वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
प्रत्यक्षेणागमस्याबाध्यत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३७५
बाध को न माना जाय तो “सार्द्धानि षट् सहस्राणि योजनानि विवस्वतः । विष्कम्भो मण्डलस्येन्दोः सहाशीत्या चतुःशतम् ॥” ( सूर्य. सि. ) ज्योतिःशास्त्र में बताये गये इस चन्द्र परिमाण का, चन्द्र को प्रादेश मात्र दिखानेवाले प्रत्यक्ष प्रमाण से बाध होने का प्रसंग प्राप्त होगा । तस्मात् प्रत्यक्ष से, शास्त्र से होनेवाले ज्ञान का बाध मानना उचित नहीं है । तब 'मैं ईश्वर नहीं हूँ' इस भेद प्रत्यक्ष की गति कैसे लगेगी ? इस पर उत्तर देते हैं कि उस ज्ञान का ( प्रत्यक्ष का ) विषय तो जीवात्मा परमात्मा के विशेषणीभूत सोपाधिकत्व और निरुपाधिकत्व धर्मों के भेद को दिखाना मात्र है । ग्रन्थकार ने यहाँ पर सविशेषणन्याय, दृष्टान्त के लिये दिखाया है । उसका अर्थ यह है कि विशेषणयुक्त विशेष्य के विषय में किये जानेवाले विधिनिषेधों का विशेष्य में बाध होने पर वे विशेष्य में लागू न होकर विशेषण में लगते हैं । जैसे—पकाने से पहले श्याम घट, पकाने पर रक्तवर्ण हुआ देख 'अयं 'घट' श्यामः' प्रतीति होती है । इस वाक्य में 'अयम्' पदार्थ जो 'घट' उसमें, श्याम पदार्थ—श्याम गुण विशिष्ट घट का भेद बताया है । परन्तु वह भेद—'यह पहला ही घट है' इस प्रत्यभिज्ञा से बाधित होता है । तस्मात् इस वाक्य का विषय श्यामगुणेतरत्व रक्तत्व है । वैसे ही 'नाहमीश्वरः' इस वाक्य में अहम् पदार्थ–अन्तःकरणोपहित चैतन्य और ईश्वर पदार्थ—निरुपाधिक चैतन्य भेद के विषय का 'तत्त्वमसि' महावाक्य से बाध होने पर 'सविशेषण' न्याय से निरुपाधिकधर्मेतरत्व अर्थात् सोपाधिकत्व का दिखाना ही है । इस रीति से प्रत्यक्ष अनुभव की संगति लगाई जा सकती है ।
अब पूर्वपक्षी के बताये हुए अनुमान की व्यवस्था लगाते हैं ।
अत एव नानुमानमपि प्रमाणम्, आगम¹बाधात्, मेरुपाषाणमयत्वानुमानवत् ।
अर्थ— इसीलिये अनुमान को भी प्रमाण नहीं माना जा सकता । क्योंकि आगम के साथ उसका विरोध होता है । जैसे—'मेरुपर्वत पाषाणमय है' इस अनुमान के समान ।
विवरण— प्रत्यक्ष के समान ही अनुमान से भी जीवात्म-परमात्म भेद का साधन नहीं किया जा सकता । क्योंकि उसका वेद से ( तत्त्वमस्यादि-वाक्य से ) विरोध होता है । जैसे—'मेरुपर्वत पाषाणमय है, विन्ध्यपर्वत के समान' यह अनुमान 'सर्वतः सौवर्णः कुलगिरिराजो मेरुः'—पर्वतराज मेरु सर्वतः सुवर्णमय है—इस आगम के साथ विरोध होने से त्याज्य है, उसी तरह उपर्युक्त अनुमान ( किञ्चिज्ज्ञत्व, सर्वज्ञत्वादि हेतुओं से बताया हुआ ) त्याज्य है ।
अब पूर्वपक्षी के बताये गये आगम प्रमाण की व्यवस्था लगाते हैं ।
१. 'विरोधात्'—इति पाठान्तरम् ।
| ३७६ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् |
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नाप्यागमान्तरविरोधः । तत्परातत्परवाक्ययोः तत्परवाक्यस्य बलवत्वेन लोकसिद्धभेदानुवादिद्वासुपर्णादिवाक्यापेक्षया उपक्रमोपसंहाराद्यवगताद्वैततात्पर्यविशिष्टस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यस्य प्रबलत्वात् ।
अर्थ— और न अन्य आगमों के साथ ही जीवात्म-परमात्मैक्य का विरोध होता है। क्योंकि तत्परवाक्य और अतत्परवाक्यों में से तत्पर वाक्य हमेशा प्रबल होता है। इस कारण लोकप्रसिद्ध जीवात्म-परमात्म-भेद का अनुवाद करने वाले 'द्वासुपर्णा' आदि वाक्यों की अपेक्षा उपक्रमोपसंहार आदि से ज्ञात होनेवाले अद्वैत तात्पर्य से युक्त जो तत्त्वमस्यादि वाक्य, वह अधिक प्रबल है।
विवरण— पूर्वपक्षी का कथन था कि 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्य का 'द्वासुपर्णा' आदि मुण्डक श्रुति से विरोध होता है। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि वेद में कतिपय वाक्य, तत्पर (वाच्यार्थ प्रधान) होते हैं तो कतिपय वाक्य, अतत्पर (वाच्यार्थ गौण, अन्य प्रयोजनार्थप्रधान) भी होते हैं। उनमें तत्पर वाक्य बलवान् होते हैं। और अतत्पर वाक्यों का अर्थ उनसे मिलता-जुलता करना होता है। वही न्याय 'द्वासुपर्णा' श्रुतिवाक्य में लगाना होता है। प्रस्तुत वाक्य लोकप्रसिद्ध भेद का अनुवादक है। 'तत्त्वमसि' वाक्य जिस प्रकरण में आया है उसका आरम्भ (उपक्रम) और समाप्ति (उपसंहार) तथा अन्य गमक लिङ्गों को देखने पर उनका तात्पर्य अद्वैत प्रतिपादन करने में ही स्पष्ट प्रतीत होता है। इसलिये वह वाक्य 'द्वासुपर्णा' आदि वाक्यों से अधिक प्रबल है। इस प्रकार भेदवादी आगम, अभेदवादी आगम की अपेक्षा दुर्बल ही मानना चाहिये।
अब जीव और परमात्मा विरुद्ध धर्माश्रय है—यह पूर्वपक्षी का कहना था, वह कैसे उपपन्न होता है, सो बताते हैं—
न च जीवपरैक्ये विरुद्धधर्माश्रयत्वानुपपत्तिः । शीतस्यैव जलस्यौपाधिकौष्ण्याश्रयत्ववत् स्वभावतो निर्गुणस्यैव ^१जीवस्यान्तःकरणाद्यौपाधिककर्तृत्वाद्याश्रयत्वप्रतिभासोपपत्तेः । यदि च जलादौ औष्ण्यमारोपितं तदा प्रकृतेऽपि तुल्यम् ।
अर्थ— जीव और परमात्मा का ऐक्य मानने पर विरुद्धधर्म के आश्रय की उपपत्ति नहीं लगती, सो बात नहीं। जैसे शीतल जल, उपाधि के योग से उष्णता का आश्रय होता है, वैसे ही स्वभावतः निर्गुण जीव अन्तःकरणादिक उपाधि के द्वारा कर्तृत्वादिकों का आश्रय होता है—यह अनुभव सभी को है। जब जल आदि में अग्नि-धर्म उष्णता
१. 'तस्यान्तः'—इति पाठान्तरम् ।
जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् ] विषयपरिच्छेदः ३७७
का आरोप हुआ है कहें तो प्रकृत में भी ( जीव में भी ) वह तुल्य है। अर्थात् कर्तृत्वादि जीव पर आरोपित ही हैं।
विवरण—पूर्वपक्षी ने—किञ्चिज्ज्ञत्व; सर्वज्ञत्व आदि धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, तब जीवात्मा और परमात्मा में अद्वैत मानने पर उनके आश्रयत्व को किस तरह लगाओगे ? —यह पूछा था। उसके उत्तर में सिद्धान्ती कहता है कि जीव में किञ्चिज्ज्ञत्व, कर्तृत्व आदि धर्म, जीव की उपाधिभूत अन्तःकरण के कारण प्रतीत होते हैं। अग्नि की उष्णता जैसे जल में प्रतीत होती है।
अब इस कर्तृत्व के आरोप के विषय में एक शंका और उसका निरसन—
न च सिद्धान्ते कर्तृत्वस्य क्वचिदप्यभावादारोप्यप्रमाहितसंस्कारा- भावे कथमारोप इति वाच्यम्। लाघवेनारोप्यविषयसंस्कारत्वेनैव तस्य हेतुत्वात् ।
