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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 482 में से

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३७४वेदान्तपरिभाषा[ महावाक्यार्थनिर्णयः

से वेदजन्य ज्ञान का बाध मानें तो ) जो ज्योतिःशास्त्र चन्द्रमा का प्रमाण बहुत अधिक बताता है, उसका 'चन्द्रमा प्रादेशमात्र है' बताने वाले प्रत्यक्ष से बाध होने लगेगा । इसके अतिरिक्त जीवात्मा परमात्मा के भेददर्शक प्रत्यक्ष का विषय, विशेषणस्वरूप धर्म का भेद होता है । और वह पाक से रक्त के घट होने पर 'यह रक्त है श्याम नहीं है', इस वाक्य के अन्तर्गत 'सविशेषणे हि विधिनिषेधौ विशेषणमुपसंक्रामतः सति विशेष्ये बाधे' इस न्याय से होता है । ( न्याय का यह अर्थ यह है कि विशेषण सहित विशेष्य के विषय में विधिनिषेध यदि कहे हों एवं विशेष्य में यदि उस विशेषण का बाध हुआ हो तो वे विधिनिषेध विशेषण के लिये समझे जाते हैं । उदाहरणार्थ--रक्तघट है, श्यामघट नहीं, ऐसा निषेध करने पर, श्यामघट अस्तित्व में न होने से इस निषेध का विषय श्यामगुण तक ही है । इसी तरह जीवात्मा और परमात्मा--ये भिन्न हैं--यह जो प्रत्यक्ष होता है उसका विषय, जिस धर्म के कारण ये परस्पर भिन्न प्रतीत होते हैं उन विशेषणीभूत धर्मों का भेद है । जीवात्मा परमात्मा का भेद, उस प्रत्यक्ष का विषय नहीं है ।)

विवरण—यहाँ पूर्वपक्षी का कहना है कि जीव और परमात्मा का ऐक्य होना असम्भव है, इसमें अनेक प्रमाण उसने दिखाये हैं, उनमें सबसे प्रबल प्रमाण प्रत्यक्ष है । उस प्रत्यक्ष के अनुसार 'मैं ईश्वर नहीं हूँ' 'मैं दुखी हूँ' 'मैं संसारी हूँ' ऐसी हमें साक्षात् प्रतीति होती रहती है । इसके अतिरिक्त यदि जीव अज्ञानी है तो ईश्वर सर्वज्ञ है—जीव और परमेश्वर इन विरुद्ध धर्मों के आश्रय होने से उनकी एकता होना संभव नहीं । इतना ही नहीं, किन्तु वेदान्तियों को अत्यन्त अभीप्सित श्रुति प्रमाण भी जीव परमात्मा के भेद को ही बताता है । जैसे—'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते' ( मुं० ३।१ ) इत्यादि इस श्रुति में जीव के संसारफलानुभव को तथा ईश्वर के असंसारित्व को स्पष्ट बताया है । आदि पद से 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके' इत्यादि काठकोपनिषद् श्रुति का भी ग्रहण करना चाहिये । उसी तरह भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक के आगे ही 'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः' कहा है । तस्मात् प्रत्यक्ष, अनुमान, श्रुति, स्मृति आदि प्रमाणों से ज्ञायमान जीवात्मा और परमात्मा के भेद को केवल 'तत्त्वमसि' वाक्य से असत्य सिद्ध करना सम्भव नहीं । अतः इस वाक्य का अर्थ गौण ( औपचारिक ) ही समझना चाहिये । जैसे वेद में यूप के आदित्य न होने पर भी 'यूप आदित्य है' ऐसा बताने पर उसे हम, जैसे गौण ( औपचारिक केवल स्तुति के लिये ) कहा हुआ समझते हैं, वैसे ही जीव और परमात्मा की एकता ( ऐक्य ) 'तत्त्वमसि' वाक्य में औपचारिक बताई गई है समझना चाहिये ।

इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है—वेद के 'तत्त्वमसि' महावाक्य से ज्ञात होनेवाले जीवात्मपरमात्मैक्य का, भेद प्रत्यक्ष से बाध होना संभव नहीं । जिन इन्द्रियों की या अन्तःकरण की सहायता से प्रत्यक्ष होता है, उनमें अपाटवादिदोषों का होना असंभव नहीं और वेदजन्य ज्ञान में वैसे दोषों का होना संभव नहीं । शास्त्र के द्वारा प्रत्यक्ष के