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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३७६वेदान्तपरिभाषा[ जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम्

नाप्यागमान्तरविरोधः । तत्परातत्परवाक्ययोः तत्परवाक्यस्य बलवत्वेन लोकसिद्धभेदानुवादिद्वासुपर्णादिवाक्यापेक्षया उपक्रमोपसंहाराद्यवगताद्वैततात्पर्यविशिष्टस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यस्य प्रबलत्वात् ।

अर्थ— और न अन्य आगमों के साथ ही जीवात्म-परमात्मैक्य का विरोध होता है। क्योंकि तत्परवाक्य और अतत्परवाक्यों में से तत्पर वाक्य हमेशा प्रबल होता है। इस कारण लोकप्रसिद्ध जीवात्म-परमात्म-भेद का अनुवाद करने वाले 'द्वासुपर्णा' आदि वाक्यों की अपेक्षा उपक्रमोपसंहार आदि से ज्ञात होनेवाले अद्वैत तात्पर्य से युक्त जो तत्त्वमस्यादि वाक्य, वह अधिक प्रबल है।

विवरण— पूर्वपक्षी का कथन था कि 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्य का 'द्वासुपर्णा' आदि मुण्डक श्रुति से विरोध होता है। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि वेद में कतिपय वाक्य, तत्पर (वाच्यार्थ प्रधान) होते हैं तो कतिपय वाक्य, अतत्पर (वाच्यार्थ गौण, अन्य प्रयोजनार्थप्रधान) भी होते हैं। उनमें तत्पर वाक्य बलवान् होते हैं। और अतत्पर वाक्यों का अर्थ उनसे मिलता-जुलता करना होता है। वही न्याय 'द्वासुपर्णा' श्रुतिवाक्य में लगाना होता है। प्रस्तुत वाक्य लोकप्रसिद्ध भेद का अनुवादक है। 'तत्त्वमसि' वाक्य जिस प्रकरण में आया है उसका आरम्भ (उपक्रम) और समाप्ति (उपसंहार) तथा अन्य गमक लिङ्गों को देखने पर उनका तात्पर्य अद्वैत प्रतिपादन करने में ही स्पष्ट प्रतीत होता है। इसलिये वह वाक्य 'द्वासुपर्णा' आदि वाक्यों से अधिक प्रबल है। इस प्रकार भेदवादी आगम, अभेदवादी आगम की अपेक्षा दुर्बल ही मानना चाहिये।

अब जीव और परमात्मा विरुद्ध धर्माश्रय है—यह पूर्वपक्षी का कहना था, वह कैसे उपपन्न होता है, सो बताते हैं—

न च जीवपरैक्ये विरुद्धधर्माश्रयत्वानुपपत्तिः । शीतस्यैव जलस्यौपाधिकौष्ण्याश्रयत्ववत् स्वभावतो निर्गुणस्यैव ^१जीवस्यान्तःकरणाद्यौपाधिककर्तृत्वाद्याश्रयत्वप्रतिभासोपपत्तेः । यदि च जलादौ औष्ण्यमारोपितं तदा प्रकृतेऽपि तुल्यम् ।

अर्थ— जीव और परमात्मा का ऐक्य मानने पर विरुद्धधर्म के आश्रय की उपपत्ति नहीं लगती, सो बात नहीं। जैसे शीतल जल, उपाधि के योग से उष्णता का आश्रय होता है, वैसे ही स्वभावतः निर्गुण जीव अन्तःकरणादिक उपाधि के द्वारा कर्तृत्वादिकों का आश्रय होता है—यह अनुभव सभी को है। जब जल आदि में अग्नि-धर्म उष्णता


१. 'तस्यान्तः'—इति पाठान्तरम् ।