अर्थ--सिद्धान्ती के मत से आत्मा में किसी भी अवस्था में कर्तृत्व के होने से आरोप्य ( कर्तृत्व ) के प्रमात्मक ज्ञानजन्य संस्कार के अभाव में आरोप होना कैसे सम्भव है ? परन्तु यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि हम आरोप्य के प्रमात्मक ज्ञान से उत्पन्न होने वाले संस्कार को आरोप में कारण नहीं मानते, अपितु लाघवात् आरोप्य-विषयक संस्कार को ही उस आरोप में कारण मानते हैं।
विवरण--जीव पर कर्तृत्व के आरोप के विषय में शंका उठाने वाले का आशय यह है कि आरोप का ज्ञान आरोप्यविषयक प्रमात्मक ज्ञानजन्य संस्कार से होता है। अर्थात् आरोप करने के लिए प्रथमतः उस आरोप के विषय ( कर्तृत्वादि ) का वास्तविक ज्ञान होना चाहिये, तब उस ज्ञान का संस्कार बुद्धि पर होगा, तदनन्तर उस संस्कार के अनुसार आरोप किया जाता है।
किन्तु वेदान्त सिद्धान्त में ब्रह्म-भिन्न यावत् पदार्थों के अवास्तविक होने से आत्मा में या अन्तःकरण में उभयत्र कर्तृत्व तो अवास्तविक ही है। ऐसी स्थिति में कर्तृत्व का प्रमात्मक ज्ञान होना कैसे सम्भव है ? और जब प्रमात्मक ज्ञान होना ही असम्भव है, तब तत्संस्कारजन्य कर्तृत्व का आत्मा पर आरोप कैसे हो सकेगा ? आरोप्य जो अन्तःकरण कर्तृत्व, उसके मिथ्या होने से उसका अनुभव अप्रमात्मक ही होगा। अतः ऐसे अप्रमात्मक ज्ञान के संस्कार से आरोपसिद्धि नहीं हो सकती।
समाधान—सिद्धान्ती उत्तर देता है—हम आरोप्य विषयक प्रमात्मकज्ञानजन्य संस्कार को आरोप के प्रति कारण न मानकर, आरोप्यविषयक संस्कार को ही कारण मानते हैं, क्योंकि ऐसा मानने में लाघव है। तात्पर्य यह है—कर्तृत्व का प्रमात्मक ज्ञान होने पर तज्जन्य संस्कार को कर्तृत्वारोप में कारण मानने की अपेक्षा साक्षात्
| ३७८ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् |
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कर्तृत्वविषयक संस्कार को ही हम कर्तृत्वाध्यास में कारण मानते हैं । अर्थात् इस समय के कर्तृत्वारोप में पूर्वप्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार कारण होते हैं, और पूर्व प्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार में तत्पूर्वप्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार कारण होते हैं ।
इस पर पूर्वपक्षी फिर पूछता है—
न च प्राथमिकारोपे का गतिः, कर्तृत्वाद्यध्यासप्रवाहस्यानादित्वात् ।
**अर्थ—**अध्यास में पूर्व-पूर्व संस्कार को कारण मानने पर प्रथम ( पहला ) अध्यास ( आरोप ) कैसे सिद्ध होगा ? इसके उत्तर में यह कहा जाता है कि कर्तृत्वादिकों के अध्यास का प्रवाह अनादि है ।
**विवरण—**इस समय के आरोप्यविषयक संस्कार के प्रति पूर्व आरोप्यविषयक संस्कार कारण हैं, और उनके प्रति तत्पूर्व कारण होते हैं, ऐसी परम्परा मानने पर भी सर्वप्रथम आरोप कैसे हुआ यह समझ में नहीं आता । इस पर सिद्धान्ती का उत्तर है कि जीव के सम्बन्ध में कर्तृत्वादिकों के अध्यास की परम्परा बीजाङ्कुर न्याय से अनादि है ।
अस्तु । किन्तु विरुद्ध धर्मवाले जीव और ईश्वर की एकता कैसे उपपन्न होती है ? ऐसी शंका उठाकर कहते हैं ।
तत्र तत्त्वंपदवाच्ययोर्विशिष्टयोरैक्या¹योगेऽपिलक्ष्यस्वरूपयोरैक्यमुपपादितमेव । अत एव तत्प्रतिपादकतत्त्वमस्यादिवाक्यानामखण्डार्थत्वम्, सोऽयमित्यादिवाक्यवत् । न च कार्यपराणामेव प्रामाण्यम्, चैत्र पुत्रस्ते जात इत्यादौ सिद्धेऽपि सङ्गतिग्रहात् ।
**अर्थ—**वहां पर ( तत्त्वमसि महावाक्य में ) तत् और त्वम् इन दो पदों के जो वाच्यार्थ हैं ( जीव और परमात्मा ) वे तत्तद्गुण विशिष्ट होने से उनमें एकता ( ऐक्य ) होना उचित न होने पर भी उनके जो लक्ष्यार्थ ( जीवचैतन्य और परमात्मचैतन्य ) हैं उनकी एकता तो हम बता ही चुके हैं । इस कारण अभेद प्रतिपादक तत्त्वमस्यादि वाक्य अखण्डार्थ हैं । वही यह ( देवदत्त ) इस वाक्यार्थ के तुल्य ( मीमांसकों के मतानुसार केवल ) कार्य परक ( कर्म पर ) वाक्यों में ही प्रामाण्य न होकर ‘चैत्र ! तुम्हें पुत्र हुआ’ आदि वाक्यों के समान सिद्ध वस्तु का अनुवाद करने वाले वाक्य भी सङ्गत होते हैं अर्थात् उनके सुनने पर उनके परिणाम से उनका प्रामाण्य व्यक्त होता है ।
१. 'योग्यत्वेपि'—इति पाठान्तरम् ।
जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् ] विषयपरिच्छेदः ३७९
**विवरण—शंका—**तत्त्वमसि आदि महावाक्यों का अभेदात्मक तात्पर्य सिद्ध होने पर भी वस्तु को अन्यथा करने की शक्ति वाक्यों में नहीं होती, तब अन्तःकरणोपहित चैतन्य और निरूपाधिक चैतन्य में अभेद कैसे हो सकेगा ? 'यह घट, पट है' ऐसा सौ बार श्रुति के कहने पर भी घटपटैक्य करने का सामर्थ्य 'यह घट, पट है' इस वाक्य में नहीं है। अतः तत्त्वमस्यादि वाक्यों को औपचारिक अर्थ से लगाकर भेदग्राही प्रमाणों का ही प्राबल्य मानकर तत् और त्वम् में भेद मानना ही उचित होगा । तस्मात् आप तत् त्वम् पदार्थों की एकता को महावाक्य का प्रतिपाद्य कैसे बता रहे हैं ?
**समाधान—**हम तत् और त्वम् पदों के वाच्यार्थ जो ईश्वर और जीव हैं उनकी एकता नहीं बता रहे हैं किन्तु दोनों का जो विशेषणानवच्छिन्न लक्ष्यस्वरूप चैतन्य, वह एक स्वरूप ( अखण्ड ) है, बता रहे हैं। जब कि तत् और त्वम् पदों के विशेषणानवच्छिन्न अर्थों में ऐक्य है, तब तो तत्प्रतिपादक वाक्यों में भी अखण्डार्थत्व ( संसर्गानवगाहि यथार्थज्ञानजनकत्व ) सिद्ध है—यह बता चुके हैं। 'सोऽयं देवदत्तः' वाक्यों में जिस प्रकार तत्कालावच्छिन्न और एतत्कालावच्छिन्न विशेषणों का त्याग कर देवदत्त मात्र का ऐक्य बताया जाता है, उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य का ऐक्यावगाही अर्थ समझना चाहिये ।
इस पर मीमांसकों की एक शंका—'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् आनर्थक्यमतदर्थानाम्' वेद कर्मप्रधान होने से अकर्मपरक वाक्य अनर्थक हैं—यह पूर्वपक्षकर 'विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः' विधायक वाक्यों के साथ पढ़े गये ऐसे वाक्य विधेय की स्तुति के लिये होते हैं। इस वचन से ये वेद भाग कर्मपरक-विधि के उपकारक होते हैं अर्थात् परम्परया प्रमाण होते हैं—ऐसा मीमांसकों ने सिद्धान्त किया है। 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य, किसी प्रकार की विधि को नहीं बता रहा है, अतः उसमें प्रामाण्य कैसे होगा ?
