वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमोक्षस्य नित्यत्वम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८३
होनेवाले वैषयिक आनन्द को भी मोक्ष नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वह कृत्रिम होने से अनित्य है। इस कारण मुक्त जीव को भी पुनः संसारावृत्ति प्राप्त होगी।
विवरण—मोक्ष का स्वरूप निरतिशय सुखात्मक ब्रह्मप्राप्ति कहा गया है। परन्तु ब्रह्मज्ञान के होने पर भी एवं कर्म के क्षीण होने पर भी प्रारब्ध कर्म का क्षय नहीं हो पाता, वह ज्ञानी को सतत भोग देता ही रहता है। एवं च ब्रह्मज्ञान होते ही विदेह-मुक्ति नहीं मिलती। देह-सम्बन्ध रहता ही है, और देह-सम्बन्ध के होने पर (देह-बद्धता के कारण) दुःखप्राप्ति का होना भी अनिवार्य है। ऐसी दुःखसंभिन्नता के रहने रहने पर ब्रह्मप्राप्ति के आनन्द में निरतिशयत्व का होना कैसे सम्भव हो सकता है? देहपात होनेपर ही निरतिशय आनन्द की प्राप्ति होती है यह कहना उचित होगा। इसी भाव को मन में रख मोक्ष के स्वरूप वर्णन में 'शोक निवृत्ति' पद दिया गया है। क्योंकि तत्त्वसाक्षात्कार होने पर अविद्या की निवृत्ति होती है और अविद्या से शुक्ति में भासमान रजतत्व की 'यह शुक्तिका है' इत्याकारक ज्ञान से जैसे निवृत्ति होती है, वैसे ही दुःखित्व की निवृत्ति होती है, अर्थात् दुःखित्व, शरीर का धर्म है—ऐसा निश्चय हो जाता है।
लोकान्तर गमन अथवा वहां के विषयानुभव से मिलनेवाला आनन्द, 'मोक्ष' नहीं है। ये दोनों कृतक होने से अनित्य हैं और 'मोक्ष' नित्य होने से भी उन्हें 'मोक्ष' नहीं कहा जा सकता।
उपर्युक्त मोक्षस्वरूप पर एक शंका और उसका निरसन—
ननु तन्मतेऽप्यानन्दावाप्तेरनर्थनिवृत्तेश्च सादित्वे तुल्यो दोषः, अनादित्वे मोक्षमुद्दिश्य श्रवणादौ प्रवृत्त्यनुपपत्तिरिति चेत्। न। सिद्धस्यैव ब्रह्मस्वरूपस्य मोक्षस्यासिद्धत्वभ्रमेण तत्साधने प्रवृत्त्युपपत्तेः। अनर्थनिवृत्तिरप्यधिष्ठानभूतब्रह्मस्वरूपतया सिद्धैव। लोकेऽपि प्राप्तप्राप्तिपरिहृत-परिहारयोः प्रयोजनत्वं दृष्टमेव। यथा हस्तगतविस्मृतसुवर्णादौ 'तव हस्ते सुवर्णम्' इत्याप्तोपदेशादप्राप्तमिव प्राप्नोति। यथा वा वलयितचरणायां रज्जौ सर्पत्वभ्रमवतो 'नायं सर्प' इत्याप्तवाक्यात् परिहृतस्यैव सर्पस्य परिहारः। एवं प्राप्तस्याप्यानन्दस्य प्राप्तिः, परिहृतस्याप्यनर्थस्य निवृत्तिः मोक्षः प्रयोजनम्।
अर्थ—आपके मत में भी आनन्दप्राप्ति और अनर्थनिवृत्ति का आरम्भ होने से (आरम्भवान् पदार्थ अन्तवान् होता है, इस न्याय से) दोष तो समान है। (आपका मोक्ष भी अनित्य है)। इस पर यदि आप मोक्ष को अनादि (मोक्ष तो सिद्ध ही है) मानें तो, उसके उद्देश्य से श्रवण-मननादि में लोगों की प्रवृत्ति नहीं बन सकेगी। (मोक्ष