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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३७८वेदान्तपरिभाषा[ जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम्

कर्तृत्वविषयक संस्कार को ही हम कर्तृत्वाध्यास में कारण मानते हैं । अर्थात् इस समय के कर्तृत्वारोप में पूर्वप्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार कारण होते हैं, और पूर्व प्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार में तत्पूर्वप्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार कारण होते हैं ।

इस पर पूर्वपक्षी फिर पूछता है—

न च प्राथमिकारोपे का गतिः, कर्तृत्वाद्यध्यासप्रवाहस्यानादित्वात् ।

**अर्थ—**अध्यास में पूर्व-पूर्व संस्कार को कारण मानने पर प्रथम ( पहला ) अध्यास ( आरोप ) कैसे सिद्ध होगा ? इसके उत्तर में यह कहा जाता है कि कर्तृत्वादिकों के अध्यास का प्रवाह अनादि है ।

**विवरण—**इस समय के आरोप्यविषयक संस्कार के प्रति पूर्व आरोप्यविषयक संस्कार कारण हैं, और उनके प्रति तत्पूर्व कारण होते हैं, ऐसी परम्परा मानने पर भी सर्वप्रथम आरोप कैसे हुआ यह समझ में नहीं आता । इस पर सिद्धान्ती का उत्तर है कि जीव के सम्बन्ध में कर्तृत्वादिकों के अध्यास की परम्परा बीजाङ्कुर न्याय से अनादि है ।

अस्तु । किन्तु विरुद्ध धर्मवाले जीव और ईश्वर की एकता कैसे उपपन्न होती है ? ऐसी शंका उठाकर कहते हैं ।

तत्र तत्त्वंपदवाच्ययोर्विशिष्टयोरैक्या¹योगेऽपिलक्ष्यस्वरूपयोरैक्यमुपपादितमेव । अत एव तत्प्रतिपादकतत्त्वमस्यादिवाक्यानामखण्डार्थत्वम्, सोऽयमित्यादिवाक्यवत् । न च कार्यपराणामेव प्रामाण्यम्, चैत्र पुत्रस्ते जात इत्यादौ सिद्धेऽपि सङ्गतिग्रहात् ।

**अर्थ—**वहां पर ( तत्त्वमसि महावाक्य में ) तत् और त्वम् इन दो पदों के जो वाच्यार्थ हैं ( जीव और परमात्मा ) वे तत्तद्गुण विशिष्ट होने से उनमें एकता ( ऐक्य ) होना उचित न होने पर भी उनके जो लक्ष्यार्थ ( जीवचैतन्य और परमात्मचैतन्य ) हैं उनकी एकता तो हम बता ही चुके हैं । इस कारण अभेद प्रतिपादक तत्त्वमस्यादि वाक्य अखण्डार्थ हैं । वही यह ( देवदत्त ) इस वाक्यार्थ के तुल्य ( मीमांसकों के मतानुसार केवल ) कार्य परक ( कर्म पर ) वाक्यों में ही प्रामाण्य न होकर ‘चैत्र ! तुम्हें पुत्र हुआ’ आदि वाक्यों के समान सिद्ध वस्तु का अनुवाद करने वाले वाक्य भी सङ्गत होते हैं अर्थात् उनके सुनने पर उनके परिणाम से उनका प्रामाण्य व्यक्त होता है ।


१. 'योग्यत्वेपि'—इति पाठान्तरम् ।