**समाधान—**सिद्ध अर्थ का अनुवाद करनेवाले वाक्यों का भी संगतिग्रह ( अन्वयबोध ) होता है। जैसे—'चैत्र पुत्रस्तेजातः' इस वाक्य के सुनने पर श्रोता के ( चैत्र के ) मुख की प्रसन्नता को देखकर हर्ष का अनुमान किया जाता है। वह हर्ष, पुत्रोत्पत्ति ज्ञानजन्य है—यह ज्ञान बाधित विषय न होने से ( प्रमारूप होने से ) मैत्रोच्चारित वाक्यान्वयबोधमूलक है, अतः उस वाक्य में प्रमाजनकत्व होने के कारण प्रामाण्य मानना ही होगा। वही स्थिति तत्त्वमसि महावाक्य की है। इस महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन से दुःखनिवृत्ति ( मोक्षप्राप्ति ) होने के कारण इस महावाक्य का प्रामाण्य अकुतोबाध है। मीमांसकों का सिद्धान्त कर्मकाण्ड तक के लिये ही है, ज्ञानकाण्ड के लिये नहीं।
३८० वेदान्तपरिभाषा [ जीव-ब्रह्मभेदोपपादनम्
अब विषयपरिच्छेद का उपसंहार करते हैं—
'एवं सर्वप्रमाणाविरुद्धं श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणप्रतिपाद्यं जीवपरैक्यं वेदान्तशास्त्रस्य विषय इति सिद्धम् ।
श्री धर्मराजाध्वरीन्द्रविरचितायां वेदान्तपरिभाषायां विषय-परिच्छेदः समाप्तः ।
—:०:—
**अर्थ—**इस रीति से समस्त प्रमाणों के अविरुद्ध, श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों के द्वारा प्रतिपादित जीवात्मा और परमात्मा का ऐक्य, वेदान्तशास्त्र का विषय है—यह सिद्ध हुआ ।
विवरण—उपर्युक्त रीति से प्रत्यक्षादिप्रमाणों के अविरुद्ध एवं 'तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः' ( ईश. उ. ७ ) इत्यादि श्रुतियों से, 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत' ( भ. गी. १३-२ ) इत्यादि स्मृतियों से, 'सर्वभूतान्तरस्थाय नित्यशुद्धचिदात्मने । प्रत्यक्चैतन्यरूपाय मह्यमेव नमो नमः ॥' इत्यादि इतिहास ग्रन्थों से, और—'विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥' इत्यादि पुराणवचनों से प्रतिपादित जीवब्रह्मैक्य ही वेदान्तशास्त्र का विषय सिद्ध होता है ।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरणप्रकाशे विषय-परिच्छेदः समाप्तः ॥
—:०:—
१. **विषयपरिच्छेदोनाम—**वेदान्तशास्त्रतात्पर्यगम्यतत्त्वपरिच्छेदः । यद्यपि ब्रह्म न विषयः, किन्तु विषयी एव, तथापि—
'फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् ।
ब्रह्मप्यज्ञाननाशार्थं वृत्तिव्याप्यत्वमिष्यते ॥'
इति वचनानुसारेण फलव्याप्यत्वाभावेऽपि वृत्तिविषयत्वं वर्तते ।
अथ प्रयोजन-परिच्छेदः ८
अब वेदान्तशास्त्र के प्रयोजन निरूपण की प्रतिज्ञा कर प्रयोजन का निरूपण करते हैं।
^१इदानीं प्रयोजनं निरूप्यते। ^२यदवगतं सत्स्ववृत्तितयेष्यते, तत्प्रयोजनम्। तच्चद्विविधम्—^३मुख्यं गौणं चेति। तत्र सुखदुःखाभावौ मुख्ये प्रयोजने। तदन्यतर-साधनं गौणं प्रयोजनम्। सुखं च द्विविधम्—सातिशयं निरतिशयं चेति। तत्र सातिशयं सुखं विषयानुषङ्ग-जनितान्तःकरण-वृत्तितारतम्य-कृतानन्दलेशाविर्भाव-विशेषः।
'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' (बृ० ४–३–२) इत्यादिश्रुतेः। निरतिशयं सुखं च ब्रह्मैव। 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० ३–६) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृ० ३–१८) इति श्रुतेः।
१. 'ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूप्यते' इति प्रतिज्ञातेषु ब्रह्म तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूपितम्। इतः परमवशिष्यते एकमेव निरूपणीयम्—यत् ब्रह्मज्ञानं नाम। धर्मजिज्ञासायां हि धर्मज्ञानमनुष्ठानापेक्षमेव फलजनकमिति न स्वत एव पुरुषार्थत्वं ब्रह्मज्ञानस्य इव तस्यास्ति, इति धर्मजिज्ञासास्थले न धर्मज्ञानस्य पृथक् प्रतिज्ञा। ब्रह्मज्ञाने तु उत्पत्तिमात्रेण निःश्रेयससाधनत्वात् सप्रपञ्चतद्विचारप्रतिज्ञा हि सुतरामुपपद्यते। धर्मज्ञानं हि कुतः अनुष्ठानापेक्षमेव फलजनकम् ? कुतश्च ब्रह्मज्ञानं तदनपेक्षं सदेव फलमिति केचन प्रत्यवतिष्ठन्ते। तत्रेदमुत्तरम्—यत् धर्मः स्वयं न फलम्, ब्रह्म तु स्वयं फलमिति। विषयपरिच्छेदे ब्रह्मस्वरूपं व्यवस्थापितं चेदपि प्रमाणप्रवृत्तिदशायां विषयतादशायां वा न तस्य फलत्वं, किन्तु वृत्तेरपि विनश्यदवस्थाया विनाशानन्तरमेव। तथा च ब्रह्मसाक्षात्कारः सप्रपञ्चं यावन्न निरूप्यते, तावन्न शास्त्रार्थसमाप्तिर्भवति इति तं निरूपयिष्यन् धर्मज्ञानात् ब्रह्मज्ञानस्य विशेषं निरूपयितुं प्रयोजन-लक्षणं ब्रवीति।
२. ज्ञानविषयभूतः सन् स्वसम्बन्धितया इच्छाविषयः पदार्थः प्रयोजनम्। सुखं मे भूयात्, दुःखं मे माभूत् इति सुखत्वादिना अवगते स्वसम्बन्धितया इष्यमाणे च सुखादौ प्रयोजनलक्षणसमन्वयः। ज्ञानविषयत्वं च प्रयोजनावच्छेदकसुखत्वाद्यवच्छिन्नत्वमेव विवक्ष्यते इति विषभक्षणादौ नातिव्याप्तिः।
३. मुख्यम्—अन्येच्छानधीनेच्छाविषयः। गौणम्—अन्येच्छाविषयः।
३८२ | वेदान्तपरिभाषा | [ मोक्षस्वरूपम्
अर्थ—अब ( हम ) प्रयोजन का निरूपण करते हैं। जिसके जान लेने पर स्ववृत्ति होने की ( अपने से उसका सम्बन्ध हो ) इच्छा होती है, उसे प्रयोजन कहते हैं। वह दो प्रकार का है-मुख्य और गौण। उनमें मुख्य प्रयोजन सुख और दुःखाभाव है। इनमें से किसी एक की प्राप्ति होना गौण प्रयोजन है। सुख भी दो प्रकार का है—एक सातिशय सुख, दूसरा निरतिशय सुख। उनमें से सातिशय सुख का अर्थ है कि विषय के संसर्ग से उत्पन्न होनेवाली अन्तःकरणवृत्ति में न्यूनाधिक आनन्दांश का प्रकट होना। 'इसी आनन्दांश पर अन्य प्राणी जीवित रहते हैं।' ( बृ० आ० )। ब्रह्म ही निरतिशय सुख हैं। 'आनन्द ही ब्रह्म है ऐसा उसने जाना' 'यह ब्रह्म, विज्ञान और आनन्द है' ये श्रुतियाँ इस विषय में प्रमाण हैं।
विवरण—जीव-ब्रह्मैक्य, वेदान्तशास्त्र का विषय है-यह पीछे बता चुके हैं। उसके प्रयोजन की आकांक्षा होनेपर ग्रन्थकार प्रयोजन की व्याख्या कर उसका निरूपण करते हैं। जिसके ज्ञात होनेपर उसकी प्राप्ति की इच्छा हो वह प्रयोजन होता है। मुख्य और गौण भेद से वह दो प्रकार का है। मुख्य प्रयोजन ऊपर बता चुके हैं। सुख के साधन ( यागादि ) अथवा दुःखपरिहारसाधन ( प्रायश्चित्तादि ) गौण प्रयोजन हैं। मुख्यप्रयोजनरूप सुख के भी दो प्रकार हैं। एक सातिशय और दूसरा निरतिशय। व्यावहारिक वस्तुओं से होनेवाला सुख सातिशय कहा जाता है। विषयों के स्पर्श से पैदा हुई अन्तःकरणवृत्ति में आत्मानन्द का अंश आविर्भूत होता है, उसी को सातिशय सुख कहते हैं। क्योंकि विषयजन्य सुख में न्यूनाधिक्य रहता है। किन्तु निरतिशय सुख में ( ब्रह्मप्राप्ति से होनेवाले सुख में ) तरतम भाव नहीं होता। इसीलिये उसे निरतिशय कहते हैं।
अब मोक्षस्वरूप बताते हैं—
आनन्दात्मक-ब्रह्मावाप्तिश्च मोक्षः शोकनिवृत्तिश्च। 'ब्रह्म वेद-ब्रह्मैव भवति' ( मु० ३-२-९ ) 'तरति शोकमात्मवित्' ( छां० १-१-३ ) इत्यादिश्रुतेः। न तु लोकान्तरावाप्तिः, तज्जन्य-वैषयिकानन्दो वा मोक्षः। तस्य कृतकत्वेनानित्यत्वे मुक्तस्य पुनरावृत्त्यापत्तेः।
