भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 482 में से

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प्रत्यक्षेणागमस्याबाध्यत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३७५

बाध को न माना जाय तो “सार्द्धानि षट् सहस्राणि योजनानि विवस्वतः । विष्कम्भो मण्डलस्येन्दोः सहाशीत्या चतुःशतम् ॥” ( सूर्य. सि. ) ज्योतिःशास्त्र में बताये गये इस चन्द्र परिमाण का, चन्द्र को प्रादेश मात्र दिखानेवाले प्रत्यक्ष प्रमाण से बाध होने का प्रसंग प्राप्त होगा । तस्मात् प्रत्यक्ष से, शास्त्र से होनेवाले ज्ञान का बाध मानना उचित नहीं है । तब 'मैं ईश्वर नहीं हूँ' इस भेद प्रत्यक्ष की गति कैसे लगेगी ? इस पर उत्तर देते हैं कि उस ज्ञान का ( प्रत्यक्ष का ) विषय तो जीवात्मा परमात्मा के विशेषणीभूत सोपाधिकत्व और निरुपाधिकत्व धर्मों के भेद को दिखाना मात्र है । ग्रन्थकार ने यहाँ पर सविशेषणन्याय, दृष्टान्त के लिये दिखाया है । उसका अर्थ यह है कि विशेषणयुक्त विशेष्य के विषय में किये जानेवाले विधिनिषेधों का विशेष्य में बाध होने पर वे विशेष्य में लागू न होकर विशेषण में लगते हैं । जैसे—पकाने से पहले श्याम घट, पकाने पर रक्तवर्ण हुआ देख 'अयं 'घट' श्यामः' प्रतीति होती है । इस वाक्य में 'अयम्' पदार्थ जो 'घट' उसमें, श्याम पदार्थ—श्याम गुण विशिष्ट घट का भेद बताया है । परन्तु वह भेद—'यह पहला ही घट है' इस प्रत्यभिज्ञा से बाधित होता है । तस्मात् इस वाक्य का विषय श्यामगुणेतरत्व रक्तत्व है । वैसे ही 'नाहमीश्वरः' इस वाक्य में अहम् पदार्थ–अन्तःकरणोपहित चैतन्य और ईश्वर पदार्थ—निरुपाधिक चैतन्य भेद के विषय का 'तत्त्वमसि' महावाक्य से बाध होने पर 'सविशेषण' न्याय से निरुपाधिकधर्मेतरत्व अर्थात् सोपाधिकत्व का दिखाना ही है । इस रीति से प्रत्यक्ष अनुभव की संगति लगाई जा सकती है ।

अब पूर्वपक्षी के बताये हुए अनुमान की व्यवस्था लगाते हैं ।

अत एव नानुमानमपि प्रमाणम्, आगम¹बाधात्, मेरुपाषाणमयत्वानुमानवत् ।

अर्थ— इसीलिये अनुमान को भी प्रमाण नहीं माना जा सकता । क्योंकि आगम के साथ उसका विरोध होता है । जैसे—'मेरुपर्वत पाषाणमय है' इस अनुमान के समान ।

विवरण— प्रत्यक्ष के समान ही अनुमान से भी जीवात्म-परमात्म भेद का साधन नहीं किया जा सकता । क्योंकि उसका वेद से ( तत्त्वमस्यादि-वाक्य से ) विरोध होता है । जैसे—'मेरुपर्वत पाषाणमय है, विन्ध्यपर्वत के समान' यह अनुमान 'सर्वतः सौवर्णः कुलगिरिराजो मेरुः'—पर्वतराज मेरु सर्वतः सुवर्णमय है—इस आगम के साथ विरोध होने से त्याज्य है, उसी तरह उपर्युक्त अनुमान ( किञ्चिज्ज्ञत्व, सर्वज्ञत्वादि हेतुओं से बताया हुआ ) त्याज्य है ।

अब पूर्वपक्षी के बताये गये आगम प्रमाण की व्यवस्था लगाते हैं ।


१. 'विरोधात्'—इति पाठान्तरम् ।

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