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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् ] विषयपरिच्छेदः ३७७

का आरोप हुआ है कहें तो प्रकृत में भी ( जीव में भी ) वह तुल्य है। अर्थात् कर्तृत्वादि जीव पर आरोपित ही हैं।

विवरण—पूर्वपक्षी ने—किञ्चिज्ज्ञत्व; सर्वज्ञत्व आदि धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, तब जीवात्मा और परमात्मा में अद्वैत मानने पर उनके आश्रयत्व को किस तरह लगाओगे ? —यह पूछा था। उसके उत्तर में सिद्धान्ती कहता है कि जीव में किञ्चिज्ज्ञत्व, कर्तृत्व आदि धर्म, जीव की उपाधिभूत अन्तःकरण के कारण प्रतीत होते हैं। अग्नि की उष्णता जैसे जल में प्रतीत होती है।

अब इस कर्तृत्व के आरोप के विषय में एक शंका और उसका निरसन—

न च सिद्धान्ते कर्तृत्वस्य क्वचिदप्यभावादारोप्यप्रमाहितसंस्कारा- भावे कथमारोप इति वाच्यम्। लाघवेनारोप्यविषयसंस्कारत्वेनैव तस्य हेतुत्वात् ।

अर्थ--सिद्धान्ती के मत से आत्मा में किसी भी अवस्था में कर्तृत्व के होने से आरोप्य ( कर्तृत्व ) के प्रमात्मक ज्ञानजन्य संस्कार के अभाव में आरोप होना कैसे सम्भव है ? परन्तु यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि हम आरोप्य के प्रमात्मक ज्ञान से उत्पन्न होने वाले संस्कार को आरोप में कारण नहीं मानते, अपितु लाघवात् आरोप्य-विषयक संस्कार को ही उस आरोप में कारण मानते हैं।

विवरण--जीव पर कर्तृत्व के आरोप के विषय में शंका उठाने वाले का आशय यह है कि आरोप का ज्ञान आरोप्यविषयक प्रमात्मक ज्ञानजन्य संस्कार से होता है। अर्थात् आरोप करने के लिए प्रथमतः उस आरोप के विषय ( कर्तृत्वादि ) का वास्तविक ज्ञान होना चाहिये, तब उस ज्ञान का संस्कार बुद्धि पर होगा, तदनन्तर उस संस्कार के अनुसार आरोप किया जाता है।

किन्तु वेदान्त सिद्धान्त में ब्रह्म-भिन्न यावत् पदार्थों के अवास्तविक होने से आत्मा में या अन्तःकरण में उभयत्र कर्तृत्व तो अवास्तविक ही है। ऐसी स्थिति में कर्तृत्व का प्रमात्मक ज्ञान होना कैसे सम्भव है ? और जब प्रमात्मक ज्ञान होना ही असम्भव है, तब तत्संस्कारजन्य कर्तृत्व का आत्मा पर आरोप कैसे हो सकेगा ? आरोप्य जो अन्तःकरण कर्तृत्व, उसके मिथ्या होने से उसका अनुभव अप्रमात्मक ही होगा। अतः ऐसे अप्रमात्मक ज्ञान के संस्कार से आरोपसिद्धि नहीं हो सकती।

समाधान—सिद्धान्ती उत्तर देता है—हम आरोप्य विषयक प्रमात्मकज्ञानजन्य संस्कार को आरोप के प्रति कारण न मानकर, आरोप्यविषयक संस्कार को ही कारण मानते हैं, क्योंकि ऐसा मानने में लाघव है। तात्पर्य यह है—कर्तृत्व का प्रमात्मक ज्ञान होने पर तज्जन्य संस्कार को कर्तृत्वारोप में कारण मानने की अपेक्षा साक्षात्