अर्थ—आनन्दात्मक ब्रह्मप्राप्ति और ( समस्त- ) शोकनिवृत्ति ही मोक्ष है। 'ब्रह्म को जान लेने पर ब्रह्म ही होता है' 'आत्मवेत्ता शोक ( सागर ) को पार करता है' इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं। लोकान्तर प्राप्ति का नाम मोक्ष नहीं है। या उनमें प्राप्त
१. ब्रह्मरूपोऽपि जीवः स्वीयाऽविद्यया आवृतः स्वीयं ब्रह्मात्मकं रूपं न जानाति किन्तु यदा अस्य जीवस्य तत्त्वज्ञानोदयः भवति, तदा अज्ञाननिवृत्त्या स्वरूपस्य ब्रह्मारमैक्यस्य प्रकाशो भवति। स एव प्रकाशः ब्रह्मावाप्तिरिति उच्यते। ब्रह्मरूपत्वात् स एव मोक्षः।
मोक्षस्य नित्यत्वम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८३
होनेवाले वैषयिक आनन्द को भी मोक्ष नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वह कृत्रिम होने से अनित्य है। इस कारण मुक्त जीव को भी पुनः संसारावृत्ति प्राप्त होगी।
विवरण—मोक्ष का स्वरूप निरतिशय सुखात्मक ब्रह्मप्राप्ति कहा गया है। परन्तु ब्रह्मज्ञान के होने पर भी एवं कर्म के क्षीण होने पर भी प्रारब्ध कर्म का क्षय नहीं हो पाता, वह ज्ञानी को सतत भोग देता ही रहता है। एवं च ब्रह्मज्ञान होते ही विदेह-मुक्ति नहीं मिलती। देह-सम्बन्ध रहता ही है, और देह-सम्बन्ध के होने पर (देह-बद्धता के कारण) दुःखप्राप्ति का होना भी अनिवार्य है। ऐसी दुःखसंभिन्नता के रहने रहने पर ब्रह्मप्राप्ति के आनन्द में निरतिशयत्व का होना कैसे सम्भव हो सकता है? देहपात होनेपर ही निरतिशय आनन्द की प्राप्ति होती है यह कहना उचित होगा। इसी भाव को मन में रख मोक्ष के स्वरूप वर्णन में 'शोक निवृत्ति' पद दिया गया है। क्योंकि तत्त्वसाक्षात्कार होने पर अविद्या की निवृत्ति होती है और अविद्या से शुक्ति में भासमान रजतत्व की 'यह शुक्तिका है' इत्याकारक ज्ञान से जैसे निवृत्ति होती है, वैसे ही दुःखित्व की निवृत्ति होती है, अर्थात् दुःखित्व, शरीर का धर्म है—ऐसा निश्चय हो जाता है।
लोकान्तर गमन अथवा वहां के विषयानुभव से मिलनेवाला आनन्द, 'मोक्ष' नहीं है। ये दोनों कृतक होने से अनित्य हैं और 'मोक्ष' नित्य होने से भी उन्हें 'मोक्ष' नहीं कहा जा सकता।
उपर्युक्त मोक्षस्वरूप पर एक शंका और उसका निरसन—
ननु तन्मतेऽप्यानन्दावाप्तेरनर्थनिवृत्तेश्च सादित्वे तुल्यो दोषः, अनादित्वे मोक्षमुद्दिश्य श्रवणादौ प्रवृत्त्यनुपपत्तिरिति चेत्। न। सिद्धस्यैव ब्रह्मस्वरूपस्य मोक्षस्यासिद्धत्वभ्रमेण तत्साधने प्रवृत्त्युपपत्तेः। अनर्थनिवृत्तिरप्यधिष्ठानभूतब्रह्मस्वरूपतया सिद्धैव। लोकेऽपि प्राप्तप्राप्तिपरिहृत-परिहारयोः प्रयोजनत्वं दृष्टमेव। यथा हस्तगतविस्मृतसुवर्णादौ 'तव हस्ते सुवर्णम्' इत्याप्तोपदेशादप्राप्तमिव प्राप्नोति। यथा वा वलयितचरणायां रज्जौ सर्पत्वभ्रमवतो 'नायं सर्प' इत्याप्तवाक्यात् परिहृतस्यैव सर्पस्य परिहारः। एवं प्राप्तस्याप्यानन्दस्य प्राप्तिः, परिहृतस्याप्यनर्थस्य निवृत्तिः मोक्षः प्रयोजनम्।
अर्थ—आपके मत में भी आनन्दप्राप्ति और अनर्थनिवृत्ति का आरम्भ होने से (आरम्भवान् पदार्थ अन्तवान् होता है, इस न्याय से) दोष तो समान है। (आपका मोक्ष भी अनित्य है)। इस पर यदि आप मोक्ष को अनादि (मोक्ष तो सिद्ध ही है) मानें तो, उसके उद्देश्य से श्रवण-मननादि में लोगों की प्रवृत्ति नहीं बन सकेगी। (मोक्ष
| ३८४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मोक्षसाधनम् |
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यदि सिद्ध है तो श्रवण-मनन का उपयोग क्या ? ) परन्तु यह शंका योग्य नहीं है । क्योंकि सिद्ध ब्रह्मस्वरूप जो मोक्ष है, वह असिद्ध ( अप्राप्त ) है—इस भ्रम से उसे साध्य करने के लिये की गई प्रवृत्ति उचित है । अनर्थनिवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म-स्वरूप होने से सिद्ध है । इसमें दृष्टान्त देते हैं—लौकिक व्यवहार में भी प्राप्त वस्तु की प्राप्ति अथवा निषिद्ध वस्तु का ही निवारण, प्रयोजन समझा जाता है । जैसे हाथ में रहने पर भी विस्मृत हुआ सुवर्ण कङ्कण, 'तुम्हारे हाथ में ही सुवर्ण है' इस आप्तोपदेश से, अपने पास होते हुए भी सुवर्ण को अभी उपलब्ध हुआ मानते हैं । अथवा पैर में वेष्टित डोरी को ही भ्रम से सर्प समझते हुए व्यक्ति से 'यह सर्प नहीं है' इस प्रकार किसी आप्त के द्वारा कहे जाने पर न होते हुए सर्प का ही परिहार होता है—ऐसा माना जाता है । इसी प्रकार प्राप्त आनन्द की ही प्राप्ति और परिहृत अनर्थ की ही निवृत्तिरूप मोक्ष ही, इस वेदान्तशास्त्र का प्रयोजन है ।
विवरण—यहाँ पर पूर्वपक्षी ने वेदान्तियों से पूछा है कि आपके मत में मोक्ष, सादि है या अनादि ? यदि सादि हो तो 'जो आदिमान् हो वह अन्तवान् अवश्य होता है' इस न्याय से मोक्ष अनित्य सिद्ध होगा । और यदि उसे अनादि बताओ तो श्रवणादि में इतना प्रयत्न क्यों ? इस पर वेदान्ती ने उत्तर दिया है कि हमारे मत से मोक्ष, अनादि है । किन्तु हमें उसकी विस्मृति हो जाने से श्रवणादि साधनों के द्वारा उसकी स्मृति करवानी है, इसलिये श्रवणादि साधन व्यर्थ नहीं हैं ।
अब ग्रन्थकार मोक्ष का साधन बताते हैं—
स च ज्ञानैक-साध्यः 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ( श्वे० ३–८ ) इति श्रुतेः, अज्ञाननिवृत्तेर्ज्ञानैक-साध्यत्वनियमाच्च ।
अर्थ—वह मोक्ष, ज्ञान से ही साध्य है । क्योंकि 'उसी को जानकर ( मनुष्य ) मृत्यु से पार हो जाता है । उसके पार जाने का दूसरा मार्ग नहीं है' यह श्रुति है, और 'ज्ञान से ही अज्ञान की निवृत्ति होती है' यह नियम है ।
विवरण — मोक्ष का साधन केवल ज्ञान ही है । कर्म, उपासना आदि नहीं । इस विषय में ग्रन्थकार ने श्रुतियों एवं युक्तियों को बताया है ।
अब उस ज्ञान के विषय को बताते हैं ।
तच्च ज्ञानं ब्रह्मात्मैक्यगोचरम् । 'अभयं वै जनकप्राप्तोऽसि' ( बृ० ४-२-४ ) तदात्मानमेव वेदाहं ब्रह्मास्मि' ( बृ० १-४-१० ) इति श्रुतेः । 'तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थंज्ञानं मोक्षस्य साधनम्' इति नारदीयवचनाच्च ।
तत्त्वज्ञानस्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८५
अर्थ—उस ज्ञान का विषय—ब्रह्म और आत्मा दोनों का ऐक्य है। 'हे जनक ! अभय (ब्रह्म) को प्राप्त हो गया है' 'वह (ब्रह्म) स्वयं को ही 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा समझने लगा।' आदि श्रुतियाँ इस विषय में हैं। और 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य से होने वाला ज्ञान 'मोक्ष' का साधन है' यह नारदीय स्मृति भी इस विषय में प्रमाण है।
तच्च ज्ञानमपरोक्षरूपम् । परोक्षत्वेऽपरोक्षभ्रमनिवर्तकत्वानुपपत्तेः ।
अर्थ—और वह ज्ञान अपरोक्ष है। क्योंकि वह यदि 'परोक्ष' होता तो उससे 'अपरोक्ष भ्रम' की निवृत्ति नहीं होती।
विवरण—जीवात्मा की व्यावहारिक दशा अपरोक्ष होने से उस (भ्रम) की निवृत्ति, अपरोक्ष ब्रह्मात्मैक्यज्ञान हुए बिना नहीं होगी। इसलिए इस ज्ञान को वेदान्ती अपरोक्ष मानते हैं।
अब इस ज्ञान की उत्पत्ति किससे होती है ?
