वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३८४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मोक्षसाधनम् |
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यदि सिद्ध है तो श्रवण-मनन का उपयोग क्या ? ) परन्तु यह शंका योग्य नहीं है । क्योंकि सिद्ध ब्रह्मस्वरूप जो मोक्ष है, वह असिद्ध ( अप्राप्त ) है—इस भ्रम से उसे साध्य करने के लिये की गई प्रवृत्ति उचित है । अनर्थनिवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म-स्वरूप होने से सिद्ध है । इसमें दृष्टान्त देते हैं—लौकिक व्यवहार में भी प्राप्त वस्तु की प्राप्ति अथवा निषिद्ध वस्तु का ही निवारण, प्रयोजन समझा जाता है । जैसे हाथ में रहने पर भी विस्मृत हुआ सुवर्ण कङ्कण, 'तुम्हारे हाथ में ही सुवर्ण है' इस आप्तोपदेश से, अपने पास होते हुए भी सुवर्ण को अभी उपलब्ध हुआ मानते हैं । अथवा पैर में वेष्टित डोरी को ही भ्रम से सर्प समझते हुए व्यक्ति से 'यह सर्प नहीं है' इस प्रकार किसी आप्त के द्वारा कहे जाने पर न होते हुए सर्प का ही परिहार होता है—ऐसा माना जाता है । इसी प्रकार प्राप्त आनन्द की ही प्राप्ति और परिहृत अनर्थ की ही निवृत्तिरूप मोक्ष ही, इस वेदान्तशास्त्र का प्रयोजन है ।
विवरण—यहाँ पर पूर्वपक्षी ने वेदान्तियों से पूछा है कि आपके मत में मोक्ष, सादि है या अनादि ? यदि सादि हो तो 'जो आदिमान् हो वह अन्तवान् अवश्य होता है' इस न्याय से मोक्ष अनित्य सिद्ध होगा । और यदि उसे अनादि बताओ तो श्रवणादि में इतना प्रयत्न क्यों ? इस पर वेदान्ती ने उत्तर दिया है कि हमारे मत से मोक्ष, अनादि है । किन्तु हमें उसकी विस्मृति हो जाने से श्रवणादि साधनों के द्वारा उसकी स्मृति करवानी है, इसलिये श्रवणादि साधन व्यर्थ नहीं हैं ।
अब ग्रन्थकार मोक्ष का साधन बताते हैं—
स च ज्ञानैक-साध्यः 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ( श्वे० ३–८ ) इति श्रुतेः, अज्ञाननिवृत्तेर्ज्ञानैक-साध्यत्वनियमाच्च ।
अर्थ—वह मोक्ष, ज्ञान से ही साध्य है । क्योंकि 'उसी को जानकर ( मनुष्य ) मृत्यु से पार हो जाता है । उसके पार जाने का दूसरा मार्ग नहीं है' यह श्रुति है, और 'ज्ञान से ही अज्ञान की निवृत्ति होती है' यह नियम है ।
विवरण — मोक्ष का साधन केवल ज्ञान ही है । कर्म, उपासना आदि नहीं । इस विषय में ग्रन्थकार ने श्रुतियों एवं युक्तियों को बताया है ।
अब उस ज्ञान के विषय को बताते हैं ।
तच्च ज्ञानं ब्रह्मात्मैक्यगोचरम् । 'अभयं वै जनकप्राप्तोऽसि' ( बृ० ४-२-४ ) तदात्मानमेव वेदाहं ब्रह्मास्मि' ( बृ० १-४-१० ) इति श्रुतेः । 'तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थंज्ञानं मोक्षस्य साधनम्' इति नारदीयवचनाच्च ।