहावाक्यस्य प्रतिपाद्यं जीव–ब्रह्मणोरैक्यमेव ।
¹ १. 'स्वरूप'-इति पाठान्तरम् ।