तच्चापरोक्षज्ञानं तत्त्वमस्यादि-वाक्यादिति केचित् । मनन-निदिध्यासनसंस्कृतान्तःकरणादेवेत्यपरे ।
अर्थ—यह (ब्रह्मात्मैक्यगोचर) अपरोक्ष ज्ञान वाक्य से उत्पन्न होता है—ऐसा कुछ वेदान्ती (पद्मपादादि) मानते हैं। और कुछ (वाचस्पतिमिश्रादि) मनन एवं निदिध्यासन से सुसंस्कृत हुए अन्तःकरण से ही उत्पन्न होता है—मानते हैं।
उपर्युक्त दो मतों में से प्रथम मत का प्रस्ताव करते हैं।
तत्र ^१पूर्वाचार्याणामयमाशयः—संविदापरोक्ष्यं न करणविशेषो^२त्पत्तिनिबन्धनम्, किन्तु प्रमेयविशेष-निबन्धनमित्युपपादितम् । तथा च ब्रह्मणः प्रमातृ-जीवाभिन्नतया तद्गोचरं शब्दजन्यं ^३ज्ञानमप्यपरोक्षम् । अत एव प्रतर्दनाधिकरणे प्रतर्दनं प्रति 'प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमुपास्व' (कौ० ३-२) इतीन्द्रोक्त-वाक्ये प्राणशब्दस्य ब्रह्मपरत्वे निश्चिते सति मामुपास्वेत्यस्मच्छब्दानुपपत्तिमाशङ्क्य तदुत्तरत्वेन प्रवृत्ते 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' (ब्र० सू० १-१-३१)
१. पूर्वाचार्याणाम्—विवरणानुयायिनामित्यर्थः। एषां मते ज्ञानगतप्रत्यक्षं विषयविशेषनिबन्धनम् ।
२. 'बनिबन्धनत्वम्'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'न्यं ज्ञान'—इति पाठान्तरम् ।
२५ वे० प०
| ३८६ | वेदान्तपरिभाषा | [ तत्त्वज्ञानस्वरूपम् |
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इत्यत्र सूत्रे शास्त्रीया दृष्टिः शास्त्रदृष्टिरिति तत्त्वमस्यादि-वाक्यजन्यमहं 'ब्रह्मे'ति ज्ञानं दृष्टिशब्देनोक्तमिति ।
अर्थ— इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों के कहने का आशय यह है कि ज्ञान की अपरोक्षता करणविशेष से (इन्द्रिय से) होनेवाली उत्पत्ति पर निर्भर नहीं रहती, (ज्ञान का प्रत्यक्षत्व केवल वह इन्द्रियों से उत्पन्न होने के कारण नहीं है) किन्तु प्रमेयगत-विशेष पर निर्भर रहता है यह बता चुके हैं। तदनुसार ब्रह्म, प्रमाता (जीव) से भिन्न न होने के कारण तद्गोचर शब्दजन्यज्ञान भी अपरोक्ष ही होता है। इसीलिये प्रतर्दनाधिकरण में (ब्र० सू० १-१-२८-३१) "मैं प्राण एवं प्रज्ञात्मा हूँ, मेरी उपासना आयुःअमृत-भावना से करो"—प्रतर्दन से कहे गये इस इन्द्रवाक्य में प्राणशब्द ब्रह्म परक होने का निश्चय होने पर 'मामुपास्व'—मेरी उपासना कर—यहाँ 'मैं' शब्द की उपपत्ति ठीक न लग सकने की आशंका कर उसके समाधानार्थ प्रवृत्त हुए 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' (ब्र० सू० १-१-३१) किन्तु शास्त्रदृष्टि से वामदेव के समान यह उपदेश है—इस सूत्र में जो शास्त्रीय (शास्त्रोत्पन्न) दृष्टि—वह शास्त्रदृष्टि, इस वाक्य में 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न होनेवाला 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान, दृष्टिशब्द से कहा गया है।
विवरण— वाक्य से सदैव परोक्षज्ञान होता है। अतः उससे अपरोक्षज्ञान होना कैसे सम्भव है? इस बात को पूर्वाचार्यों (पद्मपादादि) के मतानुसार ग्रन्थकार बता रहे हैं। ज्ञान के परोक्षत्व या अपरोक्षत्व का होना केवल अन्तःकरण और इन्द्रिय पर ही निर्भर नहीं है। किन्तु ज्ञेय विषय के संनिहित होने पर ही ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व निर्भर है। ज्ञेय विषय के समीप होने पर बाहर निकली हुई अन्तःकरणवृत्ति के द्वारा उससे सम्बन्ध होने पर वृत्ति और विषयचैतन्य दोनों में ऐक्य होकर उस विषय का प्रत्यक्षज्ञान होता है। 'तत्त्वमसि' वाक्य से होनेवाले शब्दज्ञान का विषय जो ब्रह्म, वह प्रमातृ-चैतन्य से अभिन्न होने के कारण सदैव सन्निहित ही है। इस कारण शब्द से होनेवाले ज्ञान को प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) मानने में कोई भी हानि नहीं है। ग्रन्थकार ने इस मत में प्रमाणरूप से ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय के प्रथमपाद के प्रतर्दनाधिकरण को उपस्थित किया है। वह प्रतर्दनाख्यायिका इस प्रकार है—दैवोदास प्रतर्दन इन्द्रलोक में गया। वहाँ इन्द्र ने उसे एक वर दिया। किन्तु प्रतर्दन ने कहा कि तुम ही मनुष्य के लिये जो अत्यन्त हितकर समझो उस वर को मुझे दो। तब वहाँ पर इन्द्र ने उसे ब्रह्मज्ञान बताया। उसमें इन्द्र कहता है—'मैं प्रज्ञात्मा (प्राण) हूँ, मेरी उपासना करो' (यहाँ 'प्राण' शब्द के अर्थ में पूर्वपक्षी ने शंका की है कि प्राण शब्द का अर्थ प्राणवायु इत्यादि ग्रहण करना चाहिये। उस पर सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी के मत का खण्डन कर प्राण शब्द का अर्थ 'परब्रह्म' ही समझना चाहिये, यह सिद्ध किया है।) इस प्रकार बताने वाले मुझ इन्द्र
१. 'ब्रह्मास्मीति'-इति पाठान्तरम् ।
तत्त्वज्ञानस्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८७
की उपासना करो अर्थात् ब्रह्म की उपासना करो, इस प्रकार ब्रह्म और आत्मा का तादात्म्य समझकर कह रहा है। जैसे गर्भ में रहते हुए ही वामदेव को मैं ही मनु था, सूर्य था, इस प्रकार प्रत्यक्षज्ञान हुआ, वैसे ही इन्द्र, शास्त्रीय दृष्टि से (शास्त्र से उपलब्ध हुई दृष्टि से) अपनी और ब्रह्म की साक्षात् अभेदता प्रदर्शित कर रहा है। इस कारण 'तत्त्वमसि' महावाक्य से होनेवाला 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान अपरोक्ष ही है, उसका निर्देश प्रत्यक्षवाची दृष्टि शब्द से ब्रह्मसूत्र के 'शास्त्रदृष्ट्या' आदि सूत्र में किया है।
अब वाचस्पति मिश्र का आशय व्यक्त करते हैं—
'अन्येषां ^२त्वयमाशयः—करणविशेष-निबन्धनमेव ज्ञानानां प्रत्यक्षत्वम्, न विषयविशेष-निबन्धनम्। एकस्मिन्नेव सूक्ष्मवस्तुनि पटुकरणापटुकरणयोः प्रत्यक्षत्वाप्रत्यक्षत्व-व्यवहार-दर्शनात्। तथा च संवित्साक्षात्त्वे इन्द्रियजन्यत्वस्यैव प्रयोजकतया न शब्दजन्य-ज्ञानस्यापरोक्षत्वम्।
**अर्थ—**दूसरे वेदान्तियों का आशय यह है—ज्ञान का प्रत्यक्षत्व 'इन्द्रिय-गत-विशेष' पर ही अवलम्बित होता है। 'विषयविशेष' पर नहीं। एक ही सूक्ष्म वस्तु का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षज्ञान क्रमशः इन्द्रिय के सामर्थ्य तथा असामर्थ्यपर अवलम्बित रहता है। इस रीति से ज्ञान के अपरोक्षत्व में 'इन्द्रियजन्यत्व' ही प्रयोजक हेतु होने से वाक्य से होनेवाला ज्ञान अपरोक्ष नहीं है।
**विवरण—**इस मत में तत्त्वमस्यादि वाक्य से होनेवाले ज्ञान को परोक्ष माना है। प्रत्यक्ष तो इन्द्रिय पर ही निर्भर रहता है। क्योंकि एक ही सूक्ष्म वस्तु का ज्ञान, इन्द्रिय के सूक्ष्मग्राही न होने पर नहीं होता किन्तु इन्द्रिय के सूक्ष्मग्राही होने पर उसी सूक्ष्म वस्तु का 'प्रत्यक्ष-ज्ञान' होता है। इसलिये प्रत्यक्ष को इन्द्रियजन्य ही मानना चाहिये अतः शब्द से होनेवाला ज्ञान, परोक्ष ही होता है।
तब ब्रह्मसाक्षात्कार का साधन क्या है? क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रियों से तो वह अगम्य है।
