भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 482 में से

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जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् ] विषयपरिच्छेदः ३७९

**विवरण—शंका—**तत्त्वमसि आदि महावाक्यों का अभेदात्मक तात्पर्य सिद्ध होने पर भी वस्तु को अन्यथा करने की शक्ति वाक्यों में नहीं होती, तब अन्तःकरणोपहित चैतन्य और निरूपाधिक चैतन्य में अभेद कैसे हो सकेगा ? 'यह घट, पट है' ऐसा सौ बार श्रुति के कहने पर भी घटपटैक्य करने का सामर्थ्य 'यह घट, पट है' इस वाक्य में नहीं है। अतः तत्त्वमस्यादि वाक्यों को औपचारिक अर्थ से लगाकर भेदग्राही प्रमाणों का ही प्राबल्य मानकर तत् और त्वम् में भेद मानना ही उचित होगा । तस्मात् आप तत् त्वम् पदार्थों की एकता को महावाक्य का प्रतिपाद्य कैसे बता रहे हैं ?

**समाधान—**हम तत् और त्वम् पदों के वाच्यार्थ जो ईश्वर और जीव हैं उनकी एकता नहीं बता रहे हैं किन्तु दोनों का जो विशेषणानवच्छिन्न लक्ष्यस्वरूप चैतन्य, वह एक स्वरूप ( अखण्ड ) है, बता रहे हैं। जब कि तत् और त्वम् पदों के विशेषणानवच्छिन्न अर्थों में ऐक्य है, तब तो तत्प्रतिपादक वाक्यों में भी अखण्डार्थत्व ( संसर्गानवगाहि यथार्थज्ञानजनकत्व ) सिद्ध है—यह बता चुके हैं। 'सोऽयं देवदत्तः' वाक्यों में जिस प्रकार तत्कालावच्छिन्न और एतत्कालावच्छिन्न विशेषणों का त्याग कर देवदत्त मात्र का ऐक्य बताया जाता है, उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य का ऐक्यावगाही अर्थ समझना चाहिये ।

इस पर मीमांसकों की एक शंका—'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् आनर्थक्यमतदर्थानाम्' वेद कर्मप्रधान होने से अकर्मपरक वाक्य अनर्थक हैं—यह पूर्वपक्षकर 'विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः' विधायक वाक्यों के साथ पढ़े गये ऐसे वाक्य विधेय की स्तुति के लिये होते हैं। इस वचन से ये वेद भाग कर्मपरक-विधि के उपकारक होते हैं अर्थात् परम्परया प्रमाण होते हैं—ऐसा मीमांसकों ने सिद्धान्त किया है। 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य, किसी प्रकार की विधि को नहीं बता रहा है, अतः उसमें प्रामाण्य कैसे होगा ?

**समाधान—**सिद्ध अर्थ का अनुवाद करनेवाले वाक्यों का भी संगतिग्रह ( अन्वयबोध ) होता है। जैसे—'चैत्र पुत्रस्तेजातः' इस वाक्य के सुनने पर श्रोता के ( चैत्र के ) मुख की प्रसन्नता को देखकर हर्ष का अनुमान किया जाता है। वह हर्ष, पुत्रोत्पत्ति ज्ञानजन्य है—यह ज्ञान बाधित विषय न होने से ( प्रमारूप होने से ) मैत्रोच्चारित वाक्यान्वयबोधमूलक है, अतः उस वाक्य में प्रमाजनकत्व होने के कारण प्रामाण्य मानना ही होगा। वही स्थिति तत्त्वमसि महावाक्य की है। इस महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन से दुःखनिवृत्ति ( मोक्षप्राप्ति ) होने के कारण इस महावाक्य का प्रामाण्य अकुतोबाध है। मीमांसकों का सिद्धान्त कर्मकाण्ड तक के लिये ही है, ज्ञानकाण्ड के लिये नहीं।

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