ब्रह्मसाक्षात्कारेऽपि मनन-निदिध्यासन-संस्कृतं मन एव करणम्
१. अन्येषाम्—भामत्यनुयायिनामित्यर्थः। एषां मते इन्द्रियजन्यत्वस्यैव ज्ञानगतप्रत्यक्षत्वप्रयोजकत्वम्।
२. 'त्वेवमा०'—इति पाठान्तरम्।
३८८ | वेदान्तपरिभाषा | [ तत्त्वज्ञानसाधनम्
'मनसैवानुद्रष्टव्यः' इत्यादिश्रुतेः । मनोऽगम्यत्वश्रुतिश्चासंस्कृतमनोविषया ।
**अर्थ—**ब्रह्मसाक्षात्कार में भी मनननिदिध्यासनादि से सुसंस्कृत हुआ मन ही साधन है । क्योंकि 'मन से ही इसका दर्शन करना चाहिये' आदि श्रुति इसमें प्रमाण हैं । यह ब्रह्म, मन के लिये अगोचर है—यह श्रुति, असंस्कृत मन के सम्बन्ध में समझनी चाहिये ।
**विवरण—**यदि इन्द्रियों से ब्रह्मज्ञान नहीं होता, तो वह कैसे सम्भव हो सकता है? इसके उत्तर में कहते हैं कि मनन और निदिध्यासन से सुसंस्कृत हुए मन की सहायता से ब्रह्मज्ञान होता है । 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' जहाँ से मनसहित वाणी निवृत्त होती है—(तै० उ० २-४-१) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म को मन से अगम्य बताती हैं, किन्तु उसका अर्थ 'ब्रह्म, असंस्कृत मन से अगम्य है' समझना चाहिये ।
'ब्रह्म' उपनिषन्मात्रगम्य है' इस श्रुति से इस मत का विरोध होगा—ऐसी शंका कर कहते हैं—
न चैवं ब्रह्मण औपनिषदत्वानुपपत्तिः, अस्मदुक्तमनसो वेदजन्यज्ञानान्तरमेव प्रवृत्ततया वेदोपजीवित्वात् । वेदानुपजीविमानान्तरगम्यत्वस्यैव वेदगम्यत्वविरोधि¹त्वात् ।
**अर्थ—**किन्तु इस रीति से 'ब्रह्म औपनिषद (उपनिषन्मात्रगम्य) है' इसकी संगति नहीं लग सकेगी—ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिये । क्योंकि वेद से उत्पन्न हुए ज्ञान के अनन्तर ही हमारा मन (ब्रह्मज्ञान के लिए) प्रवृत्त होने से वह वेदोपजीवि (वेद पर अवलम्बित) है । यदि कोई पदार्थ, वेद पर अवलम्बित न रहनेवाले अन्य प्रमाणों से गम्य हो तभी उसका वेदगम्यत्व से विरोध होगा, अन्यथा नहीं ।
विवरण—'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' उस उपनिषदगम्य पुरुष के सम्बन्ध में मैं तुम्हें पूछता हूँ (वृ. ३-९-२६) इस श्रुति से पुरुष (ब्रह्म) उपनिषन्मात्रगम्य प्रतीत होता है, किन्तु ऊपर तो ब्रह्म को संस्कृत मनोगम्य बताया गया है, अतः उसका इस श्रुति से विरोध है—यह आशंका होती है । परन्तु हमारा मन भी प्रथमतः वेद से ब्रह्म के अस्तित्व का ज्ञान होने पर ही, ब्रह्मसाक्षात्कार के लिये प्रवृत्त होता है । अतः पर्याय से ब्रह्म, उपनिषन्मात्रगम्य ही हुआ । उपनिषन्मात्रगम्यत्व (वेद-मात्र-ज्ञेयत्व) के साथ विरोध तब होगा जबकि ब्रह्म, अनुमानादि अन्य प्रमाणों से ज्ञात होकर पश्चात् मन की तदर्थ प्रवृत्ति हो । हम तो परोक्ष ब्रह्मज्ञान केवल वेदवाक्य से ही मानते हैं अतः विरोध नहीं है ।
१. 'व्यभि'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'धात्'-इति पाठान्तरम् ।
| तत्त्वज्ञानसाधनम् ] | प्रयोजनपरिच्छेदः | ३८९ |
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तथापि 'शास्त्रदृष्टि'सूत्र में श्रुतिवाक्य से होनेवाले ज्ञान को प्रत्यक्ष बताया गया है, अतः विरोध है ही—ऐसी शंका करके कहते हैं ।
'शास्त्रदृष्टिसूत्रमपि ब्रह्मविषय^२मानसप्रत्यक्षस्य शास्त्रप्रयोज्यत्वा- दुपपद्यते । तदुक्तम्—
^३अपि संराधने सूत्राच्छास्त्रार्थ-ध्यानजा प्रमा ।
शास्त्रदृष्टिर्मता तां तु वेत्ति वाचस्पतिः पर^४म् ।। इति ।।
अर्थ—'शास्त्रदृष्टि'सूत्र भी उपपन्न हो जाता है। क्योंकि ब्रह्मविषयक मानसिक प्रत्यक्ष ( सुसंस्कृत मन के द्वारा ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान ) शास्त्रप्रयुक्त ( शास्त्रमूलक ) ही है। इस विषय में सर्वश्रेष्ठ वाचस्पतिमिश्र की सम्मति इस प्रकार है—'शास्त्र के अर्थ का ध्यान करने से होने वाली प्रमा ( ज्ञान ) को "अपि संराधने" सूत्र से शास्त्रदृष्टि समझना चाहिये।
**विवरण—**दूसरे मत के अनुसार 'शास्त्रदृष्टि' सूत्र की उपपत्ति कैसे लगानी चाहिये, सो बताते हैं। 'शास्त्रदृष्टि' शब्द से मानसिक ( मन से होने वाले ) ज्ञान को ब्रह्म का प्रत्यक्ष ही समझें। क्योंकि वह प्रत्यक्ष शास्त्रप्रयोज्य है। इस विषय में कल्पतरुकार अमलानन्द सरस्वती का श्लोक ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है। उनके कहने का आशय यह है कि शास्त्रार्थ के ध्यान करने से उत्पन्न हुए ज्ञान को ही 'शास्त्रदृष्टि' कहते हैं। 'अपि संराधने' सूत्र में श्रुति की 'प्रत्यक्ष' संज्ञा है और स्मृति की 'अनुमान' संज्ञा है। अतः श्रुतिस्मृति से होने वाले ज्ञान को ही 'शास्त्रदृष्टि' (शास्त्र से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान ) कहते हैं—यह वाचस्पतिमिश्र का मत है।
१. आनन्दरूपब्रह्मावाप्तिरेव मोक्षः, स च ज्ञानमात्रसाध्यः। ज्ञानं च जीव-ब्रह्मैक्य-गोचरापरोक्षसाक्षात्काररूपमेव, तच्च तत्त्वमसीतिमहावाक्याधीनम् अथवा श्रवणादि-संस्कृत मनोनिबन्धनम् । सर्वथा च न उपासनात्मकक्रियासाध्यो मोक्षः, न वा कर्म-साध्यः इति ।
२. 'यक'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' इति सूत्रे शास्त्रदृष्टिः न शास्त्रजन्याऽपरोक्षप्रमा मता अभिमता, किन्तु वेदान्त-शास्त्रार्थध्यानजा प्रमैव शास्त्रदृष्टिर्मता, तां शास्त्रदृष्टिपदवाच्यां शास्त्रार्थध्यानजां प्रमां वाचस्पतिरेव परं केवलं जानाति । अर्थात् शास्त्रार्थध्यानजा प्रमैव शास्त्रदृष्टिः नान्या । तत्र हेतुः—'अपिसंराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्या'मिति तृतीयाध्याये द्वितीयपादस्य सूत्रम् ।
४. 'रः'—इति पाठान्तरम् ।
३९० | वेदान्तपरिभाषा | [ विवरणमतम्
ऐसे ज्ञान का साधन बताते हैं—
'तच्च ज्ञानं पापक्षयात्²। स च कर्मानुष्ठानादिति परम्परया कर्मणां³ विनियोगः। अत एव 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' (बृ० ४-४-२२) इत्यादि-श्रुतिः, 'कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते' इत्यादि-स्मृतिश्च सङ्गच्छते।
अर्थ—वह ज्ञान पापक्षय से होता है। और वह पापक्षय कर्मानुष्ठान से होता है। इस रीति से परम्परया कर्मों का (ज्ञानप्राप्ति की ओर) विनियोग होता है। इसीलिये 'उस प्रकार के इस (आत्मा) को वेद का अनुवचन (वेदाध्ययन), यज्ञ, दान, तप, उचित-आहार कर ब्राह्मण लोग जानने की इच्छा करते हैं' इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति एवं 'कर्मों से कषाय (रागद्वेषादि) का पाचन होने पर ज्ञान की प्रवृत्ति होती है' इत्यादि स्मृति की भी संगति लग जाती है।
विवरण—कर्म से पापक्षय होता है और पापक्षय होने पर ज्ञान होता है—इस प्रकार से कर्मों का ज्ञानप्राप्ति में उपयोग है।
जिस प्रकार कर्म का तत्त्वज्ञान में उपयोग होता है उसी प्रकार श्रवण, मनन, निदिध्यासन का भी उपयोग बताते हैं—
१.
'युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबद्ध्यते॥'
'प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति सार्ष्टिताम्।
निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै॥'
इति कर्मणामपि मोक्षे विनियोगः क्रियमाणः कथमुपपद्यते? इत्याशंकायामयं ग्रन्थः। तस्य परिहारस्तु—
'ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः।'
'अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्' इति सूत्रमपि अमुमर्थं प्रतिपादयति।
विनियोगः—उपकारकत्वम्। न तु अङ्गत्वम्। अतएव 'अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा' इति कर्मणां मोक्षानुपयोगः साक्षात् प्रतिपादितः संगच्छते। तथा च श्रुतिः—'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः' इति।
२. 'द् भवति'—इति पाठान्तरम्
३. 'णामुपयोगः'—इति पाठान्तरम्।
श्रवणादीनां स्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९१
'एवं श्रवण-मनन-निदिध्यासनान्यपि ज्ञान-साधनानि। मैत्रेयी-ब्राह्मणे 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (बृ० २-४-५) इति दर्शनमनूद्य तत्साधनत्वेन 'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' (बृ० २-४-५) इति श्रवण-मनन-निदिध्यासनानां विधानात्।
अर्थ— इसी प्रकार श्रवण, मनन, निदिध्यासन भी ज्ञान में साधन हैं। मैत्रेयी ब्राह्मण में (बृहदारण्यकोपनिषद् के याज्ञवल्क्य और उनकी ब्रह्मवादिनी दूसरी पत्नी मैत्रेयी के संवाद प्रकरण में) 'इस आत्मा का दर्शन करना चाहिये'—इस प्रकार आत्म-दर्शन को उद्देश्य कर 'इसका श्रवण करे, निदिध्यासन करे' इस वाक्य में श्रवण, मनन, निदिध्यासन का विधान किया है।
श्रवणादिकों की व्याख्या करते हैं—
तत्र श्रवणं नाम वेदान्तानामद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यावधारणानुकूला मानसी क्रिया। मननं नाम शब्दावधारितेऽर्थे मानान्तरविरोधशङ्कायां तन्निराकरणानुकूल-तर्कात्म-२ज्ञानजनको मानसो व्यापारः। निदिध्यासनं नाम अनादि-दुर्वासनया विषयेष्वाकृष्यमाण³चित्तस्य विषयेभ्योऽपकृष्यात्मविषयक-स्थैर्यानुकूलो मानसो व्यापारः।
अर्थ— उनमें से श्रवण का अर्थ है—अद्वितीय ब्रह्म में विद्यमान वेदान्ततात्पर्य के निश्चयार्थ मानसिक क्रिया। मनन का अर्थ है—शब्द (श्रुति) से अर्थनिश्चय होने पर अन्य प्रमाणों से उसके विरोध की शंका होने पर उसके निराकरण के उपयोग में आनेवाले तर्कात्मक ज्ञान को पैदा करने वाला मानसिक व्यापार। निदिध्यासन का अर्थ है—अनादि दुर्वासनाओं से विषयों की ओर आकर्षित होनेवाले चित्त को विषयों से खींचकर (निवृत्त कर) आत्मा में स्थिर करने के अनुकूल मानसिक व्यापार।
विवरण— वेदान्त का तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्म में है—ऐसा निश्चय करनेवाली मन की प्रवृत्ति को ही श्रवण कहते हैं। किन्तु इस अद्वैत का व्यावहारिक अनुभव के साथ विरोध होने पर 'द्वैत आविद्यक' है और परमार्थतः अद्वैत ही है, तुरीयावस्था में त्रिपुटी का लय
१. विविदिषाद्वारा ज्ञानसाधनं कर्म बहिरङ्ग साधनं विवेचितम्। इदानीमन्तरङ्गसाधनानि उच्यन्ते।
एवम्—कर्मवदित्यर्थः। अत्र सादृश्यं ज्ञानसाधनत्वमात्रेण, न तु परम्परया साधनत्वेनेति बोध्यम्।
२. 'त्मक'—इति पाठान्तरम्।
३. 'णस्य'—इति पाठान्तरम्।
३९२ | वेदान्तपरिभाषा [साधनेषु प्राधान्याप्राधान्यविचारः
हो जाता है—इत्यादि तर्क करके विरोध को दूर करना ही मनन का प्रयोजन है। विषयों में इधर-उधर भटकने वाले चित्त को अपने वश कर आत्मा में स्थिर करना, निदिध्यासन का कार्य है। निरन्तर दर्शन की इच्छा को निदिध्यासन कहते हैं। यहाँ पर निदिध्यासन शब्द से निध्यानेच्छा का कार्य बताया गया है। वह कार्य यही है कि ध्यान में स्थिरता सम्पादन करने के लिये पुनः-पुनः चिन्तन।
अब इन साधनों में से साक्षात्कार का प्रधान साधन एक ही है, या तीनों समान साधन हैं—इसका विचार करते हैं—
तत्र निदिध्यासनं ब्रह्मसाक्षात्कारे साक्षात्कारणम्। 'ते ध्यान-योगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' ( श्वे० १–३ ) इत्यादिश्रुतेः। निदिध्यासने च मननं हेतुः, अकृतमननस्यार्थदार्ढ्या-भावेन तद्विषये^१ निदिध्यासनायोगात्। मनने च श्रवणं हेतुः, श्रवणा-भावे तात्पर्यानिश्चयेन शाब्दज्ञानाभावेन श्रुतार्थविषयक-युक्तत्वायुक्तत्व-निश्चयानुकूल-मननायोगात्। एतानि त्रीण्यपि ज्ञानोत्पत्तौ कारणानीति ^२केचिदाचार्या ऊचिरे।
अर्थ— तीनों में से निदिध्यासन, ब्रह्मसाक्षात्कार में साक्षात कारण होता है। 'उन ऋषियों ने ध्यान योग की सहायता से देवता की अपने गुणों से गूढ हुई शक्ति को देखा' इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है। निदिध्यासन में मनन हेतु है। जिसने मनन न किया हो ऐसे मनुष्य को वस्तु की दृढ़ता नहीं हो पाती। इस कारण उस विषय में निदिध्यासन की अयोग्यता रहती है। और मनन में श्रवण हेतु होता है। श्रवण के अभाव में शब्दज्ञान का अभाव होने से तात्पर्य निश्चय नहीं हो पाता। इस कारण श्रुति विषय की योग्यता या अयोग्यता के निश्चयार्थ ऐसे मनन की अयोग्यता रहती है। अतः ज्ञानोत्पत्ति में तीनों समानरूपसे कारण नहीं हैं—यह भी कुछ आचार्यों ( भामतीकार ) का मत है।
विवरण— श्रवण, मनन, निदिध्यासन क्रमशः ब्रह्मसाक्षात्कार में कारण होते हैं। उनमें निदिध्यासन साक्षात् (अनन्तर) कारण होता है। ये सब एक-एक पर अवलम्बित होने से तीनों ज्ञानोत्पत्ति में साधन होते हैं अर्थात् श्रवणमननोभयविशिष्ट निदिध्यासन
१. 'यक'-इति पाठान्तरम् ।
२. इदं श्रीवाचस्पतिमिश्राणां मतम्—अस्मिन् मते अभिक्रमणाद्यङ्गप्रयाजानां दर्शपूर्णमासयोरिव एकफलसाधनत्वेन त्रीणि न साक्षात्कारसाधनानि, किन्तु सांगं प्रधानमिति द्वितयमेवेति एकस्मिन् वाक्ये निर्देशान्यथानुपपत्त्या श्रवण-मननोभयविशिष्टध्यानस्यैव फलसाधनत्वं युक्तमिति श्रवण-मननयोरङ्गत्वम्, निदिध्यासनस्यैव प्रधानत्वमिति मिश्रमतम् ।
साधनेषु प्राधान्याप्राधान्यविचारः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९३
में ही फलसाधनता है। श्रवण और मनन तो निदिध्यासन के अंग हैं और निदिध्यासन ही प्रधान है—ऐसा आचार्य वाचस्पति मिश्र का मत है। यह बात ग्रन्थकार ने 'केचित्' पद से सूचित की है।
इस सम्बन्ध में अन्य आचार्योंका मत बताते हैं—
'अपरे तु—श्रवणं प्रधानम्, मनन-निदिध्यासनयोस्तु श्रवणात्पराचीनयोरपि श्रवणफल-ब्रह्मदर्शन-निर्वर्तकतया आरादुपकारका^२ङ्गत्वमित्याहुः। ^३तदप्यङ्गत्वं न तार्तीयशेषत्वरूपम्। यस्य श्रुत्याद्यन्यतम-प्रमाणगम्यस्य प्रकृते श्रुत्या^४द्यन्यतमाभावेऽसम्भवात्।
अर्थ—किन्तु अन्य वेदान्ती (विवरणकार) श्रवण को ही प्रधान मानते हैं। और मनन एवं निदिध्यासन, 'श्रवण' के उत्तराङ्ग होते हैं, तथापि श्रवण के फलस्वरूप ब्रह्मदर्शन के निष्पादक होने से उन्हें आरादुपकारक अङ्ग (संनिहित उपकारक अंग) माना जाता है। तथापि यह अंगत्व (मीमांसादर्शन के) तृतीयाध्याय में बताया हुआ शेषत्व रूप नहीं है। क्योंकि वह अंगत्व श्रुत्यादि (श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या)
१. श्रवणं प्रधानं, मनननिदिध्यासने तदुत्तरांगे इति विवरणाचार्यमतम्। प्रधानं साक्षात् कारणम्। मनन-निदिध्यासनयोस्तु अङ्गत्वम्। उत्तरकालीनयोरपि तयोः मनन-निदिध्यासनयोः पूर्वकालीनश्रवणांगत्वमेव। उत्तरकालीनानामपि इडाभक्षणादीना-मङ्गत्वदर्शनात्। विवरणमतेन सन्निपत्योपकारकतया श्रवणमङ्गि, आरादुपकारकतया मनन-निदिध्यासने अङ्गे। तथा च सर्वेषां सन्निपत्योपकारकाणामुत्पत्त्यपूर्वजननानुकूल-योग्यतासम्पादकत्वात् परमापूर्वजननानुकूलयोग्यताविशिष्टयागोद्देशेन विधीयमानप्रया-जादीनां विशिष्टयागप्रविष्टतया अवघाताऽङ्गमपि यत् स्वीक्रियते, तेन न्यायेन अवधृत-तात्पर्यकशब्दाङ्गत्वेन विधीयमान-मननादेरपि तात्पर्यविधारणरूपश्रवणाङ्गत्वमर्थसिद्ध-मेव। तथा च प्रयाजादीनामिव मननादेरपि आरादुपकारकत्वमेव। सन्निपत्योपकारका-रादुपकारकयोरयमेव विशेषः—यत् करणगतातिशयहेतुः सन्निपत्योपकारकम्। आत्म-गतातिशयहेतुरारादुपकारकमिति आरादुपकारकाणां करणोत्पत्त्यपूर्वार्थत्वात् सन्निपत्यो-पकारकाणां करणार्थत्वाच्च सन्निपत्योपकारकमिव करणविशेषणतया आरादुपकारकं नोद्देश्यतामर्हतीति न आरादुपकारकं कदापि अङ्गितामर्हतीति श्रवणमेवाङ्गि, न निदिध्यासनम्।
२. 'कतया'—इति पाठान्तरम्।
३. 'तदप्यङ्गत्वम्' इत्यत्र अङ्गपदमप्रधानपरम्। न शेषपरम्, शेषताग्राहकश्रुति-लिङ्गादीनामत्र अभावात्। न तार्तीयशेषत्वरूपम्—न श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थान-समाख्याप्रमाणसिद्धकारकविशेषत्वम्। तदुक्तम्—"श्रुतिद्वितीया क्षमता च लिङ्गं वाक्यं पदान्येव तु संहतानि। सा प्रक्रिया या कथमित्यपेक्षा स्थानं क्रमो योगबलं समाख्या।"
४. 'द्यभावे'—इति पाठान्तरम्।
३९४ | वेदान्तपरिभाषा [ अंगत्वबोधकप्रमाणानामत्राप्रवृत्तिः
किसी प्रमाण से गम्य रहता है, किन्तु प्रकृत में श्रुति आदि किसी प्रमाण के न होने से वैसे शेषत्व का यहाँ सम्भव नहीं है।
विवरण—यहाँ पर 'अपरे' शब्द से विवरणाचार्य के मत का प्रस्ताव किया है। विवरणाचार्य श्रवण को ब्रह्म-दर्शन में प्रधान कारण मानते हैं और मनन एवं निदिध्यासन को उसका अंगभूत साधन मानते हैं। इस अंगभूतत्व को ग्रन्थकार ने स्पष्ट किया है। अंगत्व (शेषत्व) शब्द मीमांसकों का पारिभाषिक है। मीमांसा दर्शन के तृतीय अध्याय में शेषत्व का लक्षण बताया है। उससे प्राधान्य या अङ्गत्त्व का निर्णय किया जाता है। शेषत्व की व्याख्या 'शेषः परार्थत्वात्' (मी० सू० ३-१-२) सूत्र से की गई है—दूसरे के उपयोग में आना ही शेषत्व है। क्या इस रीति से मनन ओर निदिध्यासन, श्रवण के शेष हैं? इस प्रश्न पर वेदान्तियों का उत्तर इस प्रकार है—मनन और निदिध्यासन समीप रहकर श्रवण फल की प्राप्ति में यद्यपि उपकारक होते हैं, तथापि मीमांसकों का बताया हुआ तृतीयाध्यायगत शेषलक्षण यहाँ घटित नहीं होता, क्योंकि मीमांसकों के यहाँ शेषत्व का निश्चय श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या से होता है। इनमें से कोई प्रमाण यहाँ नहीं है। अतः मीमांसक-सम्मत शेषत्व को मनन, निदिध्यासन में नहीं लगाया जा सकता। श्रीवाचस्पतिमिश्र के मत में मन से ही साक्षात्कार होता है। शब्द से नहीं, इसलिये मन के द्वारा फल की उत्पत्ति में उपकारक निदिध्यासन ही है और उसके अङ्गभूत श्रवण तथा मनन होते हैं। किन्तु शब्द से साक्षात्कार (प्रत्यक्ष) माननेवाले वेदान्ती (विवरणकार) उपर्युक्तकथन का स्वीकार नहीं करते। क्योंकि वे 'श्रवण' को प्रधान मानते हैं।
अब अङ्गबोधक षट् प्रमाणों में से यहाँ एक भी ज्ञात नहीं होता—इस बात को क्रम से दिखाते हैं—
तथा हि, ‘व्रीहिभिर्यजेत’ ‘दध्ना जुहोति’ इत्यादाविव मनन-निदिध्यासनयोरङ्गत्वे न काचित्तृतीया श्रुतिरस्ति। नापि ‘बर्हिर्देवसदनं दामि’ इत्यादि-मन्त्राणां बर्हिःखण्डन-प्रकाशनसामर्थ्यवत् किञ्चिल्लिङ्गमस्ति। नापि प्रदेशान्तर-पठितप्रवर्ग्यस्याग्निष्टोमे प्रवृणक्तीति वाक्यवच्छ्रवणानुवादेन मनननिदिध्यासनयोर्विनियोजकं किञ्चिद्वाक्यमस्ति। नापि ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ इति वाक्यावगतफलसाधनताकदर्शपूर्णमासप्रकरणे प्रयाजादीनामिव फलसाधनत्वेनावगतस्य श्रवणस्य प्रकरणे मनन-निदिध्यासनयोराम्नानम्।
अर्थ—वह इस प्रकार है—'व्रीहि से याग करे' 'दही से हवन करे' इत्यादि श्रुतियों के समान मनन ओर निदिध्यासन में अङ्गत्व-बोधन करानेवाली तृतीया श्रुति नहीं है। उसी